Deepest Hole On Earth: धरती में कितना गहरा किया जा सकता है गड्ढा, जानें क्या है लिमिट?
Deepest Hole On Earth: धरती के अंदर खुदाई करने की इंसान की एक सीमा है. आइए जानते हैं कि धरती में कितना गहरा गड्ढा खोदा जा सकता है.

Deepest Hole On Earth: इंसानों ने सबसे ऊंचे पहाड़ों और सबसे गहरे महासागरों की खोज कर ली है. लेकिन जब बात सीधे धरती के अंदर खुदाई करने की आती है तो हमारी पहुंच काफी ज्यादा सीमित हो जाती है. एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के बावजूद भी हमने ग्रह की सतह को मुश्किल से ही छुआ है. अब तक खोदा गया सबसे गहरा गड्ढा कोला सुपरडीप बोरहोल कहलाया जाता है. आइए जानते हैं कि यह कितना गहरा था.
अब तक खोदा गया सबसे गहरा गड्ढा
सोवियत युग के दौरान रूस में खोदे गए कोला सुपरडीप बोरहोल ने गहराई का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है. वैज्ञानिक 12,262 मीटर धरती के सात के नीचे तक पहुंचने में कामयाब रहे. आसान शब्दों में कहें तो यह गहराई माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई से ज्यादा है. अगर वर्टिकली मापा जाए तो मरियाना ट्रेंच से भी ज्यादा गहरी है. लेकिन इसके बावजूद भी यह शानदार उपलब्धि धरती की कुल मोटाई का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा है.
जमीन के नीचे सबसे बड़ी रुकावट
खुदाई को रोकने का एक बड़ा कारण काफी ज्यादा तापमान है. वैज्ञानिकों ने उस गहराई पर लगभग 100 डिग्री सेल्सियस तापमान का अनुमान लगाया था. लेकिन असलियत कहीं ज्यादा मुश्किल थी. लगभग 12 किलोमीटर नीचे जाने पर तापमान 180 डिग्री तक पहुंच गया. यह ड्रिलिंग इक्विपमेंट को नुकसान पहुंचाने और उसके हिस्सों को पिघलाने के लिए काफी गर्म था.
ठोस चट्टानें बहने लगती हैं
दरअसल इतनी ज्यादा गहराई पर जो चट्टानें सतह पर ठोस होती हैं वह नरम प्लास्टिक या सिली पुट्टी की तरह बहने लगती हैं. दबाव की वजह से वह धीरे-धीरे बहने लगती हैं. जिसका मतलब है कि जैसे ड्रिलिंग रुकती बोरहोल की दीवारें ढहने लगतीं और भरने लगतीं.
धरती के मेंटल तक पहुंचना पहुंच से बाहर
धरती की सबसे बाहरी परत की मोटाई 35 से 70 किलोमीटर तक अलग-अलग होती है. कोला प्रोजेक्ट के साथ भी इंसान पपड़ी के एक तिहाई से भी कम हिस्से में घुस पाए हैं. अगली परत मेंटल पूरी तरह से अछूती है. मौजूदा इंजीनियरिंग गर्मी, दबाव और चट्टानों के डिफॉर्मेशन के मिले-जुले असर को झेल नहीं सकती.
सतह के काफी नीचे हैरान करने वाली खोज
टेक्निकल सीमा होने के बावजूद भी कोला बोरहोल से चौंकाने वाली वैज्ञानिक खोज हुई हैं. वैज्ञानिकों ने लगभग 6-7 किलोमीटर नीचे दो अरब साल पुराने माइक्रोस्कोपिक जीवाश्मों की खोज की. इसी के साथ उन्हें चट्टानों के अंदर फंसा हुआ गर्म और मिनरल से भरपूर पानी भी मिला. इसके अलावा ड्रिलिंग के दौरान बड़ी मात्रा में हाइड्रोजन गैस निकली. साथ ही लगभग 9 किलोमीटर की गहराई पर सोने के निशान भी मिले.
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Source: IOCL
























