पहाड़ों पर कैसे बनाए जाते हैं पुल, कितनी गहराई तक लगते हैं पिलर?
पहाड़ों पर पुल बनाना समतल जमीन के मुकाबले कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि अस्थिर मिट्टी, दुर्गम इलाके और खराब मौसम डिजाइन को जटिल बना देते हैं. पिलर की नींव मजबूत चट्टान पर टिकाई जाती है.

जमीन पर पुल बनाना जितना आसान माना जाता है, पहाड़ों की गहरी घाटियों और दुर्गम इलाकों में पुल बनाना उतना ही चुनौतीपूर्ण होता है. संकरी सड़कें, खराब मौसम, अस्थिर मिट्टी और चट्टानें, ये सभी चीजें पहाड़ी पुल निर्माण को दुनिया की सबसे मुश्किल इंजीनियरिंग परियोजनाओं में शामिल कर देती हैं. जम्मू कश्मीर का चिनाब रेल ब्रिज इसकी सबसे बड़ी मिसाल है, जो दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे पुल है. आइए जानते हैं पहाड़ों पर पुल बनाने की पूरी प्रोसेस क्या है, और पिलर की नींव कितनी गहराई तक डाली जाती है
पहले होता है जमीन और चट्टान का सर्वे
पहाड़ी इलाके में पुल बनाने से पहले इंजीनियर सबसे पहले वहां की चट्टानों की मजबूती, मिट्टी की बनावट और भूकंपीय जोन का बारीकी से सर्वे करते हैं. हिमालय जैसे इलाकों में मिट्टी और चट्टानें अक्सर अस्थिर होती हैं, इसलिए डिजाइन तैयार करने से पहले यह जानना जरूरी होता है कि नींव कहां और किस गहराई तक डाली जा सकती है.
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सीधे चट्टान पर टिकाई जाती है नींव
जमीन के मुकाबले पहाड़ी पुलों में अक्सर पिलर की नींव सीधे मजबूत चट्टान पर टिकाई जाती है, ताकि वह भारी वजन और कंपन को आसानी से सह सके. चिनाब ब्रिज के मामले में आर्च स्पैन की नींव लगभग 40 मीटर ऊंची और करीब 50 मीटर चौड़ी बनाई गई, जो सीधे चट्टान पर होती है. इससे पुल को भूकंप और तेज हवाओं के झटके झेलने की मजबूत क्षमता मिलती है.
ऐसे मिलती है मजबूती
पहाड़ी पुलों में सिर्फ कंक्रीट और स्टील ही नहीं, बल्कि केबल एंकर और कॉक बोल्ट जैसी तकनीकों का भी इस्तेमाल होता है, जो पुल को चट्टान से मजबूती से जोड़े रखते हैं. चिनाब ब्रिज के निर्माण में करीब 29,000 मीट्रिक टन स्टील, 66,000 क्यूबिक मीटर से ज्यादा कंक्रीट और 10 लाख क्यूबिक मीटर अर्थवर्क का इस्तेमाल किया गया है, जिसे मजबूती देने के लिए केबल एंकर और कॉक बोल्ट लगाए गए.
ऐसे बचाया जाता है नदी और घाटी का बहाव
गहरी घाटियों या नदियों के ऊपर बनने वाले पुलों में अक्सर बीच में पिलर लगाने से बचा जाता है, ताकि नीचे के प्राकृतिक बहाव को नुकसान न पहुंचे. इसके लिए आर्च तकनीक अपनाई जाती है, जिसमें पुल का पूरा वजन मेहराबदार ढांचे के जरिए दोनों किनारों की मजबूत चट्टानों पर टिकाया जाता है. चिनाब ब्रिज में भी नदी के बीच कोई पिलर नहीं बनाया गया, बल्कि पूरी संरचना आर्च डिजाइन पर आधारित है.
कितनी गहराई तक जाती है नींव?
आम पिलर फाउंडेशन तकनीक में लंबी स्टील पाइप्स या पाइल्स को जमीन के अंदर 20 से 25 मीटर तक गाड़ा जाता है, ताकि ऊपर की मिट्टी कमजोर होने पर भी नींव मजबूत बनी रहती है. पहाड़ी इलाकों में जहां सीधे चट्टान मिल जाती है, वहां गहराई कम भी लग सकती है, लेकिन जहां मिट्टी ढीली या भुरभुरी हो, वहां नींव को कहीं ज्यादा गहराई तक ले जाना पड़ता है.
सुरक्षा के लिए भी होती है खास डिजाइनिंग
पहाड़ी और संवेदनशील इलाकों में बनने वाले पुलों को कई बार ब्लास्ट प्रूफ तकनीक से भी तैयार किया जाता है. चिनाब ब्रिज को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह 40 किलोग्राम विस्फोट को भी झेल सकता है, और अगर इसके 14 पिलरों में से कोई एक भी क्षतिग्रस्त हो जाए, तो भी पूरा पुल खड़ा रहेगा, बस ट्रेनों की रफ्तार धीमी कर दी जाएगी.
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