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ब्रेड-बिस्किट को चाय में डुबोने का ट्रेंड कब शुरू हुआ, भारत कैसे पहुंची ये आदत?

300 साल पहले नाविकों द्वारा सख्त बिस्कुट को नरम करने की मजबूरी से शुरू हुआ यह ट्रेंड, भारत में टी एसोसिएशन के अभियानों के जरिए आज हर घर की पसंदीदा आदत बन चुका है.

सुबह की जल्दबाजी हो या शाम की फुर्सत, भारत के हर घर में चाय की चुस्की के साथ बिस्कुट या ब्रेड डुबोकर खाने की आदत गहराई से बसी हुई है. अंग्रेजों के दौर से शुरू हुआ चाय का यह सफर आज भारतीय जीवनशैली की पहचान बन चुका है. हालांकि, कड़क चाय में नरम बिस्कुट को डुबोकर खाने का यह तरीका कोई हालिया आविष्कार नहीं है, बल्कि इसके पीछे 300 साल पुरानी एक अनूठी और मजबूरियों भरी ऐतिहासिक कहानी छिपी है. यूरोप के समुद्री अभियानों से लेकर ब्रिटिश राजघराने के शाही रिवाजों तक और फिर भारत के कोने-कोने तक इस आदत का विस्तार कैसे हुआ, आइए इसके दिलचस्प तथ्यों को सिलसिलेवार समझते हैं.

17वीं-18वीं सदी में यूरोप से हुई शुरुआत

चाय और बिस्कुट को एक साथ परोसने के इस कॉम्बिनेशन की नींव 17वीं और 18वीं शताब्दी के दौरान यूरोप में रखी गई थी. उस दौर में ब्रेड और सूखा बिस्कुट आम लोगों के दैनिक भोजन का मुख्य हिस्सा हुआ करते थे. 19वीं सदी में जब ब्रिटेन की डचेस ऑफ बेडफोर्ड अन्ना मारिया रसेल ने दोपहर के भोजन और रात के खाने के लंबे अंतराल के बीच लगने वाली हल्की भूख को मिटाने के लिए चाय के साथ हल्का नाश्ता लेने की प्रथा शुरू की, तब यह ट्रेंड तेजी से लोकप्रिय हो गया. इस शाही आदत को बाद में पूरे समाज ने अपना लिया.

नाविकों की मजबूरी बनी रिवाज

चाय में बिस्कुट डुबोकर खाने की वैज्ञानिक और व्यावहारिक वजह 300 साल पुरानी है, जिसकी शुरुआत समुद्री नाविकों ने की थी. लंबी यात्राओं पर जाने वाले सैनिकों और नाविकों को हार्डटैक नामक खास बिस्कुट दिया जाता था. केवल मैदे, पानी और नमक से बने ये बिस्कुट एयरटाइट डिब्बों में रखने पर सालों तक खराब नहीं होते थे, लेकिन वे पत्थरों या सीमेंट जितने सख्त होते थे. इन्हें सीधे चबाना नामुमकिन था, इसलिए नाविकों को मजबूरन इन्हें चाय, सूप या गरम पानी में डुबोकर नरम करना पड़ता था. यही मजबूरी आगे चलकर स्वाद और रिवाज में तब्दील हो गई.

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ब्रेड और बिस्कुट ही क्यों बने पहली पसंद?

ब्रिटेन में चाय के साथ एक ऐसे नाश्ते की तलाश थी जो जल्दी तैयार हो सके और लंबे समय तक टिकाऊ रहे. ब्रेड और बिस्कुट निर्माण व उपलब्धता के मामले में सबसे आसान विकल्प थे. इन्हें न तो पकाने में समय लगता था और न ही इनके लिए किसी विशेष बर्तन की जरूरत होती थी. यही वजह रही कि चाहे आम मजदूर हों या उच्च वर्ग के लोग, चाय के कप के साथ ब्रेड और बिस्कुट सबसे सहज और लोकप्रिय स्नैक के रूप में स्थापित हो गए.

भारत में कब से आया यह दौर?

भारत में चाय पीने और उसके साथ बिस्कुट खाने का कल्चर फैलाने में इंडियन टी एसोसिएशन (ITA) की सबसे अहम भूमिका रही है. 20वीं सदी की शुरुआत में एसोसिएशन ने रेलवे स्टेशनों, फैक्ट्रियों और दफ्तरों में चाय के फ्री सैंपल बांटने का अभियान चलाया. इतना ही नहीं, भारतीय लोगों को बाकायदा चाय बनाने और उसे बिस्कुट के साथ पीने का तरीका सिखाया गया. जैसे-जैसे देश में चाय का स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ा, वैसे-वैसे चाय के साथ स्थानीय बेकरी से मिलने वाली ब्रेड और बिस्कुट का चलन भी बढ़ता गया.

स्वाद और नरमी के पीछे का विज्ञान

चाय में बिस्कुट डुबोते ही उसके स्वाद का कई गुना बढ़ जाना केवल एक दिमागी भ्रम नहीं, बल्कि इसके पीछे स्वाद का विज्ञान है. गरम चाय के संपर्क में आते ही बिस्कुट के सूखे कण ढीले पड़ जाते हैं, जिससे बिस्कुट में मौजूद चीनी, वसा और सुगंधित तत्व तुरंत घुल जाते हैं. चाय की गर्माहट और बिस्कुट का मीठा या नमकीन फ्लेवर मिलकर एक नया स्वाद पैदा करते हैं. यही वजह है कि आज भी लोग पारले-जी, मैरी या ग्लूकोज जैसे बिस्कुटों को कड़क चाय में भिगोकर खाना सबसे ज्यादा पसंद करते हैं.


ब्रेड-बिस्किट को चाय में डुबोने का ट्रेंड कब शुरू हुआ, भारत कैसे पहुंची ये आदत?

कैफे कल्चर के दौर में भी कायम है दबदबा

आज के आधुनिक समय में हालांकि एस्प्रेसो, लैटे और तरह-तरह के विदेशी कॉफी कल्चर ने भारतीय बाजारों में जगह बना ली है. इसके साथ ही मफिन, क्रोसांत और फैंसी स्नैक्स के अनगिनत विकल्प मौजूद हैं. इसके बावजूद, आम भारतीय घरों, नुक्कड़ की टपरी और कॉर्पोरेट ऑफिसों के ब्रेक में चाय और बिस्कुट का साधारण सा कॉम्बिनेशन आज भी उतना ही लोकप्रिय है. यह कॉम्बिनेशन केवल पेट भरने का जरिया नहीं, बल्कि एक आरामदायक एहसास बन चुका है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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