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जिस क्रॉस पर यीशु को चढ़ाया गया था सूली, वह अब कहां हैं?

इतिहासकारों का कहना है कि लंबे संघर्ष और लूटपाट के कारण ट्रू कॉस के कई टुकड़े खो गए हैं, लेकिन कुछ बड़े टुकड़े आज भी बचे हुए हैं जो ईसाई धर्म के महत्वपूर्ण स्थानों पर रखे गए हैं.

Good Friday 2025: ईसाई धर्म के अनुयायियों के लिए 'गुड फ्राइडे' एक पवित्र और भावनात्मक दिन होता है. कहा जाता है कि ईसा मसीह को सूली पर लटकाने के बाद उनकी मृत्यु शुक्रवार को ही हुई थी. उनकी स्मृति में ईस्टर से पहले शुक्रवार को 'गुड फ्राइडे' मनाया जाता है. इस बार गुड फ्राइडे 18 अप्रैल को मनाया जा रहा है. इस दिन चर्चों में प्रार्थना सभाओं का आयोजन किया जाता है. 

हालांकि, ईसा मसीह की मृत्यु हमेशा से एक रहस्य ही बनी रही. उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि मृत्यु के कुछ दिनों बाद ईसा मसीह फिर से जिंदा हो गए थे और अपने अनुयायियों मिले थे, जिस दिन ईसा मसीह दोबारा जिंदा हुए उस दिन को ईस्टर के रूप में मनाया जाता है. अब सवाल यह है कि ईसा मसीह को जिस क्रॉस पर लटकाया गया था, वह अब कहां है? चलिए जानते हैं इसके बारे में... 

सूली पर क्यों चढ़ाए गए थे ईसा मसीह?

गुड फ्राइडे का इतिहास ईसा मसीह की मृत्यु से जुड़ा है. कहा जाता है कि कुछ यूहदी धर्मगुरुओं ने रोम के शासक पिलातुस से शिकायत की कि यीशु खुद को ईश्वर का पुत्र बता रहा है और लोगों को अपने पक्ष में कर रहा है. इस शिकायत के बाद ईसा मसीह पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया. रोम के सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया, जिसके बाद उन्हें कई यातनाएं दी गईं और बाद में सूली पर लटका दिया गया और उनकी मुत्यु हो गई. 

कहां लटकाए गए थे ईसा मसीह

कहा जाता है कि रोम शासक पिलातुल के आदेश पर यरूशलेममें ईसा मसीह को गिरफ्तार किया गया था. उन्हें कई यातनाएं दी गईं और जिस क्रूस पर उन्हें लटकाया जाना था, उसे लादकर खुद ईसा मसीह यरूशलेममें माउंट गोलगोथा तक चले. जहां पर ईसा मसीह ने क्रूस को रख दिया वहीं पर उन्हें सूली पर लटका दिया गया. ईसा मसीह के साथ रोम सम्राट के आदेश पर दो और लोगों को सूली पर लटकाया गया था. 

अब कहां है वह क्रॉस

ईसा मसीह को जिस क्रॉस पर लटकाया गया था, उसे लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं. हालांकि, सबसे प्रचलित कहानी यह है कि रोमन सम्राट कॉस्टैंटिन की मां हेलेना ने इस क्रॉस को खोजा था. कहा जाता है कि जब ईसा मसीह को सूली पर लटकाया गया तो उनकी मृत्यु के बाद रोम सैनिकों ने उनके अनुयायियों द्वारा इसे खोजने से रोकने के लिए क्रॉस को एक गहरी खाई में फेंक दिया और इसे पत्थर और मिट्टी से ढक दिया गया. करीब 300 साल बाद हेलेना के आदेश पर उस स्थान की खुदाई की गई, जहां से तीन क्रॉस मिले, लेकिन सवाल यह था कि तीनों में से 'सच्चा क्रॉस' कौन सा था? इसका पता लगाने ने के लिए हेलेना ने तीनों क्रॉस को बारी-बारी से एक बीमार महिला को छूने के लिए दिए. जिस क्रॉस को छूकर महिला ठीक हो गई, उसे ही सच्चा क्रॉस माना गया. इस क्रॉस का एक हिस्सा रोम ले जाया गया और दूसरा यरूशलेममें ही रहा. 

कई बाद लूटा गया क्रॉस

कहा जाता है कि क्रॉस का एक हिस्सा लंबे समय तक यरूशलेम में ही रहा. 615 ई में फारसी सम्राट खोसरो द्वितीय ने यरूशलेम पर कब्जा कर लिया और ट्रू क्रॉस को अपने कब्जे में ले लिया. कई सालों के संघर्ष के बाद यह क्रॉस फिर से यरूशलेम वापस आया. इसके बाद भी कई लड़ाईयों में इस क्रॉस को लूटा गया और उसके कई हिस्से इधर-उधर बंटते गए. इतिहासकारों का कहना है कि लंबे संघर्ष और लूटपाट के कारण ट्रू कॉस के कई टुकड़े खो गए हैं, लेकिन कुछ बड़े टुकड़े आज भी बचे हुए हैं जो ईसाई धर्म के महत्वपूर्ण स्थानों पर रखे गए हैं. रोम में सांता क्रोस में कैपेलो डेल्ले रेलिकिए में इसके तीन टुकड़े संरक्षित हैं. पेरिस के नोट्रे डेम में यह टुकड़ा पेरिस के सेंट चैपल चर्च में रखा गया था. इसी तरह फ्लोरेंस के सांता मारिया डेल फियोर के डुओमो ओपेरा म्यूजियम में भी इसका एक अवशेष रखा हुआ है. 

यह भी पढ़ें: परमाणु बम बनाने के करीब है ईरान! जानें किन इस्लामिक देशों के पास है ये ताकत

प्रांजुल श्रीवास्तव एबीपी न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. फिलहाल फीचर डेस्क पर काम कर रहे प्रांजुल को पत्रकारिता में 9 साल तजुर्बा है. खबरों के साइड एंगल से लेकर पॉलिटिकल खबरें और एक्सप्लेनर पर उनकी पकड़ बेहतरीन है. लखनऊ के बाबा साहब भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का 'क, ख, ग़' सीखने के बाद उन्होंने कई शहरों में रहकर रिपोर्टिंग की बारीकियों को समझा और अब मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं. प्रांजुल का मानना है कि पाठक को बासी खबरों और बासी न्यूज एंगल से एलर्जी होती है, इसलिए जब तक उसे ताजातरीन खबरें और रोचक एंगल की खुराक न मिले, वह संतुष्ट नहीं होता. इसलिए हर खबर में नवाचार बेहद जरूरी है.

प्रांजुल श्रीवास्तव काम में परफेक्शन पर भरोसा रखते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं को पहुंचाने का काम नहीं है, यह भी जरूरी है कि पाठक तक सही और सटीक खबर पहुंचे. इसलिए वह अपने हर टास्क को जिम्मेदारी के साथ शुरू और खत्म करते हैं. 

अलग अलग संस्थानों में काम कर चुके प्रांजुल को खाली समय में किताबें पढ़ने, कविताएं लिखने, घूमने और कुकिंग का भी शौक है. जब वह दफ्तर में नहीं होते तो वह किसी खूबसूरत लोकेशन पर किताबों और चाय के प्याले के साथ आपसे टकरा सकते हैं.

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