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बरसों पहले होने लगा था चुनावों में फ्री सुविधाओं का ऐलान, जानें किस पार्टी ने की थी इसकी शुरुआत?

Freebies in Elections: आजकल के चुनाव में यह एक ट्रेंड बनता जा रहा है कि कौन कितना और किससे अधिक फ्री की सुविधाएं दे सकता है. फ्री योजनाओं के बल पर अब चुनाव जीते जा रहे हैं. चलिए जानते हैं कि...

Freebies in Elections: फ्री ले लो फ्री, मैं सबसे ज्यादा फ्री दे रहा हूं, मेरा वाला फ्री लो' दिल्ली विधानसभा चुनाव कुछ दिनों बाद होने वाले हैं, ऐसे में सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी ने फ्री स्कीम का पिटारा खोल दिया है. बस वोट चाहिए सरकार बननी चाहिए, उसके लिए कुछ भी फ्री देने के लिए तैयार हैं. भारत में फ्री सुविधाओं की कई स्कीमों की वैल्यू सरकार के कई विभागों के सालाना बजट से भी ज्यादा है. फ्री सुविधाओं का ऐलान मतलब पार्टी के लिए जीत की गारंटी. 

आजकल चुनावों में यह एक तरह से कल्चर बनता जा रहा है कि जो पार्टी जितनी मुफ्त सुविधाएं देगी, उस पार्टी का चुनाव जीतने का चांस उतना बढ़ जाएगा. इसके चलते सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सब ने फ्री सुविधाओं की झड़ी सी लगा दी है क्योंकि आखिर चुनाव सभी को जीतना है. सरकार सबको बनानी है. पहले फ्री की सुविधाओं का ऐलान कुछ चीजों के लिए होता थी, लेकिन आज बस कुछ चीजें ही बची हैं, जिनको फ्री किया जाना बाकी रह गया है.

कब शुरू हुई थी फ्री की सुविधा

फ्री की सुविधा वोटरों को लुभाने के लिए एक शॉर्ट टर्म स्कीम होती है. जबतक उस पार्टी की सरकार है, स्कीम जिंदा है और चल रही है. सरकार गई स्कीम गई. कई बार इन फ्री की सुविधाओं की खामियाजा बाकी लोगों को भी भुगतना पड़ता है. फ्री सुविधाओं को हम पूरी तरह वेलफेयर स्कीम में नहीं रख सकते, क्योंकि यह शार्ट टर्म रिलीफ के तौर पर काम करती है. सबसे पहले तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के कामराज ने मिड डे मील योजना की घोषणा की थी. इस स्कीम को 1956 में शुरु किया गया था. बाद में इसको केंद्र की सरकार ने पूरे देश में लागू किया. एन टी रामाराव ने सबसे पहले दो किलो फ्री राशन देने की घोषणा की थी. आंध्र प्रदेश का यह स्कीम आज नेशनल फूड सिक्योरिटी प्रोग्राम का हिस्सा है.

1967 में डीएमके के फाउंडर सीएन अन्नादुरई ने चुनाव जीतने के लिए एक वादा किया था. उन्होंने कहा था कि अगर वो सरकार में आते हैं तो 4.5 किलो चावल एक रुपये में देंगे. साल 2006 में डीएमके पार्टी की तरफ से वादा किया गया था कि अगर वह सरकार में आते हैं तो लोगों को फ्री कलर टीवी दिया जाएगा. बाद में इस तरह के वादे जमीन देने, लैपटॉप देने, साइकिल देने तक पहुंचे.

क्या सच में फ्री स्कीम काम करती हैं?

कोरोना से अब तक केंद्र सरकार का फ्री राशन हो, किसानों के लिए लोन माफी हो, फ्री बिजली, फ्री पानी, फ्री बस की सवारी, फ्री पढ़ाई या फ्री तीर्थयात्रा की सवारी हो. ये सब के सब अभी तक असरदार और कारगर साबित हुए हैं, किसी भी पार्टी को चुनाव जीताने में. अगर हम पिछले 8 विधानसभा चुनावों को देखें तो यह निकलकर सामने आता है कि मुफ्त रेवड़ियों ने राज्य के चुनावों पर अपना गहरा असर डाला है. अगर हम सिर्फ पांच योजनाओं का देखें तो इनमें-  महिलाओं के मासिक भत्ता ने महाराष्ट्र, पंजाब, मध्य प्रदेश में सरकार बनाने में अपना अहम रोल प्ले किया है. अगर सरल शब्दों में कहें तो यह गेमचेंजर साबित हुआ है. मुफ्त बस यात्रा ने दिल्ली में आम आदमी की पार्टी को सरकार बनाने में अहम रोल प्ले किया है. फ्री बस सुविधा ने युवाओं और महिलाओं के वोटों को अपनी तरफ खींचा है.

यही हाल फ्री बिजली स्कीम्स का है. दिल्ली के आसपास जिलों में जो लोग काम करने आते हैं, वे वहां रहने के बजाय दिल्ली में रहना ज्यादा पसंद कर रहे हैं क्योंकि वहां फ्री बिजली और पानी की सुविधा मिल जाती है. किसान सम्मान निधि और मुफ्त एलपीजी गैस सिलेंडर ने उत्तर प्रदेश जैसे बड़े प्रदेश को सीधा टार्गेट किया है और यहां सरकार बनाने में अहम रोल निभाया है.

अगर सरल शब्दों में कहा जाए तो केंद्र से लेकर राज्य तक, छोटी से लेकर बड़ी पार्टियों तक सब के सब फ्री करके अपनी सरकार बनाने में जुटे हुए हैं.

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