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World Doll Day 2024: हर बच्चों को पसंद होती हैं गुड़िया, जानिए कितना खास होता है ये दिन

बचपन वाली गुड़िया और खेल याद है? जून के दूसरे शनिवार हर साल विश्व गुड़िया दिवस मनाया जाता है. बच्चों के लिए गुड़िया खास होते हैं. क्या आप जानते हैं कि भारत में गुड़ियों का म्यूजियम कहां पर है.

ये मेरी.. ये तुम्हारी डॉल.. बचपन के दिनों में घर के खेलों की ये लाइन अभी आपके ज़हन में होगी. आज यानी जून के दूसरे शनिवार को वर्ल्ड डॉल डे बनाया जाता है. बच्चों से लेकर बड़े लोगों को डॉल अपनी ओर आकर्षित करता है. आज के दिन गुड़िया रखने के शौकीन लोग इस दिन डॉल की दुकानों में जाकर पसंदीदा डॉल खरीदते हैं. आज हम आपको बताएंगे कि ये डॉल डे क्यों मनाया जाता है और इसकी शुरूआत कब हुई थी. 

डॉल डे

आज घरों में खिलौनों की जगह मोबाइल फोन ले चुका है. बच्चे खिलौने से कम और मोबाइल फोन पर गेम खेलना और वीडियो देखना ज्यादा पसंद करते हैं. लेकिन 90s से 2010 तक के बचपन में आपने देखा होगा कि बच्चे पार्कों और खिलौने के साथ खेलना पसंद करते थे. क्योंकि उस वक्त उनके पास संसाधन कम होते थे और मोबाइल फोन हर घर में नहीं होता था.

बता दें कि विश्व गुड़िया दिवस के दिन दुनिया भर में बच्चों के साथ-साथ संपूर्ण मानवता के विकास में गुड़ियों के भारी योगदान का जश्न मनाया जाता है. गुड़ियों का इतिहास दशकों पुराना है. मिस्र की कब्रों में लकड़ी की गुड़ियाएँ 21वीं शताब्दी ईसा पूर्व की पाई गई थी. वहीं प्राचीन ग्रीक और रोमन बच्चों की कब्रों में भी मिट्टी की गुड़ियाएँ पाई गई हैं. आज के बच्चों की तरह, रोमन, ग्रीक और मिस्र के बच्चे अपनी गुड़ियाओं को नवीनतम फैशन के अनुसार तैयार करते थे.

बार्बी डॉल

वहीं आधुनिक समय में मैटल की बार्बी डॉल दुनिया की सबसे लोकप्रिय गुड़िया में से एक बन गई है. जानकारी के मुताबिक बार्बी पहली बार 9 मार्च, 1959 को न्यूयॉर्क में अमेरिकन इंटरनेशनल टॉय फेयर में नज़र आई थी. वह मैटल की सह-संस्थापक रूथ हैंडलर के दिमाग की उपज थी. अपनी बेटी को वयस्क पात्रों वाली कागज़ की गुड़िया के साथ खेलते देखकर प्रेरित होकर हैंडलर ने इसको बनाया था. 

जयपुर गुड़िया संग्रहालय

जयपुर में एक चार दशक पुराना गुड़िया संग्रहालय है. जी हां, ये डॉल म्यूजियम बाकी म्यूजियम से अलग है. इस म्यूजियम में कई तरह की डॉल्स हैं और यहां मौजूद हर डॉल या गुड़िया अपने देश-प्रदेश की खासियत बताती हैं.

साल 1975 में शुरू हुआ था म्यूजियम

1975 में भगवानी बाई सेकसरिया परिवार ने यह डॉल म्यूजियम स्थापित किया था. वहीं ये 1970 और 1980 के दशक में एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल था. हालांकि कुछ समय के लिए इसकी देखरेख नहीं होने के कारण यहां पर लोग नहीं जाते थे. लेकिन 2018 के बाद इसकी स्थिति फिर अच्छी हो गई थी. डॉल म्यूजियम में मौजूद 600 से ज्यादा डॉल्स भारतीय संस्कृति को दर्शाती हैं और इनके साथ में कार्टून कैरेक्टर वाली डॉल्स भी शामिल हैं.कैरेक्टर स्पाइडरमैन, हार्थ मॉल, बैटमैन, हल्क और आदि डॉल्स भी हैं. ऐसे में यहां बच्चों का अच्छा मनोरंजन होता है. इस म्यूजियम में जापान की प्रसिद्ध डॉल हिना मास्तुराई भी है. इसके अलावा अरब, स्वीडन, स्वीट्जरलैंड, अफगानिस्तान, ईरान आदि देशों की डॉल्स गैलेरी में रखी गई हैं. दुनियाभर के लगभग सभी देशों की डॉल्स यहां मौजूद हैं.

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गिरिजांश गोपालन को मीडिया इंडस्ट्री में चार साल से ज्यादा का अनुभव है. फिलहाल वह डिजिटल में सक्रिय हैं, लेकिन इनके पास प्रिंट मीडिया में भी काम करने का तजुर्बा है. दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद गिरिजांश ने नवभारत टाइम्स अखबार से पत्रकारिता की शुरुआत की. उन्हें घूमना बेहद पसंद है. पहाड़ों पर चढ़ना, कैंपिंग-हाइकिंग करना और नई जगहों को एक्सप्लोर करना उनकी हॉबी में शुमार है। यही कारण है कि वह तीन साल से पहाड़ों में ज्यादा वक्त बिता रहे हैं. अपने अनुभव और दुनियाभर की खूबसूरत जगहों को अपने लेखन-फोटो के जरिए सोशल मीडिया के रास्ते लोगों तक पहुंचाते हैं.
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