भारत से नीदरलैंड कैसे पहुंच गए थे चोल साम्राज्य के ऐतिहासिक दस्तावेज, जो अब लाए जाएंगे वापस?
Anaimangalam Copper Plates: नीदरलैंड ने चोल साम्राज्य से जुड़ी ऐतिहासिक तांबे की प्लेटें भारत को वापस सौंप दी हैं. आइए जानते हैं ये नीदरलैंड कैसे पहुंची थीं.

- नीदरलैंड ने चोल साम्राज्य की 24 ऐतिहासिक तांबे की प्लेटें भारत को लौटाईं।
- ये प्लेटें 11वीं सदी की हैं, प्रशासन और कूटनीति की जानकारी देती हैं।
- 17वीं-18वीं सदी में डच ईस्ट इंडिया कंपनी के दौरान नीदरलैंड पहुंची थीं।
- इनमें राजाराज व राजेंद्र चोल प्रथम के अनुदान और बौद्ध विहार दान का उल्लेख है।
Anaimangalam Copper Plates: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में नीदरलैंड ने हाल ही में चोल साम्राज्य से जुड़ी ऐतिहासिक तांबे की प्लेटें भारत को वापस सौंप दी हैं. 11वीं सदी की इन तांबे की प्लेटों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लीडेन प्लेट्स और भारत में अनाइमंगलम ताम्रपत्र के नाम से जाना जाता है. इन्हें चोल राजवंश के प्रशासन, कूटनीति और समुद्री प्रभाव के सबसे जरूरी जीवित अभिलेखों में से एक माना जाता है. विदेशों में सदियों तक सुरक्षित रखे जाने के बाद उनकी वापसी एक बड़ी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक उपलब्धि है.
कब पहुंची थीं ये प्लेट नीदरलैंड?
ये ऐतिहासिक तांबे की प्लेटें 17वीं और 18वीं सदी के दौरान भारत से नीदरलैंड ले जाई गईं थीं. उस वक्त डच ईस्ट इंडिया कंपनी का तमिलनाडु के तटीय इलाकों पर कंट्रोल था. इतिहासकारों का ऐसा मानना है कि ये प्लेट 1687 और 1700 के बीच नागपट्टिनम क्षेत्र के आसपास चल रहे पुनर्विकास कार्यों के दौरान मिली थीं. उस वक्त डच ईस्ट इंडिया कंपनी का इस तटीय व्यापारिक क्षेत्र पर काफी कंट्रोल था.
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एक डच मिशनरी ले गया प्लेट को
फ्लोरेंटियस कैंपर नाम का एक स्थाई मिशनरी उस दौरान भारत में मौजूद था. कथित तौर पर वह इन तांबे की प्लेटों को अपने साथ नीदरलैंड ले गया. वक्त के साथ ये यूरोपीय शैक्षणिक संग्रहों का हिस्सा बन गईं और आखिरकार 1862-1863 के आसपास इन्हें लीडेन विश्वविद्यालय की एशियाई लाइब्रेरी को सौंप दिया गया. 160 से भी ज्यादा सालों तक यह तांबे की प्लेट विश्वविद्यालय के अभिलेखागार में सुरक्षित रहीं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लीडर प्लेट्स के नाम से मशहूर हो गईं.
क्या है इन प्लेटों में?
तांबे की इन प्लेटों के सेट में कुल 24 प्लेटें हैं. इनमें 21 बड़ी और 3 छोटी प्लेटें शामिल हैं. इनका कुल वजन लगभग 30 किलोग्राम है. ये सभी प्लेटें एक बड़ी कांस्य की अंगूठी से आपस में जुड़ी हुई हैं. इस अंगूठी पर चोल राजवंश की शाही मुहर लगी हुई है. इन अभिलेखों में मुख्य रूप से चोल राजवंश के महान शासकों राजाराज चोल प्रथम और राजेंद्र चोल प्रथम से जुड़े शाही अनुदानों और प्रशासनिक आदेशों का जिक्र है.
इन अभिलेखों में नागपट्टिनम में स्थित चूड़ामणि विहार बौद्ध मठ निर्माण और रखरखाव के लिए दिए गए दान के बारे में लिखा है. इन प्लेटों का ऐतिहासिक महत्व इस वजह से भी बढ़ जाता है क्योंकि इन पर लिखे अभिलेख दो भाषाओं में है. संस्कृत वाले हिस्सों में मुख्य रूप से चोल राजाओं की वंशावली और शाही वंश का जिक्र है और तमिल वाले हिस्सों में जमीन के दान, राजस्व व्यवस्था, प्रशासन और टैक्स के बारे में पूरी जानकारी दी गई है.
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