यूपी से तमिलनाडु तक... सीएम की कुर्सी पर कौन सी जाति भारी, देखें हर राज्य का सामाजिक समीकरण
भारत के राज्यों में सीएम के कार्यकाल का वितरण अलग-अलग जाति में बंटा है. जहां कुछ राज्यों में सामान्य वर्ग का वर्चस्व है, वहीं दक्षिण और पूर्वी भारत के कई राज्यों में ओबीसी और एसटी वर्ग का नेतृत्व है.

- झारखंड में एसटी वर्ग का नेतृत्व सबसे अधिक 78.9% रहा है.
भारतीय लोकतंत्र में सत्ता किसके पास है और कौन किस समूह का प्रतिनिधित्व करता है, यह सवाल हमेशा से चर्चा का केंद्र रहा है. हाल ही में सामने आए आंकड़ों ने इस चर्चा को एक नई दिशा दी है. यह चार्ट स्पष्ट करता है कि भारत के विभिन्न राज्यों में मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल के दौरान सत्ता की बागडोर किन सामाजिक वर्गों के हाथों में रही है. पर्सन-डेज के आधार पर यह विश्लेषण दिखाता है कि दशकों से चली आ रही राजनीतिक परंपराएं कितनी जटिल और भिन्न रही हैं. आइए, आंकड़ों की इस गहराई में जाकर सत्ता की सामाजिक संरचना को विस्तार से समझते हैं.
राज्यों का हाल- उच्च जातियों का वर्चस्व
आंकड़ों की इस सूची में सबसे चौंकाने वाली तस्वीर उन राज्यों की है जहां सामान्य वर्ग (GEN) का प्रतिनिधित्व भारी रहा है. पश्चिम बंगाल इस फेहरिस्त में सबसे ऊपर है, जहां मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल का 99.7 प्रतिशत हिस्सा सामान्य वर्ग के नेताओं के पास रहा है. यही स्थिति आंध्र प्रदेश (97%), हरियाणा (95.4%), ओडिशा (92%) और पंजाब (91.5%) की है. इन राज्यों में दशकों तक सत्ता का अधिकांश समय मुख्य रूप से सामान्य वर्ग के मुख्यमंत्रियों ने ही संभाला है. यह दर्शाता है कि इन राज्यों में राजनीतिक नेतृत्व के शीर्ष पर सामाजिक गतिशीलता उतनी तेज नहीं रही है, जितनी अन्य क्षेत्रों में देखी गई.
राजस्थान और महाराष्ट्र का राजनीतिक समीकरण
राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में सत्ता का वितरण थोड़ा अधिक विविधतापूर्ण नजर आता है. राजस्थान में सामान्य वर्ग का हिस्सा 74.9 प्रतिशत है, जबकि ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व 20.7 प्रतिशत तक पहुंचता है. इसी तरह महाराष्ट्र में सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी 73.6 प्रतिशत है, जबकि ओबीसी वर्ग के मुख्यमंत्रियों का कार्यकाल 21.2 प्रतिशत रहा है. इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि इन राज्यों की राजनीति में ओबीसी वर्ग ने धीरे-धीरे अपनी जगह मजबूत की है, हालांकि अभी भी नेतृत्व का बड़ा हिस्सा सामान्य वर्ग के पास ही है.
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मध्य प्रदेश और गुजरात का सामाजिक परिदृश्य
मध्य प्रदेश और गुजरात में ओबीसी वर्ग की राजनीतिक भागीदारी का ग्राफ अन्य राज्यों की तुलना में अधिक स्पष्ट दिखता है. मध्य प्रदेश में सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व 69 प्रतिशत है, तो वहीं ओबीसी वर्ग ने 31 प्रतिशत तक की हिस्सेदारी दर्ज की है. गुजरात में सामान्य वर्ग की भागीदारी 63.8 प्रतिशत है, जबकि ओबीसी वर्ग के मुख्यमंत्रियों का कार्यकाल 29.1 प्रतिशत रहा है. इन राज्यों के राजनीतिक विश्लेषण से पता चलता है कि यहां सामाजिक वर्ग की भागीदारी के मायने बदलते हुए भारतीय राजनीति की नई इबारत लिख रहे हैं.
उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ का नया सामाजिक ढांचा
राजनीति की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में सत्ता का गणित सामाजिक विविधता को दर्शाता है. यहां सामान्य वर्ग की भागीदारी 63.1 प्रतिशत है, जबकि ओबीसी वर्ग ने 26.8 प्रतिशत हिस्सेदारी साझा की है. इसके अतिरिक्त, उत्तर प्रदेश में एससी (SC) वर्ग की भागीदारी 10.2 प्रतिशत के साथ दर्ज की गई है, जो राज्य के जटिल सामाजिक समीकरणों की झलक देती है. वहीं छत्तीसगढ़ की बात करें तो वहां सामान्य वर्ग (59%) के बाद ओबीसी (19.6%) और एसटी (21.4%) वर्ग की भागीदारी राजनीति में एक नए संतुलन की ओर इशारा करती है.
तमिलनाडु, बिहार और कर्नाटक की बदलती तस्वीर
दक्षिण के राज्य तमिलनाडु में राजनीति की धारा पूरी तरह अलग रही है, जहां ओबीसी वर्ग की भागीदारी 54.9 प्रतिशत है, जो सामान्य वर्ग (45.1%) से भी अधिक है. बिहार का आंकड़ा भी कुछ ऐसा ही है, जहां ओबीसी वर्ग के मुख्यमंत्रियों का कार्यकाल 52.8 प्रतिशत रहा है, जबकि सामान्य वर्ग 41.2 प्रतिशत पर है. यह उत्तर और दक्षिण भारत की राजनीति के बीच के बड़े अंतर को रेखांकित करता है. कर्नाटक में स्थिति और भी स्पष्ट है, जहां ओबीसी वर्ग की हिस्सेदारी 75 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो सीधे तौर पर सामाजिक न्याय की राजनीति के प्रभाव को दर्शाती है.
झारखंड की सबसे अलग राजनीतिक दास्तान
झारखंड का आंकड़ा इस पूरी सूची में सबसे अनूठा है. वहां मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में सामान्य वर्ग का हिस्सा केवल 21.1 प्रतिशत है, जबकि शेष 78.9 प्रतिशत हिस्सा एसटी (ST) वर्ग के पास रहा है. यह चार्ट न केवल अलग-अलग राज्यों के बीच सामाजिक विविधता को दिखाता है, बल्कि यह भी बताता है कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में नेतृत्व का स्वरूप अन्य राज्यों से कितना भिन्न और मौलिक है. यह पूरी जानकारी हमें बताती है कि भारत का हर राज्य अपनी अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण सत्ता के वितरण में अलग मानदंड स्थापित करता है.
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