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MM Naravane Book: क्या पब्लिश होने से पहले पढ़ सकते हैं पूर्व सेना प्रमुख एमएम नरवणे की किताब, जानें क्या हैं नियम?

एमएम नरवणे ने 2019 से 2022 तक बतौर आर्मी चीफ सर्विस दी थी. अपनी किताब फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी में उन्होंने करियर, नेतृत्व और 2020 के दौरान लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर हुए तनाव के बारे में लिखा है.

संसद में 2 फरवरी को लोकसभा की कार्यवाही के दौरान पूर्व सेना प्रमुख एमएम नरवणे की अनपब्लिश्ड बुक को लेकर जमकर हंगामा हुआ. दरअसल, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस किताब में मौजूद डोकलाम मुद्दे का जिक्र किया तो उन्हें रोक दिया गया. इसके बाद उन्होंने एक मैगजीन में मौजूद इस अप्रकाशित किताब के कुछ अंश पढ़ने की कोशिश की, जिस पर  रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह ने आपत्ति जताई.

उनका कहना था कि अप्रकाशित किताब के अंश सदन में नहीं पढ़े जा सकते है. वहीं, स्पीकर ओम बिरला ने भी संसद के नियमों के हवाला देकर इसे रोक दिया. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पब्लिश होने से पहले पूर्व सेना प्रमुख एमएम नरवणे की किताब पढ़ी जा सकती है? जानें क्या हैं इसके नियम?

किस किताब पर हो रहा विवाद?

भारतीय सेना के पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने 2019 से 2022 तक सेना में बतौर आर्मी चीफ सर्विस दी थी. उनकी किताब 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' काफी ज्यादा सुर्खियों में है. इस किताब में उन्होंने अपने करियर, नेतृत्व और खासकर 2020 में भारत-चीन सीमा पर लद्दाख में हुए तनाव के बारे में लिखा है. यह किताब 2024 के दौरान मार्केट में आने वाली थी, लेकिन अभी इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है. 

पब्लिश होने से पहले किताब पढ़ने के क्या हैं नियम?

भारत में पूर्व सैन्य अधिकारियों जैसे पूर्व सेना प्रमुख की किताबों पर सख्त नियम हैं. अगर किसी किताब में संवेदनशील जानकारी हैं तो उसके लिए खास नियम बनाए गए हैं. 

सेवारत अधिकारियों के लिए: सेवारत अधिकारियों पर Army Act, Official Secrets Act और Service Conduct Regulations के तहत प्रतिबंध होते हैं. ऐसे में कोई भी सैन्य अधिकारी बिना केंद्र सरकार की अनुमति के सेवा से जुड़ी जानकारी, राजनीतिक मुद्दे या गोपनीय बातें किताब, आर्टिकल या भाषण में नहीं बता सकता है. ऐसा करने पर सजा हो सकती है.

रिटायर्ड अधिकारियों के लिए: इनके लिए नियम थोड़े अलग हैं, लेकिन व्यवहार में बहुत सख्ती है. जून 2021 में सेंट्रल सिविल सर्विसेज (पेंशन) रूल्स में संशोधन किया गया, जिनमें बताया गया कि खुफिया या सुरक्षा से जुड़े विभागों में काम करने वाले रिटायर्ड अधिकारी बिना पूर्व अनुमति के अपनी सेवा से जुड़ी जानकारी प्रकाशित नहीं कर सकते है. रक्षा सेवाओं में भी इसी तरह की pre-publication clearance व्यवस्था लागू होती है. रक्षा सेवाओं पर ये नियम सीधे नहीं, बल्कि समान सिद्धांत (spirit) के रूप में लागू होते हैं.

  • पूर्व सेना प्रमुख जैसे उच्च पद के अधिकारी गोपनीय जानकारी रखते हैं. ऐसे में उनकी किताबों की 'प्री-पब्लिकेशन सिक्योरिटी क्लियरेंस' यानी पूर्व समीक्षा बेहद जरूरी होती है.
  • रक्षा मंत्रालय (MoD) और भारतीय सेना किताब की लाइन-बाय-लाइन जांच करती है.
  • अगर किताब में संवेदनशील बातें जैसे सीमा विवाद, ऑपरेशन या नीतियां हों तो सरकार बदलाव की मांग कर सकती है या पब्लिश करने की अनुमति पर रोक लगा सकती है.

जनरल नरवणे की किताब इसी प्रक्रिया में फंसी है. 2024 से यह किताब रक्षा मंत्रालय की समीक्षा में है. प्रकाशक को कहा गया कि समीक्षा पूरी होने तक किताब के अंश या सॉफ्ट कॉपी किसी को न दें. जनरल नरवणे ने खुद अक्टूबर 2025 में कहा था कि किताब लिखना उनका काम था, अनुमति लेना प्रकाशक का. किताब अब भी 'रिव्यू' में है और प्रकाशित नहीं हुई है.

क्या आम आदमी पढ़ सकता है यह किताब?

अगर कोई किताब प्रकाशित नहीं हुई है तो कानूनी रूप से यह आम नागरिकों के लिए उपलब्ध नहीं होती है. दरअसल, प्रकाशन से पहले किताब की पांडुलिपि (मैनुस्क्रिप्ट) केवल लेखक, प्रकाशक और समीक्षा करने वाले अधिकारी (रक्षा मंत्रालय/सेना) तक सीमित रहती है. ऐसे में कोई भी आम आदमी, पत्रकार या राजनीतिज्ञ इसे कानूनी रूप से नहीं पढ़ सकते हैं. अगर कोई लीक अंश पढ़ता है या शेयर करता है तो यह गोपनीयता उल्लंघन माना जा सकता है. लोकसभा में भी अप्रकाशित किताब के अंश पढ़ने की अनुमति नहीं मिली, क्योंकि संसद के नियम (रूल 349) के तहत सदन के काम से असंबंधित या Chair की अनुमति के बिना किसी बाहरी सामग्री को पढ़ने की अनुमति नहीं होती है. 

यह भी पढ़ें: गूगल पर क्यों ट्रेंड कर रहे नरवणे? पढ़ें उनकी जिंदगी के ये 10 अनसुने किस्से

खबर कोई भी हो... कैसी भी हो... उसकी नब्ज पकड़ना और पाठकों को उनके मन की बात समझाना कुमार सम्भव जैन की काबिलियत है. मुहब्बत की नगरी आगरा से मैंने पत्रकारिता की दुनिया में पहला कदम रखा, जो अदब के शहर लखनऊ में परवान चढ़ा. आगरा में अकिंचन भारत नाम के छोटे से अखबार में पत्रकारिता का पाठ पढ़ा तो लखनऊ में अमर उजाला ने खबरों से खेलना सिखाया. 

2010 में कारवां देश के आखिरी छोर यानी राजस्थान के श्रीगंगानगर पहुंचा तो दैनिक भास्कर ने मेरी मेहनत में जुनून का तड़का लगा दिया. यहां करीब डेढ़ साल बिताने के बाद दिल्ली ने अपने दिल में जगह दी और नवभारत टाइम्स में नौकरी दिला दी. एनबीटी में गुजरे सात साल ने हर उस क्षेत्र में महारत दिलाई, जिसका सपना छोटे-से शहर से निकला हर लड़का देखता है. साल 2018 था और डिजिटल ने अपना रंग जमाना शुरू कर दिया था तो मैंने भी हवा के रुख पकड़ लिया और भोपाल में दैनिक भास्कर पहुंच गया. 

झीलों के शहर की खूबसूरती ने दिल और दिमाग पर काबू तो किया, लेकिन जरूरतों ने वापस दिल्ली ला पटका और जनसत्ता में काफी कुछ सीखा. यह पहला ऐसा पड़ाव था, जिसकी आदत धारा के विपरीत चलना थी. इसके बाद अमर उजाला नोएडा में करीब तीन साल गुजारे और अब एबीपी न्यूज में बतौर फीचर एडिटर लोगों के दुख-दर्द और तकलीफ का इलाज ढूंढता हूं. करीब 18 साल के इस सफर में पत्रकारिता की दुनिया के हर कोने को खंगाला, चाहे वह रिपोर्टिंग हो या डेस्क... प्रिंटिंग हो या मैनेजमेंट... 

काम की बात तो बहुत हो चुकी अब अपने बारे में भी चंद बातें बयां कर देता हूं. मिजाज से मस्तमौला तो काम में दबंग दिखना मेरी पहचान है. घूमने-फिरने का शौकीन हूं तो कभी भी आवारा हवा के झोंके की तरह कहीं न कहीं निकल जाता हूं. पढ़ना-लिखना भी बेहद पसंद है और यारों के साथ वक्त बिताना ही मेरा पैशन है. 

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