संसद की कार्यवाही के बीच में बातचीत करने वाले सांसदों को क्या मिलती है सजा, क्या हैं इसके नियम
संसद में लगातार नियम तोड़ने या अव्यवस्था फैलाने पर सांसद को निलंबित भी किया जा सकता है. निलंबन की अवधि आमतौर पर शेष सत्र तक होती है. निलंबित सांसद सदन में नहीं बैठ सकता है.

संसद का बजट सत्र शुरू होते ही सदनों में हंगामे और अनुशासन को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं. 28 जनवरी यानी बुधवार को सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अभिभाषण से हुई, लेकिन पहले ही दिन भारी शोर-शराबे और विरोध के चलते लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही गुरुवार तक के लिए स्थगित करनी पड़ी थी. ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठते हैं कि संसद की कार्यवाही के दौरान नियमों का उल्लंघन करने या बातचीत, नारेबाजी और बाधा डालने वाले सांसदों के खिलाफ क्या कार्रवाई हो सकती है. चलिए तो आज हम आपको बताते हैं कि संसद की कार्यवाही के बीच में बातचीत करने वाले सांसदों को क्या सजा मिलती हैं और इसके क्या नियम है.
सदन में अनुशासन बनाए रखने का अधिकार किसके पास?
संसद के नियमों के अनुसार लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति को सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने की पूरी शक्ति प्राप्त होती है. अगर कोई सांसद अध्यक्ष निर्देशों की अनदेखी करता है या बार-बार व्यवधान पैदा करता है, तो पीठासीन अधिकारी उसे चेतावनी दे सकता है या आगे की कार्रवाई शुरू कर सकता है. वहीं अगर कोई सांसद कार्यवाही के दौरान लगातार बातचीत करता है, नारे लगाता है या जानबूझकर सदन का कामकाज रोकता है तो इसे कदाचार माना जाता है. ऐसे मामलों में सांसद को सदन से बाहर जाने का निर्देश दिया जा सकता है या उन्हें अनुशासन में रहने की चेतावनी दी जाती है.
क्या है निलंबन की सबसे बड़ी सजा?
संसद में लगातार नियम तोड़ने या अव्यवस्था फैलाने पर सांसद को निलंबित भी किया जा सकता है. निलंबन की अवधि आमतौर पर शेष सत्र तक होती है. निलंबित सांसद न तो सदन में बैठ सकता है, न सवाल पूछ सकता है और न ही किसी समिति की बैठक में हिस्सा ले सकता है. इसे संसद की सबसे गंभीर सजाओं में गिना जाता है.
क्या सभापति अकेले कर सकते हैं निलंबित?
संसद की कार्यवाही शुरू करने का अधिकार सभापति के पास होता है, लेकिन किसी सांसद को निलंबित करने का अंतिम फैसला सदन करता है. संसदीय कार्य मंत्री या कोई अन्य मंत्री इस संबंध में प्रस्ताव रखता है जिस पर सदन की मंजूरी जरूरी होती है. अगर सांसद का व्यवहार सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाता है या बार-बार कार्यवाही बाधित करता है तो उस पर विशेषाधिकार उल्लंघन का आरोप भी लग सकता है. ऐसे मामलों की जांच विशेषाधिकार समिति करती है और फिर सदन तय करता है कि क्या सजा दी जाए.
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Source: IOCL
























