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(Source: ECI/ABP News)

Ice from during Summer: गर्मी में कहां से बर्फ मंगवाते थे अंग्रेज अफसर और राजा, बड़ा रोचक है किस्सा

राजधानी दिल्ली समेत पूरे भारत में भीषण गर्मी पड़नी शुरू हो चुकी है. इस गर्मी में अधिकांश लोग ठंडा पानी और बर्फ की मांग करते हैं. लेकिन सवाल ये है कि जब मशीनें नहीं थी, उस वक्त बर्फ कहां से आता था?

राजधानी दिल्ली समेत भारत और दुनियाभर के कई इलाकों में भीषण गर्मी पड़ रही है. गर्मी पड़ने के साथ ही लोग अक्सर ठंडा पानी पीना पसंद करते हैं. क्योंकि गर्मी में ठंडा पानी शरीर को राहत देता है. लेकिन सवाल ये है कि जब घरों में फ्रिज नहीं था, उस वक्त अंग्रेज और मुगल कैसे चिल्ड पानी और बर्फ को लेकर आते थे. आज हम आपको बताएंगे कि पहले के समय कैसे और कहां से बर्फ आता था.

गर्मी में बर्फ

गर्मी के वक्त बर्फ से बहुत राहत मिलती है. लेकिन आपने कभी सोचा है कि जब फ्रिज और मशीन नहीं था, उस वक्त भारत में राजा और महाराजा कैसे बर्फ मंगवाते थे. आपको सुनकर थोड़ा आश्चर्य होगा कि अंग्रेजों के जमाने में बर्फ बड़े पैमाने पर विदेशों से समुद्री जहाजों से आता था. हालांकि इसकी कहानी काफी दिलचस्प है.

बता दें कि भारत में राजा-महाराजा और धनी लोग पहाड़ों से बर्फ के टुकड़े मंगवाते थे. भारत में मुगल बादशाह हुमायूं ने 1500 में कश्मीर से बर्फ को तोड़कर उसकी सिल्लियों का आयात करना शुरू किया था. जिसके बाद फिर मुगल राजा फलों के रस को बर्फ से लदे पहाड़ों की ओर भेजते थे.वहां उन रसों को जमाकर शर्बत बनाते थे. फिर इसे गर्मियों के इलाज के रूप में पीते थे.

बर्फ पिघलने से रोकना

बता दें कि राजा-महाराजाओं के अलावा मुगलों के दौर में बर्फ को पिघलने से रोकने के लिए उस पर सॉल्टपीटर (पोटेशियम नाइट्रेट) छिड़का जाता था. जानकारी के मुताबिक कुल्फी भारत में मुगलकाल से बनना शुरू हुई थी. अकबर के शासन काल में हिमालय की वादियों से बर्फ को लेकर आते थे. इसके लिए हाथी, घोड़ों और सिपाहियों की सहायता ली जाती थी. 

अंग्रेजों के लिए कहां से आती थी बर्फ 

जानकारी के मुताबिक सन् 1833 में दिल्ली में बर्फ अमेरिका से आयी थी. उस वक्त बर्फ के लिए स्वयं तत्कालीन गवर्नर जरनल ने जहाज के कप्तान की शुक्रिया अदा किया था. हालांकि अंग्रेजो को बर्फ मंगवाने को यह तरीका बहुत महंगा लगा था. जिसके बाद उन्होंने दिल्ली में ही बर्फ जमाने का प्रबंध किया था. दिल्ली गेट से तुर्कमान गेट तक खंदकें खोदकर उनमें नमक मिला पानी भर कर टाट और भूसे की मदद से सर्दियों में बर्फ की पपड़ी तैयार की जाती थी, जिसे विशेष गड्ढों से गर्मियों तक सुरक्षित रखा जाता था.

कैसे बनी पानी से बर्फ जमाने की मशीन

जानकारी के मुताबिक वेन पियर्स और उसके सहयोगियों ने 14 मार्च 1950 को एक मशीन बनाई थी, जो बर्फ बनाती थी. कंपनी को 1954 में पेटेंट दिया गया था. उसने कुछ बर्फ बनाने वाली मशीनें स्थापित की थी, लेकिन वे अपने बर्फ बनाने के व्यवसाय को बहुत आगे तक नहीं लेकर जा सके थे. 1956 में उन्होंने अपनी कंपनी और स्नोमेकिंग मशीन के पेटेंट अधिकार एम्हार्ट कॉर्पोरेशन को बेच दिया था. इसके बाद जेम्स हैरिसन ने 1851 में पहली बर्फ बनाने की मशीन बनाई थी. मशीन बनाने के लिए उसने ईथर वाष्प संपीड़न का उपयोग किया था. 1855 में हैरिसन को ईथर वाष्प-संपीड़न प्रशीतन प्रणाली के लिए पेटेंट प्रदान किया गया था. हैरिसन की मशीन रोज 3,000 किलोग्राम बर्फ बना सकती थी.

भारत में कैसे आया बर्फ बनाने की मशीन

सवाल ये है कि भारत में कैसे बर्फ बनाने की मशीन आई थी. जानकारी के मुताबिक से जमाई गई बर्फ को बेचने का काम बिल ट्यूडर ने किया था. उनका जन्म बोस्टन में एक धनी अमेरिकी परिवार में हुआ था. हालांकि शुरूआत में उन्हें इस धंधे में निराशा हाथ लगी थी, लेकिन बाद में वह सफल हो गये थे. ट्यूडर का सबसे बड़ा ग्राहक सैमुअल ऑस्टिन के रूप में आया, जो एक व्यापारी था, जो अक्सर भारत में व्यापार करता था. हालांकि कहा जाता है कि 1808 में बेंजामिन रोबक ने मद्रास में बर्फ बनाने का प्रदर्शन किया था, लेकिन इस बारे में ना तो जानकारी मिलती है और ना ही लोगों ने इसमें दिलचस्पी दिखाई थी.

वहीं ऑस्टिन को पता था कि भारत में अंग्रेज़ बारहमासी गर्मी से जूझ रहे थे. उन्हें बर्फ बेचना अच्छा बिजनेस हो सकता है. जिसके बाद उसने ट्यूडर के साथ साझेदारी की थी, अपने जहाजों पर बर्फ लादकर कोलकाता की ओर चल पड़े थे. 12 मई 1833 को ट्यूडर आइस कंपनी की 100 टन बर्फ की पहली खेप धूल भरे गर्म कोलकाता में उतरी थी. तीन पेंस प्रति पाउंड (2 पेंस में 2.12 रुपये होते हैं और 01 पौंड में 450 ग्राम) बेची गई थी. जो तब किसी भी अन्य बर्फ व्यापारी की तुलना में बहुत सस्ती थी. कहा जाता है कि यही कारण है कि भारत में ट्यूडर का बर्फ साम्राज्य अगले 20 वर्षों तक बढ़ता गया था, जिससे उसे 2 मिलियन डॉलर (16 करोड़ रुपए) से अधिक का मुनाफा हुआ था. मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में बर्फ के घर आज भी वैसे ही खड़े हैं.

इसके बाद 1844 में डॉक्टर जॉन गोरी ने एयर कंडीशनर का आविष्कार किया था. जिसके बाद फिर बर्फ बनाने वाली मशीन का आविष्कार किया. इससे ट्यूडर आइस कंपनी ही नहीं पूरे बर्फ उद्योग पर असर पड़ने लगा था. हालांकि रेफ्रिजरेटर का आविष्कार 1913 में हुआ था. इसने बर्फ बेचने के बिजनेस को बुरी तरह चोट पहुंचाया था. अब लोग फ्रीज के जरिए घरों में बर्फ बना सकते थे. हालांकि भारत में मध्य वर्गीय घरों में सही मायनों में फ्रीज 90 के दशक में ही पहुंचा है.

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