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Balochistan Militants Attacks: खुद को बम से उड़ाने के लिए कैसे तैयार हो जाता है इंसान, क्या होते हैं फिदायीन और कैसे होती है इनकी ट्रेनिंग?

Balochistan Militants Attacks: पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में एक बड़ा फिदायीन हमला हुआ है. आइए जानते हैं क्या होता है फिदायीन और कैसे होती है इनकी ट्रेनिंग.

Balochistan Militants Attacks: पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने हाल ही में फिदायीन हमले किए हैं. इस हिंसा में पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मियों सहित लगभग 50 लोगों की जान चली गई है. इसी बीच आइए जानते हैं कि आखिर फिदायीन क्या होते हैं और इनकी ट्रेनिंग कैसे होती है.

फिदायीन शब्द का क्या मतलब है 

यह शब्द अरबी मूल फिदा से आया है. इसका मतलब होता है बलिदान या फिर समर्पण. उग्रवादी मामले में फिदायीन लड़ाकों को कहा जाता है जो किसी राजनीतिक या फिर वैचारिक उद्देश्य के लिए अपनी जान को जोखिम में डालने या फिर देने के लिए तैयार रहते हैं. आपको बता दें कि सभी फिदायीन ऑपरेशन एक जैसे नहीं होते. 

आत्मघाती हमलावर और फिदायीन लड़ाकों के बीच अंतर 

आत्मघाती हमलावर का उद्देश्य आमतौर पर विस्फोट के क्षण में पूरा हो जाता है. इसमें मृत्यु तात्कालिक और काम का बड़ा हिस्सा होती है. इसके ठीक उलट फिदायीन हमलावर अक्सर हथियारबंद होकर लक्ष्य क्षेत्र में प्रवेश करते हैं और जब तक मारे नहीं जाते तब तक लड़ते रहते हैं. मृत्यु की उम्मीद होती है लेकिन लक्ष्य हमले को लंबा खींचना और ज्यादा प्रभाव डालना होता है.

कोई कैसे हो जाता है इस काम के लिए तैयार 

मनोविज्ञान और आतंकवाद अध्ययन में शोध करने से ऐसा पता चलता है कि आत्मघाती हमलावर हिंसक पैदा नहीं होते हैं और ना ही वे अचानक बदलते हैं. यह प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है. कई रंगरूट सामाजिक अलगाव, अपमान, राजनीतिक शिकायत या फिर व्यक्तिगत नुकसान को झेलने के बाद यह कदम उठाते हैं. किसी संघर्ष में परिवार के सदस्य की मृत्यु जैसे हादसे अन्याय और गुस्से की गहरी भावना को पैदा कर सकते हैं. चरमपंथी समूह इसी कमजोरी का फायदा उठाते हैं और निराशा को दुश्मनी में बदल देते हैं.

इन्हें यह विश्वास दिलाया जाता है कि उनका जीवन जो शायद किसी काम का नहीं है बलिदान के जरिए किसी शाश्वत अर्थ को प्राप्त कर सकता है. प्रोपेगेंडा मौत को सम्मान, शहादत या फिर आध्यात्मिक जीत के रूप में दिखता है. धीरे-धीरे मौत का डर इस सोच में बदल जाता है कि मरना कोई नुकसान नहीं है बल्कि यह इनाम है.

कैसे होती है ट्रेनिंग 

ट्रेनिंग शारीरिक से ज्यादा मानसिक होती है. जो भी नए लोग आते हैं उन्हें अक्सर परिवार, दोस्त और आजाद जानकारी से अलग कर दिया जाता है. प्रोपेगेंडा वीडियो,  चुनिंदा धार्मिक या फिर राजनीतिक कहानी और विरोधियों को इंसान ना समझने वाली बातों के लगातार संपर्क में रहने से उनका दुनिया को देखने का नजरिया पूरी तरह से बदल जाता है.

आखिरी चरण में हमलावरों से अक्सर विदाई संदेश या फिर वीडियो रिकॉर्ड करने के लिए कहा जाता है. यह कदम एक ऐसा बिंदु बन जाता है जहां से वापस नहीं लौट जा सकता. यह मनोवैज्ञानिक रूप से भागने या फिर शक करने के सभी रास्ते बंद कर देता है. इस स्टेज तक व्यक्ति की पहचान पूरी तरह से मिशन के साथ जुड़ जाती है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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