श्रद्धांजलि: 'इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं' का संगीत देने वाले सदाबहार संगीतकार खय्याम का निधन
उन्होंने हिंदी सिनेमा को एक से बढ़कर धुनें दीं. इनमें उमराव जान, बाजार, खानदान और कभी कभी का संगीत सबसे ज्यादा चर्चित हुआ. आज भी इन फिल्मों को खय्याम के संगीत के कारण ही ज्यादा जाना जाता है. खय्याम का पूरा नाम मोहम्मद जहूर खय्याम हाशमी था.

नई दिल्ली: खय्याम जिनका संगीत अंतरात्मा को आवाज देती है. जिनकी सुरों की साधना एक संजीव संगीतमय जीवन की तरह सीधे खुदा की इबादत करती हुई दिखती है. उनके बनाए गए संगीत को सुनकर अंतरमन भी साज़ और आवाज की तरंगों से तरंगित हो जाती है. सुरों के घुंघरूओं से झंकृत होता उनका संगीत सुनकर ऐसा लगता है मानों चहुं ओर मधुरता बिखेर रही हो. अब नए रूप में खय्याम की संगती नहीं सुनाई देगी. 92 साल की उम्र में आज उनका निधन हो गया.
खय्याम ने जब भी संगीत बनाई तो उनकी धुन दिलों के तार को ताजी हवा के झोंकों की तरह हौले से झंकृत कर जाती थी, लेकिन उन्हें साधारण संगतीकार समझना भूल होगा क्योंकि उन्होंने जहां एक तरफ मज़रूह सुल्तानपुरी, साहिर लु्धियानवी, कैफ़ी आज़मी जैसे पुराने और मंझे हुए गीतकारों और गज़लकारों के लिए संगीत दिया है तो वहीं निदा फ़ाज़ली और अहमद वासी जैसे लेखकों की गज़लों को भी अपने सुरों से सजाया. उनकी बनाई संगीत में गजब का सुरूर था.. "इन आंखों की मस्ती के" हो या "ये क्या जगह है दोस्तों" सभी गाने आज तक लोगों के जुबां पर हैं.
ख़य्याम का पूरा नाम है मोहम्मद जहूर ख़य्याम हाशमी है. इनका जन्म 18 फ़रवरी, 1927 को पंजाब के जालंधर जिले के नवाब शहर में हुआ था. पूरा परिवार शिक्षित-दीक्षित था. परिवार में कुल चार भाई और एक बहन थे. सबसे बड़े भाई अमीन परिवार का ट्रांसपोर्ट बिजनेस देखते थे. दूसरे भाई मुश्ताक जनरल मैनेजर के पद से रिटायर हुए. तीसरे भाई गुलजार हाशमी शायरी करते थे, लेकिन छोटी उम्र में इंतकाल हो गया. ख़य्याम अपने पिता के चौथे बेटे थे, जो संगीत के शौक के कारण पांचवीं तक पढ़ाई कर घर से भागना पड़ा.
ख़य्याम के मामाजी को गीत-संगीत से लगाव था. उन्होंने ही मुंबई में ख़य्याम को बाबा चिश्ती से मिलवाया, जो बी.आर. चोपड़ा की फिल्म 'ये है जिन्दगी' का संगीत तैयार कर रहे थे. .बाबा ने उन्हें अपना सहयोगी तो बना लिया, मगर कहा कि पैसा-टका कुछ नहीं मिलेगा. संगीतकार ख़य्याम ने फिल्म रोमियो एंड जूलियट में एक्टिंग भी की है.
मोहम्मद जहुर 'खय्याम' हाशमी ने संगीत की दुनिया में अपना सफर 17 साल की उम्र में लुधियाना से शुरू किया था. खय्याम ने संगीतकार के तौर पर अपने करियर की शुरुआत 1948 में फिल्म ‘हीर रांझा’ की थी. 'वो सुबह कभी तो आएगी', 'जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आंखें मुझमें', 'बुझा दिए हैं खुद अपने हाथों, 'ठहरिए होश में आ लूं', 'तुम अपना रंजो गम अपनी परेशानी मुझे दे दो', 'शामे गम की कसम', 'बहारों मेरा जीवन भी संवारो' जैसे कई गानों में खय्याम ने अपने संगीत से चार चांद लगाए. खय्याम ने पहली बार फिल्म 'हीर रांझा' में संगीत दिया लेकिन मोहम्मद रफी के गीत 'अकेले में वह घबराते तो होंगे' से उन्हें बॉलीवुड में पहचान मिली. इसके बाद फिल्म 'शोला और शबनम' ने उन्हें संगीतकार के तौर पर स्थापित कर दिया.
हालांकि उन्हें अपने करियर का पहला मेजर ब्रेक ब्लॉकबस्टर मूवी 'उमराव जान' से मिला था, जिसके गाने आज भी इंडस्ट्री में और लोगों के दिलों में जगह बनाए हुए हैं. इसके अलावा खय्याम साहब का रक्षाबंधन पर एक गाना ''चंदा रे मेरे भैया से कहना बहना याद करे.'' बहुत हिट रहा गाना रहा.
चार दशक के करियर में उनकी पहचान बेहद कम मगर उम्दा किस्म का संगीत देने वाले संगीतकार के रूप में बनी. 2007 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड तो, वहीं 2011 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से नवाजा गया. 'फिर सुबह होगी' के अलावा जिन फिल्मों में उनके संगीत की काफी चर्चा हुई, उनमें कभी कभी, उमराव जान, थोड़ी सी बेवफाई, बाजार, नूरी, दर्द, रजिया सुल्तान, पर्वत के उस पार, त्रिशूल जैसी फिल्मों का शुमार है.
टॉप हेडलाइंस
Source: IOCL





















