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बर्थडे स्पेशल: इंकलाबी अंदाज से दिल और सियासत दोनों को साधते थे शायर मजरूह सुल्तानपुरी

मजरूह व्यवस्थाओं की गोद में बैठकर तमगे लूटने वालों में से नहीं थे. वह तो सियासत की छाती पर चढ़ कर इंकलाबी अंदाज में अपनी बात कहते थे. मजरूह का दिल शोषितों के लिए धड़कता था. वह आजादी के बाद इस नए मुल्क में समानता का सपना देखते थे.

नई दिल्ली: शायर वही जो अपनी कलम से न सिर्फ इश्क के मचलते अरमान लिखे बल्कि सुलगते अरमान भी लिखे. कवि वही जो केवल श्रृंगार रस की कविताओं में ही न खोया रहे बल्कि वक्त आने पर हुकूमत के खिलाफ भी कलम चलाए. कलम की दुनिया की एक ऐसी ही अजीम शख़्सियत थे मजरूह सुल्तानपुरी. मजरूह एक ऐसे शायर हैं जिनकी शायरी वक्त की मोहताज नहीं. आज भी उनके लिखे शेर लोगों के जबान पर चढ़े हुए हैं.

एहसासों को आवाज़ देने वाले थे मजरूह

मजरूह आजादी मिलने के 2 साल पहले एक मुशायरे में मुंबई गए. उस मुशायरे में मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक कारदार साहब भी वहां मौजूद थे जो मजरूह को सुनते ही वह उनके कायल हो गए. उन्होंने मजरूह को अपनी फिल्म में लिखने का ऑफर दिया, मगर मजरूह ने इंकार कर दिया. उस समय मजरूह के एक बेहद खास दोस्त हुआ करते थे मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी. उन्होंने मजरूह को समझाया कि वह फिल्मों के लिए भी लिखना शुरू करें. काफी मनाने के बाद मजरूह मान गए और उन्होंने अपना पहला गाना फिल्म 'शाहजहां' के लिए लिखा.

इस गीत को आवाज दी थी मशहूर गायक कुंदनलाल सहगल ने और संगीत था नौशाद साहब का. इस गीत के बोल थे 'जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगे'. मजरूह का यह गीत इश्क में असफल हुए लोगों की ज़बान पर चढ़ हुआ था. इस गीत से जो मजरूह का फिल्मी सफर शुरू हुआ तो बस एक के एक बाद एक नग्में उनकी कलम से जन्म लेते गए. 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे, फिर भी कभी अब नाम को तेरे, आवाज़ मैं न दूंगा.' दोस्ती फिल्म के इस गीत के लिए उन्हें पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला.

नेहरू पर लिखी कविता तो जाना पड़ा जेल

मजरूह व्यवस्थाओं की गोद में बैठकर तमगे लूटने वालों में से नहीं थे. वह तो सियासत की छाती पर चढ़ कर इंकलाबी अंदाज में अपनी बात कहते थे. मजरूह का दिल शोषितों के लिए धड़कता था. वह आजादी के बाद इस नए मुल्क में समानता का सपना देखते थे. वह प्रगतिशील लेखक संघ के साथ भी जुड़े थे. एक बार मुंबई में मजदूरों की हड़ताल चल रही थी. इस हड़ताल के दौरान मजरूह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ एक ऐसी कविता पढ़ दी कि उन्हें जेल में डाल दिया गया.

दरअसल, उस वक्त मुंबई के गवर्नर मोरार जी देसाई थे. उन्होंने अभिनेता बलराज साहनी और मजरूह सुल्तानपुरी समेत कई लोगों को  ऑर्थर रोड जेल में डाल दिया. मजरूह को जेल में नेहरू से माफी मांगने का प्रस्ताव मिला मगर मजरूह को जेल की कैद मंजूर थी उनकी कलम का कद छोटा हो यह मंजूर नहीं था. परिणाम स्वरूप उन्हें 2 साल जेल में रहना पड़ा. आप भी पढिए मजरूह ने नेहरू के लिए कौन सी कविता पढ़ी थी.

मन में ज़हर डॉलर के बसा के फिरती है भारत की अहिंसा खादी की केंचुल को पहनकर ये केंचुल लहराने न पाए ये भी है हिटलर का चेला मार लो साथी जाने न पाए कॉमनवेल्थ का दास है नेहरू मार लो साथी जाने न पाए

मजरूह के लिए मसीउद्दीन ने क्यों कहा 'वो शेर पढ़ें और मैं ऑपरेशन कर दूं'

मजरूह का कद जैसे-जैसे शायरी की दुनिया में बढ़ रहा था वैसे-वैसे उनको नापसंद करने वालों की भी तादाद बढ़ती गई. उनको सबसे ज्यादा नापसंद करते थे मसीउद्दीन. वह उन्हें फूटी आंख भी नहीं पसंद करते थे. मजरूह का शाब्दिक अर्थ होता है 'घायल' इसलिए मसीउद्दीन ने अपना नाम रख लिया 'जर्राह' जिसका अर्थ होता है इलाज करने वाला. वह खुद को मजरूह का इलाज करने वाला मानते थे. बात यहां तक पहुंच गई कि वह मजरूह के खिलाफ अपनी नापसंदगी की घोषणा खुले तौर पर कर दी थी. उन्होंने लिखा.

जर्राह हूं मैं सिन्फ़-ए-जराहत की कसम वो शेर पढ़ें और मैं ऑपरेशन कर दूं

मसीउद्दीन मजरूह को शायर मानते ही नहीं थे. वह उन्हें गाने-बजाने वाला मानते थे. एक मुशायरे में जब सब शायर पढ़ चुके थे और बारी अब मजरूह की थी तो मसीउद्दीन ने कहा-

बज्में अदब अब खत्म हुई अब चल दो ऐ मसीह मजरूह आ रहे हैं जनाब सारंगी उठाइए

'मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर' इस शेर से जुड़ा है दिलचस्प किस्सा

मजरूह का सबसे मशहूर शेर है

मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया

इस शेर के साथ एक दिलचस्प किस्सा जुड़ा है. इस शेर का दूसरा मिसरा पहले यूं था कि 'गैर साथ आते गए कारवां बनता गया' जब मजरूह ने यह शेर अपने दोस्तों के बीच पढ़ा तो लोगों ने कहा ये गैर शब्द क्या है. इसका प्रयोग नहीं होना चाहिए था. उस वक्त कृष्ण सिंह चंदर ने मजरूह का बचाव करते हुए कहा था कि गैर शब्द में कोई दिक्कत नहीं. उन्होंने कहा, 'जेहनी सफ़र में जब इंसान चलता है तो हर शख्स उसके लिए गैर होता है, और फिर जब वो साथ मिल जाता है तो अपना हो जाता है'. उस वक्त सब मान गए लेकिन बाद में मजरूह ने खुद गैर शब्द की जगह लोग शब्द के साथ शेर को प्रकाशित करवाया.

मजरूह ने लगभग 350 फिल्मों में 2 हजार से ज्यादा गीत लिखे लेकिन गीतों को वह कभी अपनी ग़ज़ल नहीं मानते थे. जब भी किसी मुशायरे में उनसे किसी गीत की फरमाइश होती थी तो वह कहते थे कि गीत आप लता मंगेशकर से सुनिएगा. मुझसे मेरी गजल सुन लीजिए. मजरूह ने हिन्दी सिनेमा के गीतों में साहित्य को एक नई उंचाई दी. मजरूह कैरेक्‍टर के मिज़ाज़ के मुताबिक़ लिखते हुए भी तहज़ीब से ज़रा भी नहीं हटते थे. यही कारण है कि जब एक समारोह में उनसे आजकल के फिल्मी गानों में इस्तेमाल होने वाली भाषा को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा,'आजकल कलम के साथ वेश्यावृत्ति होती है.'

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