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ऐसा गांव जो गुजरात में है, लेकिन नहीं डालेगा विधानसभा चुनावों में वोट...

गुजरात विधानसभा चुनावों के लिए 1 और 5 दिसंबर को मतदान होगा, लेकिन पीएम मोदी के गृहराज्य में साजनपुर नाम का एक गांव ऐसा भी है जो इन चुनावों में शिरकत नहीं करेगा. इसके मतदाता किसी को वोट नहीं डालेंगे.

गुजरात में 2022 विधानसभा चुनावों की चहल-पहल है. यहां मतदान में अब महज कुछ ही दिन बचे हैं. 1 और 5 दिसंबर को दो चरणों में होने जा रहे मतदान से पहले सभी राजनीतिक दल अपनी उम्मीदवारों के प्रचार में लगे हुए है. इस वजह से सूबे के छोटा उदयपुर जिले के तिमला गांव में भी काफी गहमागहमी है. चुनावी अभियान में जुटे नेता इस गांव के मतदाताओं को लुभाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं, इसी गांव के नजदीक बसे गांव साजनपुर में चुनावों को लेकर कोई  खास उत्साह नहीं है.

यहां वीराना पसरा हुआ है. ये गांव है तो इसी जिले के अंदर, लेकिन इसके बावजूद यहां के गांववाले किसी गुजरात विधानसभा में किसी भी उम्मीदवार को वोट देने का हक नहीं रखते है. इसके पीछे भौगोलिक और प्रशासनिक स्थितियां जवाबदेह है. आइए जानते हैं आखिर क्यों साजनपुर वाले लोकतंत्र के इस उत्सव में शिरकत नहीं कर पाएंगे?

साजनपुर का दिल है एमपी में...

साजनपुर गांव में गुजरात चुनाव को लेकर न तो कहीं बैनर दिखाई दे रहे हैं. न लॉउडस्पीकर का शोर है और न ही चुनावी चर्चाएं चल रही है. कुल मिलाकर यहां चुनावी बुखार का कोई असर नहीं दिखाई दे रहा है. इस गांव में जिंदगी अपनी आम रफ्तार से दौड़ रही है. दरअसल मसला है ये है कि ये गांव है तो गुजरात के छोटा उदयपुर जिले की सीमा के अंदर,लेकिन शासकीय नजरिए से देखा जाए तो इस जिले और गुजरात से साजनपुर का दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है.

ये गांव केवल भौगोलिक नजरिए से ही गुजरात का हिस्सा है. असल में शासकीय तौर पर ये मध्य प्रदेश  के अलीराजपुर जिले का गांव है. इस तरह से देखा जाए तो साजनपुर का शरीर तो गुजरात में है, लेकिन दिल और आत्मा मध्यप्रदेश में है. अलीराजपुर जिला एमपी के पश्चिमी भाग में पड़ता है और उसी का गांव है साजनपुर. अलीराजपुर से इसकी दूरी महज 35 किलोमीटर है. साल 2011 की जनगणना के मुताबिक  370.74 हेक्टेयर में फैले इस गांव के 212 परिवारों में 1244 की आबादी बसती है.

इस गांव की साक्षरता दर 25.72 फीसदी है. यहां पुरुषों के मुकाबले महिलाएं अधिक पढ़ी-लिखी और आबादी में भी पुरुषों से अधिक हैं. यहां की आबादी में 598 पुरुष और 647 महिलाएं है. पुरुषों की साक्षरता दर 23.08 फीसदी है तो वहीं महिलाओं की साक्षरता दर 28.17 फीसदी है. गांव से 50 किलोमीटर की दूरी बसा भावरा शहर यहां की अहम गतिविधियों का केंद्र है. ये अनूठा गांव अपने सूबे एमपी के बॉर्डर से महज 3 किलोमीटर की दूरी पर है. 

गुजराती नहीं हिंदी का बोलबाला

गुजरात के गांवों से घिरा ये गांव एक टापू जैसा एहसास देता है. इसकी सीमा तक मध्य प्रदेश से नहीं लगती है, लेकिन ये फिर भी इस सूबे में आता है. इस गांव में अगर किसी को आना हो तो उसे गुजरात होकर ही आना पड़ता है. साजनपुर एक ऐसा गांव है  जिसकी जुबान पर गुजराती भाषा  चढ़ी हुई है, लेकिन यहां के सभी साइनबोर्ड हिंदी में है, यहां तक कि स्कूलों के साइन बोर्ड भी हिंदी में है.

यहां कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय और माध्यमिक विद्यालय में हिंदी माध्यन से पढ़ाई होती है, क्योंकि ये गांव शासकीय हिसाब से मध्य प्रदेश में आता है. इस गांव की बोली और संस्कृति में हिंदी और गुजराती का मेल दिखता है. आर्थिक कामों के लिए भी यहां के गांववाले गुजरात के ही भरोसे रहते हैं. यहां मोबाइल और इंटरनेट भी गुजरात का चलता है.

यहां के गांव वालों की मानें तो देश की आजादी के वक्त अलीराजपुर के राजा से उस समय लोगों ने इसे अपने ही राज में रखने का अनुरोध किया था. मध्य प्रदेश सरकार ने भी इसका मान रखा और इस गांव को अच्छी तवज्जो दी. यही वजह है कि इस गांव से गुजरात में शामिल होने की मांग कभी नहीं उठी.

टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक किसान और गांव के पूर्व सरपंच 50 साल के  गामजी हिरालिया ने कहते हैं कि हमें अपने राज्य तक पहुंचने के लिए गुजरात के गांवों से होकर गुजरना पड़ता है.

वहीं साजनपुर के 24 साल के खेतिहर मजदूर विक्रम राठवा ने बताते है कि  हम घर पर कुछ गुजराती बोलते हैं जबकि प्रशासनिक काम के लिए हमें हिंदी भी सीखनी पड़ती है." वह कहते हैं कि उनके गांव के गुजरात के पास के गांवों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध हैं और नागरिक और अन्य मुद्दों पर चर्चा भी करते हैं.

राठवा ने आगे कहा, "साजनपुर के लोगों को मध्य प्रदेश से कोई शिकायत नहीं है क्योंकि एमपी से इतना दूर होने के बावजूद सरकार उनकी अच्छी तरह से देखभाल करती है."

दादरा एक और ऐसा गांव है जो चार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है, जो गुजरात के डूंगरा और लवाछा गांवों के बीच बसा है, लेकिन दादरा और नगर हवेली के केंद्र शासित प्रदेश के प्रति इसकी निष्ठा है. जबकि आस-पास के गांवों चुनावी माहौल का उत्साह है. नगर हवेली का ये  दादरा अप्रभावित है. 

 

 

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