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Maharashtra Election Result: शिवसेना-एनसीपी में बगावत, एंटी इनकंबेंसी और मुद्दों का अभाव...क्या हिंदुत्व के सहारे महाराष्ट्र में खिल रहा कमल?

Maharashtra Election Result: महराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के नतीजों ने सभी को चौंकाकर रख दिया है, यहां बीजेपी अपने ही दम पर बहुमत की तरफ जाती दिख रही है.

Maharashtra Election Result: महाराष्ट्र में तमाम सियासी बवाल के बाद आखिरकार विधानसभा चुनाव हुए और फिलहाल बीजेपी वाला गठबंधन (महायुति) प्रचंड बहुमत के साथ आगे बढ़ता नजर आ रहा है. चुनाव से पहले जीत के दावे करने वाला विपक्षी गठबंधन फिलहाल कुछ भी कहने की हालत में नहीं है. हर बार की तरह चुनाव नतीजों में हार की समीक्षा तो होगी ही, लेकिन आज हम आपको महाराष्ट्र चुनाव के इन नतीजों की ऐसी जानकारी देंगे, जिससे आपको ये समझ आएगा कि महाराष्ट्र की राजनीति किस तरफ मोड़ ले रही है. साथ ही उन फैक्टर्स पर भी बात करेंगे जिनके सहारे बीजेपी महाराष्ट्र में इतनी बड़ी हो गई है और तमाम हलचल के बावजूद एक बार फिर सरकार बनाने की तरफ बढ़ रही है. 

बगावत की कहानी
महाराष्ट्र में पिछले विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी अलग पड़ गई थी, शिवसेना ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई और उद्धव ठाकरे को कुर्सी पर बिठा दिया गया. हालांकि पहली बार सरकार की जिम्मेदारी संभालते-संभालते उद्धव को घर से उठता धुआं नहीं दिखाई दिया. अपने ही नेता एकनाथ शिंदे ने बगावत की और पूरी की पूरी पार्टी तोड़ दी. इतना ही नहीं, पुश्तैनी पार्टी का नाम और चुनाव निशान भी छीन लिया. 

एकनाथ शिंदे की तरह ही एनसीपी में भी बगावत की चिंगारी काफी वक्त से दबी हुई थी, बस उसे एक हवा मिलने की जरूरत थी. बीजेपी और शिंदे ने वो हवा चलाई और अजित पवार नाम की ये चिंगारी सुलग उठी. शिवसेना की तरह एनसीपी का नाम और चुनाव चिन्ह शरद पवार के हाथों से छीन लिया गया. 

तोड़फोड़ का कोई असर नहीं
माना जा रहा था कि महाराष्ट्र में हुई इस तोड़फोड़ का आने वाले विधानसभा चुनावों पर असर दिखेगा, यानी उद्धव ठाकरे और शरद पवार को सिंपैथी मिलेगी और जनता बीजेपी वाले इस गठबंधन को मौका नहीं देगी. विपक्षी नेता भी यही बयान देते रहे कि धोखा देने वालों को जनता सबक सिखाने वाली है, हालांकि इसका ठीक उल्टा हो रहा है. बीजेपी और उसके साथी एकनाथ शिंदे-अजित पवार गठबंधन को दो तिहाई से ज्यादा सीटें मिल सकती हैं. यानी जनता को धोखाधड़ी या फिर पार्टी तोड़ने जैसे मुद्दों से कोई भी फर्क नहीं पड़ा. इसे ऐसे भी लिया जा सकता है कि विपक्षी दल इसे भुनाने में नाकाम रहे और महायुति ने जनता को बाकी चीजों में उलझाकर इस मुद्दे को हवा में उड़ा दिया. 

कहां गई एंटी इनकंबेंसी?
बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के गठबंधन के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी को भी फैक्टर माना जा रहा था, हालांकि चुनाव के रुझानों और नतीजों में ये दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है. पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि महाराष्ट्र में एंटी इनकंबेंसी जरूर थी, लेकिन विपक्षी दलों ने अपने मुद्दों को ठीक से नहीं रखा. साथ ही आखिरी वक्त तक एक दूसरे में ही उलझे रहे. जिसका कारण ये रहा कि तोड़फोड़ वाले फैक्टर की ही तरह महायुति इससे भी पार पा गई. 

हिंदुत्व फैक्टर पर चल पड़ी है गाड़ी?
महाराष्ट्र में चुनाव नतीजों से एक और बात साफ हो रही है कि चुनावों में हिंदुत्व फैक्टर भी सबसे आगे रहा है. मराठाओं की नाराजगी हो या फिर जोड़तोड़ की राजनीति के आरोप, तमाम मुद्दों को धता बताते हुए लोगों ने बीजेपी को जमकर वोट किए. तमाम जगह बीजेपी के हिंदुत्व के ब्रांड एंबेसेडर ये बयान देते रहे कि बंटोगे तो कटोगे... 

वहीं पीएम मोदी ने भी उनकी बात को दूसरी तरह से ही रैलियों में लोगों तक परोस दिया. उन्होंने लोगों को एक हैं तो सेफ हैं की नसीहत दे डाली, अब इन बयानों को लोगों ने कई तरह से लिया और कहा कि ये बीजेपी की हिंदू-मुस्लिम वाली सोच को दिखाता है. हालांकि इसका असर चुनाव पर पॉजिटिव तरह से नजर आ रहा है और बीजेपी राज्य में अपने दम पर सरकार बनाती नजर आ रही है. यानी जनता ने बाकी तमाम जरूरी मुद्दों की फेहरिस्त में हिंदुत्व को कतार में सबसे आगे खड़ा किया है. जो बीजेपी के लिए फिलहाल तो किसी जैकपॉट से कम नहीं है. 

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बीजेपी अगर आरएसएस के साथ तालमेत बिठाकर चलती है तो इसका फायदा सीधा पार्टी को होता है. महाराष्ट्र में भी यही देखने को मिला है. नागपुर समेत महाराष्ट्र के तमाम इलाकों में आरएसएस का दबदबा है, साथ ही जमीनी संगठन काफी मजबूत है. बताया गया कि महाराष्ट्र में आरएसएस स्वंयसेवक घर-घर बीजेपी और महायुति के मुद्दों को पहुंचाते रहे. लोगों से परदे के पीछे रहते हुए ये अपील की जा रही थी कि वो एकजुट रहें, खासतौर पर हिंदू वोटरों को टारगेट किया गया. जिसका रिजल्ट अह असली नतीजों में दिख रहा है. कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि हिंदुत्व के घोड़े पर सवाल होकर बीजेपी ने महाराष्ट्र की ये रेस आसानी से जीत ली है. 

ये भी पढ़ें - शिंदे की सेना या उद्धव ठाकरे गुट, चाचा या भतीजा और बीजेपी कांग्रेस... कौन किस पर भारी, जानें सारी पार्टियों का स्ट्राइक रेट

मुकेश बौड़ाई पिछले 7 साल से पत्रकारिता में काम कर रहे हैं. जिसमें रिपोर्टिंग और डेस्क वर्क शामिल है. नवभारत टाइम्स, एनडीटीवी, दैनिक भास्कर और द क्विंट जैसे संस्थानों में काम कर चुके हैं. फिलहाल एबीपी न्यूज़ वेबसाइट में बतौर चीफ कॉपी एडिटर काम कर रहे हैं.
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