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नारायण राणे: 14 साल में चार पार्टियां बदलने वाले राजनेता से मिलिए

नारायण राणे अपने करियर के शिखर पर उस वक्त पहुंचे जब फरवरी 1999 में तत्कालीन शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने उन्हें महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाया. सवाल ये है कि क्या बीजेपी में आने के बाद भी राणे मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं.

मुंबई: राजनीति में नेताओं का दल बदलना आम बात है लेकिन महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे राज्य की सियासत के एक ऐसे शख्स हैं जो 14 साल के भीतर 4 पार्टियां बदल चुके हैं. फिर से एक बार मुख्यमंत्री बनने की महत्वकांक्षा उन्हें हर चंद साल एक पार्टी छोड़कर दूसरे में जाने को मजबूर करती है. आज राणे बीजेपी से जुड़ गये हैं. बीजेपी चौथी ऐसी पार्टी है जिससे नारायण राणे बीते 14 सालों में जुड़े हैं. राणे के सियासी करियर की शुरूवात शिवसेना से हुई थी, लेकिन उसके बाद वे 3 और पार्टियों से जुड़े.

एक आम शिवसेना कार्यकर्ता के तौर पर अपने करियर की शुरूआत करने वाले नारायण राणे अपने करियर के शिखर पर उस वक्त पहुंचे जब फरवरी 1999 में तत्कालीन शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने उन्हें महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाया. राणे 258 दिनों तक मुख्यमंत्री रहे. उस साल हुए चुनाव में शिवसेना-बीजेपी गठबंधन चुनाव हार गया और राणे वापस मुख्यमंत्री नहीं बन पाये. इस बीच शिवसेना में उद्धव ठाकरे का वर्चस्व बढ़ने लगा. राणे को लगा कि पार्टी में उनकी हैसीयत कम हो रही है. उन्हें इस बात की भी आशंका थी कि अगर शिवसेना फिर सत्ता में आती है तो उद्धव ठाकरे के चलते उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बनने नहीं मिलेगा. इसलिये जुलाई 2005 में राणे ने शिवसेना छोड़ दी और कांग्रेस से जुड़ गये. कांग्रेस में उन्हें राजस्व मंत्री बनाया गया.

राणे के मुताबिक कांग्रेस की ओर से उन्हें उम्मीद दी गई थी कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जायेगा. 2008 में जब मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने इस्तीफा दिया तो राणे को लगा कि अब उन्हें मौका मिलेगा. लेकिन मुख्यमंत्री बना दिये गये अशोक चव्हाण. राणे ने इसका कड़ा विरोध किया. उनकी बयानबाजी की वजह से उन्हें पार्टी से 6 साल के लिये निष्कासित कर दिया गया, लेकिन राणे ने जल्द ही तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलकर माफी मांग ली और फिर से पार्टी में आ गये. इस बीच उन्होंने अपने दोनो बेटों नीलेश और नितेश को भी कांग्रेस में शामिल करवा लिया. 2009 में जब कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन फिर एक बार सत्ता में आया तो फिर एक बार मुख्यमंत्री की कुर्सी अशोक चव्हाण को मिली. सालभर के बाद अशोक चव्हाण को पार्टी ने मुख्यमंत्री पद से हटा दिया, लेकिन मौका नारायण राणे के बजाय पृथ्वीराज चव्हाण को मिला.

नारायण राणे समझ गये कि कांग्रेस में रहते हुए उनका फिर एक बार मुख्यमंत्री बन पाना मुश्किल है. लिहाजा 2017 में उन्होंने कांग्रेस पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ दी. इस बार उन्होंने अपनी पार्टी बनाई महाराष्ट्र स्वाभिमान पक्ष. राणे इस वक्त बीजेपी के समर्थन से राज्यसभा के सांसद हैं. उनके बेटे नीतेश ने भी कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है. बीजेपी को लगता है कि राणे के साथ आ जाने से कोंकण में वो अपने पैर मजबूत कर सकेगी, जहां फिलहाल शिवसेना का दबदबा है.

सवाल ये है कि क्या बीजेपी में आने के बाद भी राणे मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं. मौजूदा स्थिति में तो सीएम देवेंद्र फडणवीस मजबूत नजर आ रहे हैं. उनके अलवा भी महाराष्ट्र बीजेपी में कई ऐसे चहरे हैं जो सीएम की कुर्सी पर नजर गड़ाए हैं. ऐसे में राणे का सपना पूरा होना नामुमकिन लग रहा है...पर कहते हैं राजनीति में उम्मीदों का कभी अंत नहीं होता.

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