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लोकसभा चुनाव परिणाम: पीएम नरेंद्र मोदी की बड़ी जीत के 5 बड़े कारण

लोकसभा चुनाव: बीजेपी ऐतिहासिक जीत की ओर बढ़ रही है. पार्टी अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल करने में सफल दिख रही है. बीजेपी 292 सीटों पर आगे चल रही है.

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव नतीजों की तस्वीर करीब-करीब साफ हो चुकी है. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) या कहें बीजेपी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक बार फिर पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने जा रही है. इस चुनाव में 2014 के मुकाबले विपक्षी पार्टियों की हालत बदस्तूर खराब है. कांग्रेस समेत कोई भी पार्टी 55 के आंकड़े को पार करने में असफल दिख रही है. दोपहर 12 बजे तक के रुझानों पर गौर करें तो... एनडीए ने 2014 के अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ डाला है. पूरे 542 सीटों के रुझान आ गए हैं जिसमें एनडीए 325 से आगे चल रही है, जबकि कांग्रेस गठबंधन 100 से भी कम है. अन्य की झोली में 100 से ज्यादा सीटें जाती दिख रही हैं. बीजेपी अकेले दम पर 292 और कांग्रेस 50 सीटों पर जीत जीतती दिख रही है.

क्षेत्रिय पार्टियों में टीएमसी को नुकसान हो रहा है, लेकिन मुकाबले में है. वाईएसआर, टीआरएस और डीएमके को भारी फायदा हो रहा है. बीजेडी 15, टीआरएस 9, वाईएसआर कांग्रेस 23, डीएमके 22, टीएमसी 24, टीडीपी 2 सीटों पर आगे चल रही है.

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने लोकसभा की कुल 543 सीटों में अकेले 282 सीटों पर जीत दर्ज की थी वहीं कांग्रेस के खाते में मात्र 44 सीटें गई थी. बीजेपी इस बार की जीत को मोदी सरकार की योजनाओं और विजन पर जनता की मुहर बता रही है. आइए जानते हैं बीजेपी की जीत के 5 बड़े कारण-

1. चेहरा पूरे चुनावी कैंपेन के दौरान बीजेपी ने 'मोदी नहीं तो कौन?' यानि कि विपक्ष के पास प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन है का मुद्दा उठाया. बीजेपी-एनडीए हर एक लोकसभा सीट पर प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर वोट मांगे. जिस सीट पर उम्मीदवार कमजोर भी थे वहां भी बीजेपी ने पीएम मोदी के नाम पर वोट करने की अपील की. बीजेपी ने यह बताने की कोशिश की कि विपक्ष मोदी को हराने के लिए एकजुट हो रहा है.

वहीं सभी विपक्षी पार्टियां चुनाव परिणाम बाद चेहरे पर फैसले की बात कहती रही. विपक्षी दलों ने साल 1977 की याद दिलाई जब पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी. चुनाव में तब की विपक्षी पार्टियों ने चेहरे का एलान नहीं किया था. 2019 के चुनाव में विपक्षी पार्टियां मतदाताओं को समझाने में विफल रही. वहीं बीजेपी-एनडीए एक मजबूत चेहरे के तौर पर प्रधानमंत्री मोदी की तरफदारी करती रही और जनता ने भी दोबारा पीएम मोदी को चुना.

2. आक्रामक कैंपेन 10 मार्च 2019 को लोकसभा चुनाव के एलान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करीब 150 रैलियां और रोड शो किये. उनके साथ बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समेत अन्य स्टार प्रचारकों की रैलियों, रोड शो को मिला दिया जाए तो देशभर में इसकी संख्या 1000 से अधिक हो जाती है. सभी रैलियों में विपक्षियों खासकर कांग्रेस पर हमले के साथ राष्ट्रवाद, प्रधानमंत्री पद का चेहरे और पांच साल की योजना जैसे मुद्दे हावी रहे. बीजेपी यह बताने में सफल रही कि मोदी के बिना बालाकोट एयर स्ट्राइक, सर्जिकल स्ट्राइक संभव नहीं है. जनता के जेहन में यह सवाल डालने में कामयाब रही कि मोदी नहीं तो देश का नेतृत्व कौन करेगा? राहुल गांधी, मायावती, ममता बनर्जी?

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3. राष्ट्रवाद चुनाव की घोषणा से करीब एक महीने पहले 14 फरवरी को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद के हमले से देश आहत था. पाकिस्तान पर हमले की मांग उठ रही थी. तभी 26 फरवरी की रात को एक गुप्त ऑपरेशन में भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी सरज़मी पर आतंकी ठिकानों को निशाना बनाते हुए हमला कर दिया. 250 से अधिक आतंकियों के मारे जाने की खबर देशभर में फैली (आधिकारिक बयान नहीं). बीजेपी ने इसे खूब भुनाया. इसके ठीक बाद भारतीय वायुसेना के पायलट अभिनंदन वर्दमान की सुरक्षित वतन वापसी ने जनभावनाओं को मोदी सरकार के पक्ष में ला दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत बीजेपी के नेताओं ने हर रैलियों में इसका जिक्र करना शुरू किया. यही नहीं 26/11 मुंबई आतंकी हमले के बाद तब की कांग्रेस सरकार की चुप्पी पर भी सवाल उठाए गए. पीएम मोदी ने फर्स्ट टाइम वोटर से बालाकोट ऑपशेन में शामिल जांबाज जवानों और पुलवामा में शहीद हुए जवानों को समर्पित वोट करने की अपील की. इसके जवाब में कांग्रेस ने भी उसके कार्यकाल में हुए सर्जिकल स्ट्राइक को गिनाने की कोशिश की लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आक्रामकता के सामने वह कहीं नहीं ठहरी.

4. महंगाई और भ्रष्टाचार इस चुनाव में देखें तो आम जनता को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाले दो मुद्दे महंगाई और भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं बन पाया. चुनाव से कुछ महीने पहले बढ़े पेट्रोल की कीमतों को छोड़ दें तो मोदी सरकार को महंगाई के आक्रोश का सामना नहीं करना पड़ा. सरकार ने दावा किया कि उसके कार्यकाल में महंगाई पूरी तरफ नियंत्रण में रहा, कलाबाजारियों पर नकेल कसा गया. जिसका असर चुनाव में साफ दिखाई दिया. यहां ध्यान रहे कि साल 2010 में कांग्रेस की सरकार में महंगाई दर करीब 12 प्रतिशत तक पहुंच गई थी. मोदी सरकार में इसमें बेहद कमी आई और यह करीब 4 प्रतिशत पर रुका रहा.

आम मतदाताओं को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाला भ्रष्टाचार जैसा मुद्दा भी निष्प्रभावी रहा. 2014 के चुनाव में भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा था. इस बार के चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राफेल डील में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और इसे मुद्दा बनाने की कोशिश जरूर की लेकिन इसमें वह सफल नहीं दिखे. इस मुद्दे पर पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में सरकार को क्लीनचिट दी. लेकिन बीजेपी ने इस फैसले को सभी आरोपों में क्लीनचिट का दावा किया और वह आक्रामक ढ़ंग से जनता के बीच गई. राहुल गांधी के 'चौकीदार चोर है' वाले नारे को 'मैं भी चौकीदार' कैंपेन से जवाब दिया. बीजेपी यहीं नहीं रुकी. राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट को कोट करते हुए पीएम मोदी के लिए 'चौकीदार चोर है' कहा. बीजेपी नेता मीनाक्षी लेखी इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गईं. बाद में राहुल गांधी को माफी तक मांगना पड़ा.

5. योजनाएं मोदी सरकार ने आम लोगों को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाली चार योजनाओं का जिक्र खूब किया. इसमें स्वच्छता अभियान, किसान सम्मान निधि योजना, सौभाग्य योजना और उज्जवला योजना शामिल है. चुनावी साल में मोदी सरकार ने किसान सम्मान निधि योजना की शुरुआत की. इससे तहत किसानों को सालाना छह हजार रुपये दिये जा रहे हैं. चुनाव से पहले ज्यादातर किसानों को 2-2 हजार रुपये की दो किश्त दी गई. इस योजना से किसानों की नाराजगी दूर हुई. इसकी तुलना में कांग्रेस ने न्याय योजना लाने का दावा किया. लेकिन जनता को प्रभावित करने में असफल रही.

मोदी सरकार ने पांच साल में स्वच्छता पर जोर दिया और हर घर शौचालय बनवाने की कोशिश की. ग्रामीण इलाकों में लोगों को इसका फायदा मिला और इसका फायदा चुनाव में बीजेपी को मिला. उज्जवला योजना के तहत लाखों लोगों को मुफ्त में गैस सिलेंडर मिला. यही नहीं प्रधान मंत्री सहज बिजली हर घर योजना (सौभाग्य) का भी काफी असर मतदाताओं पर पड़ा.

यही नहीं सवर्ण आरक्षण, एससी-एसटी एक्ट की पुन: बहाली, 13 प्वाइंट रोस्टर जैसे मुद्दे को भी सरकार ने अंत-अंत तक भुना लिया. विपक्षी पार्टियों ने चुनाव से पहले तीनों मुद्दों को खूब उठाया था. लेकिन सरकार ने अंत-अंत तक इसे अपने पाले में कर लिया.

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