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Karnataka Elections: तटीय कर्नाटक में कौन मारेगा बाजी, बीजेपी या कांग्रेस?

Karnataka Elections: सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) की बढ़ती लोकप्रियता और राज्य भर में कम से कम 100 सीटों पर उम्मीदवारों को मैदान में उतारने का फैसला गेम चेंजर साबित हो सकता है.

BJP-Congress And Karnataka Elections:  कर्नाटक की सियासत में तटीय कर्नाटक बीजेपी का गढ़ है. पिछले कुछ सालों में यह क्षेत्र सांप्रदायिकता के गढ़ के रूप में चर्चित हुआ है. यहां से अंतर-धार्मिक जोड़ों पर हमले की खबरें आती रही हैं. सोशल मीडिया पर खुलेआम ऐसी मांग की जाती है कि कुछ समुदायों पर अन्य धर्मों के समारोहों में व्यापार करने पर प्रतिबंध लगाया जाए. जबकि राज्य की बीजेपी सरकार ने सांप्रदायिक विभाजन, नैतिक पुलिसिंग की घटनाओं और हत्याओं में किसी भी तरह की भूमिका होने से इनकार किया है. बीजेपी को भी इस सांप्रदायिक संघर्ष से हमेशा सियासी लाभ नहीं हुआ है, खासकर दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में तो बिल्कुल भी नहीं.

बीजेपी के लिए हिंदुत्व प्रमुख फैक्टर 
साल 2013 में बीजेपी ने इन दो जिलों की कुल 13 सीटों में से केवल दो सीटें जीतीं थी. लेकिन पांच साल बाद यानी 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के आक्रामक प्रचार ने यहां का सियासी माहौल बदल दिया. कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में नए उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर पार्टी ने कुछ जोखिम भी उठाए और वे सभी शानदार ढंग से जीते भी थे. इसी तरह साल 2023 के चुनाव में भी हिंदुत्व एक प्रमुख फैक्टर बना हुआ है. पिछले साल हुई पार्टी कार्यकर्ता प्रवीण नेतरू की हत्या के बाद बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने पार्टी छोड़ने की धमकी दी थी, जो बीजेपी के लिए सबसे बड़ी शर्मिंदगी की बात थी. लेकिन, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष नलिन कुमार कटील ने सियासी सूझबूझ से काम लिया और हालात को संभाल लिया। 

बीते साल केंद्र सरकार ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया पर प्रतिबंध लगा दिया था। दक्षिण कन्नड़ जिला बीजेपी अध्यक्ष सुदर्शन एम ने दावा किया कि बीजेपी की वजह से तटीय कर्नाटक में कोई सांप्रदायिक मुद्दा नहीं उभरा है. मंगलुरु और बेंगलुरु के बीच खराब सड़क संपर्क, तुलु भाषा के लिए मान्यता का मुद्दा और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले सांप्रदायिक संघर्ष पर व्यापारिक जगत की आशंका कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जो इस क्षेत्र पर हावी हैं. लेकिन, बीजेपी उम्मीद कर रही है कि राज्य और केंद्र सरकार के विकास कार्य उसकी जीत में एक प्रमुख फैक्टर होंगे.

बिल्लावा समुदाय को प्रमुखता देने पर विचार
कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही जातिगत फैक्टर को देख रहे हैं और बिल्लावा समुदाय को प्रमुखता देने पर विचार कर रहे हैं. दोनों राष्ट्रीय दलों के द्वारा प्रमुख निर्वाचन क्षेत्रों में नए चेहरों को आजमाने की भी संभावना है. बीजेपी के प्रतिद्वंद्वियों का मानना ​​है कि पार्टी को इस बार अपने सांप्रदायिक कदमों से लाभ होने की संभावना नहीं है. बीजेपी पहले भी कई बार सांप्रदायिक राजनीति करने की कोशिश कर चुकी है, लेकिन अब वह सैचुरेशन पॉइंट पर पहुंच गई है. उडुपी जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अशोक कुमार कोडावूर ने कहा कि बीजेपी फिर से यह फॉर्मूला आजमा सकती है, लेकिन मुझे लगता है कि वह इस बार सफल नहीं होगी.

एसडीपीआई हो सकती है गेम चेंजर
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) की बढ़ती लोकप्रियता और राज्य भर में कम से कम 100 सीटों पर उम्मीदवारों को मैदान में उतारने का फैसला गेम चेंजर साबित हो सकता है. उत्तर कन्नड़ जिले में कांग्रेस ने साल 2013 में बीजेपी पर बड़ी बढ़त हासिल की थी, क्योंकि बीएस येदियुरप्पा और बी श्रीरामुलु ने पार्टी से विद्रोह किया था और अपनी अलग राह बनाई थी. जब ये बागी नेता भाजपा के पाले में लौटे तो साल 2018 में बीजेपी फिर से प्रमुख पार्टी बन गई.

अधिकांश विधानसभा सीटों पर बीजेपी-कांग्रेस का सीधा मुकाबला
इस बार जिले की अधिकांश विधानसभा सीटों पर सीधा मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच है. हिंदुत्व भी बड़ा मुद्दा है और बीजेपी को भरोसा है कि वह अपनी सरकार के प्रदर्शन और जमीनी स्तर पर आरएसएस के प्रभाव के आधार पर चुनाव में जीत हासिल करेगी. लेकिन कांग्रेस को उम्मीद है कि वह बीजेपी को हरा देगी. कांग्रेस बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और कुम्ता में एक मल्टीस्पेशियलिटी अस्पताल बनाने के अपने वादे को पूरा करने में बीजेपी सरकार की विफलता को उजागर कर रही है. कांग्रेस कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम और मराठा वोटों से भी लाभ की उम्मीद कर रही है.

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