क्यों भारतीय युवा सरकारी नौकरियों के पीछे इतने पागल हैं?
सरकार के संसद में दिए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए 22 करोड़ से ज्यादा आवेदन आए. जबकि इनमें से केवल 7.22 लाख उम्मीदवारों को नौकरी मिल सकी.

Government Job Craze: एक समय था, जब बड़े शहर की कॉर्पोरेट नौकरी युवाओं का सबसे बड़ा सपना मानी जाती थी. अच्छी सैलरी, ग्लास ऑफिस, मल्टीनेशनल कंपनी और तेज करियर ग्रोथ को सफलता की पहचान समझा जाता था. लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है. आज बड़ी का संख्या में युवा कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर यूपीएससी, एसएससी, बैंक, रेलवे और राज्य लोक सेवा आयोग जैसी सरकारी नौकरियों की तैयारी में लगे हैं. इस लेकर यह सवाल भी उठ रहे हैं कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है. दरअसल इसकी सबसे बड़ी वजह सिर्फ सैलरी नहीं, बल्कि जॉब सिक्योरिटी, स्थिर करियर और सामाजिक प्रतिष्ठा भी है. हाल के वर्षों में प्राइवेट कंपनियों में लगातार ले-ऑफ, आर्थिक अनिश्चितता और बढ़ते काम के दबाव ने युवाओं को सरकारी नौकरी की ओर फिर से आकर्षित किया है.
एक नौकरी के लिए सैकड़ों दावेदार
सरकार के संसद में दिए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए 22 करोड़ से ज्यादा आवेदन आए. जबकि इनमें से केवल 7.22 लाख उम्मीदवारों को नौकरी मिल सकी. यानी औसतन एक सरकारी नौकरी के लिए 300 से ज्यादा उम्मीदवार मैदान में थे. यह आंकड़ा बताता है कि सरकारी नौकरी पाने की होड़ लगातार बढ़ रही है. यूपीएससी, एसएससी, रेलवे, बैंकिंग और राज्य स्तरीय भर्ती परीक्षा में हर साल लाखों अभ्यर्थी आवेदन कर रहे हैं, जबकि रिक्त पदों की संख्या सीमित रहती है. कई राज्यों में चपरासी जैसी नौकरियों के लिए भी लाखों आवेदन आने के उदाहरण सामने आए हैं.
आखिर यूथ में सरकारी नौकरी की इतनी चाहत क्यों
भारत में सरकारी नौकरी को आज भी स्थायी रोजगार का सबसे सुरक्षित ऑप्शन माना जाता है. इसमें समय पर वेतन, भत्ते, नौकरी जाने का कम खतरा, पेंशन जैसी सुविधा और सामाजिक प्रतिष्ठा जुड़ी होती है. यही वजह है कि कई परिवार आज भी अपने बच्चों को सरकारी नौकरी के लिए प्रेरित करते हैं. इसके विपरीत प्राइवेट सेक्टर में नौकरी की सुरक्षा में लेकर लगातार चिंता बनी रहती है. खासकर आईटी और कॉर्पोरेट सेक्टर में पिछले कुछ वर्षों के दौरान बड़ी पैमाने पर हुई छंटनी ने युवाओं का भरोसा कमजोर कर दिया है.
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कॉर्पोरेट नौकरी में बढ़ता काम का दबाव
इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन के आंकड़ों के अनुसार भारत में कर्मचारी औसतन 45.8 घंटे प्रति सप्ताह काम करते हैं. वहीं विकसित देशों में यह आंकड़ा काफी कम है. अमेरिका में औसतन 38 घंटे प्रति सप्ताह काम होता है, यूनाइटेड किंगडम में यह लगभग 35.9 घंटे है और जापान में कर्मचारी औसतन 36.6 घंटे प्रति सप्ताह काम करते हैं. रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब 51 प्रतिशत कर्मचारी हर सप्ताह 49 घंटे से ज्यादा काम करते हैं. जिसे अंतरराष्ट्रीय मांगों के अनुसार अत्यधिक कार्य अवधि माना जाता है. ऐसे में वर्क लाइफ बैलेंस भी युवाओं के लिए बड़ी चिंता बनकर उभरी है.
क्या सिर्फ सरकारी नौकरी ही समाधान है?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि सरकारी नौकरियों का आकर्षण अपनी जगह सही है, लेकिन सभी युवाओं के लिए सरकारी नौकरी संभव नहीं है. हर साल लाखों नए युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं, जबकि सरकारी रिक्तियां सीमित रहती है. ऐसे में निजी क्षेत्र, स्टार्टअप, उद्यमिता और कौशल आधारित रोजगार के अवसरों को भी मजबूत करना जरूरी है.
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