मोदी सरकार का दिल्ली हाईकोर्ट में हलफनामा, 'जामिया मिल्लिया इस्लामिया माइनॉरिटी यूनिवर्सिटी नहीं'
29 अगस्त 2011 को यूपीए 2 में मानव और संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने कोर्ट में एफिडेविट देते हुए कहा था कि सरकार NCMEI के यूनिवर्सिटी के माइनॉरिटी स्टेटस दिया जाने के फैसले का समर्थन करती है.

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के माइनॉरिटी स्टेटस को खत्म करने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दाखिल की है. ये अपील यूपीए 2 के उस फैसले को खत्म करने के लिए है जिसमें नेशनल कमीशन फॉर माइनॉरिटी एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (NCMEI) ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी को धार्मिक माइनॉरिटी एंस्टीट्यूट का दर्जा दिया था.
29 अगस्त 2011 को यूपीए 2 में मानव और संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने कोर्ट में एफिडेविट देते हुए कहा था कि सरकार NCMEI के यूनिवर्सिटी के माइनॉरिटी स्टेटस दिया जाने के फैसले का समर्थन करती है.
5 मार्च को एनडीए सरकार की ओर से एक नया एफिडेविट देते हुए 1968 अजीज बाशा Vs यूनियन ऑफ इंडिया केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया है. अपने फैसले में कोर्ट ने कहा था कि किसी यूनिवर्सिटी को माइनॉरिटी एंस्टीट्यूट का दर्जा इसलिए नहीं मिल सकता क्योंकि वो संसद के बनाए कानून से दिया जा रहा है.
दिल्ली हाई कोर्ट में 13 मार्च को एक नया एफिडेविट दिया गया है. इसमें कहा गया है, ''किसी भी इवेंट में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के बोर्ड में बहुसंख्यक मुस्लिम हो ऐसा होना जरूरी नहीं है. इसलिए इस संस्थान को माइनॉरिटी इंस्टीट्यूट का दर्जा मिलने का सवाल नहीं उठता.''
एफिडेविट में कहा गया है, ''एक केंद्रीय यूनिवर्सिटी को माइनॉरिटी इंस्टीट्यूट का दर्जा इसके कानून के खिलाफ है.'' एफिडेविट में यह भी कहा गया है कि ''जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी संसद के बनाए कानून से बना है और केंद्र सरकार इसको फंड देते है. यह किसी माइनॉरिटी संस्था ने सेटअप नहीं किया है.''
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