Mumbai News: 11 साल जेल में बिताने के बाद हत्या के दो आरोपियों को कोर्ट ने दी जमानत, लेकिन क्यों?
मुंबई के 2011 के कुरार चौगुनी हत्या मामले में 11 साल सलाखों के पीछे रहने के बाद दो आरोपियों को कोर्ट ने जमानत दे दी. कोर्ट ने कहा कि दोनों के साजिश में शामिल होने का कोई सबूत नहीं मिले हैं.

मुंबई: 2011 के कुरार चौगुनी हत्या मामले में 11 साल जेल में बिताने के बाद, दो आरोपियों को हाल ही में कोर्ट से जमानत मिल गई. दरअसल कोर्ट को इस बात का कोई सबूत नहीं मिला था कि वे दोनों साजिश का हिस्सा थे. दो अलग-अलग आदेशों में, अदालत ने ऑटो चालक चबीनाथ दीक्षित और मनोज गूजर को जमानत दे दी थी. इन पर कथित रूप से अपहृत पीड़ितों को अपराध स्थल तक पहुंचाने का आरोप था.
जून 2011 में, गणेश करंजे (24), दिनेश अहिरे (25), चेतन धुले (24) और भारत कुंडल (27) के लापता होने की सूचना मिली थी. बाद में उनके आंशिक रूप से जले हुए शव 6 जून को एक पहाड़ी इलाके में पाए गए थे. ये हत्याएं कथित तौर पर पीड़ितों में से एक और मुख्य आरोपी 'स्थानीय गुंडे' के बीच हुए विवाद की वजह से हुई थी.
कोर्ट ने सबूतों के अभाव में किया रिहा
ऑटोरिक्शा चालक चबीनाथ दीक्षित और मनोज गूजर को जमानत देने वाले दो आदेशों में न्यायाधीश एस एम मेनजोगे ने कहा: “इस बात का कोई सबूत नहीं है कि उन्होंने बंदियों को मारने की साजिश रची थी. यह दिखाने के लिए कोई सबूत नहीं है कि वे हत्या में शामिल थे…”
पुलिस ने किया था ये दावा
दीक्षित और गूजर के अलावा, कथित गैंगस्टर उदय पाठक और वैभव चव्हाण व हेमंत गुप्ता चौगुनी हत्या मामले में आरोपी थे. पुलिस ने आरोप लगाया था कि हत्याएं पीड़ितों में से एक और पाठक के बीच हुए विवाद का परिणाम थीं. पुलिस ने आगे दावा किया कि पाठक ने अपने सहयोगियों को इकट्ठा किया था और उन्हें निर्देश दिया था कि वे गणेश करंजे (24), दिनेश अहिरे (25), चेतन धुले (24) और भरत कुंडल (27) को एक-एक करके किसी बहाने से ऑटोरिक्शा में गांव के पास अप्पा पाड़ा इलाके में एक पहाड़ी की चोटी पर ले आए.
हत्याओं का खुलासा 6 जून 2011 को हुआ था
हत्याओं का खुलासा 6 जून, 2011 को हुआ था, जब आंशिक रूप से जले हुए चार शव मिले थे. अदालत ने यह भी कहा कि गुप्ता को इस साल अप्रैल में बंबई उच्च न्यायालय ने जमानत दे दी थी. गुप्ता को जमानत देते हुए, उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति अनुजा प्रभुदेसाई ने उसकी सीमित भूमिका, लंबे समय तक कैद और मुकदमे को पूरा करने में देरी को रिहा करने के कारणों के रूप में उद्धृत किया था.
वहीं अभियोजन पक्ष ने दीक्षित और गूजर की जमानत याचिकाओं का कड़ा विरोध किया और कहा कि अपराध गंभीर है. तर्क दिया गया कि अगर जमानत दी जाती है, तो दोनों अभियोजन पक्ष के गवाहों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं. अदालत ने, हालांकि, आरोपी से स्वीकृत चव्हाण के बयानों पर भरोसा किया, जिन्होंने सह-आरोपी की भूमिकाओं का वर्णन किया था। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि चव्हाण के सबूतों से पता चलता है कि दीक्षित की भूमिका आरोपी और बंदियों को अपने ऑटोरिक्शा में ले जाने तक ही सीमित थी.
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Source: IOCL





















