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ईरान टेंशन के बीच आयी ऐसी खबर, टूट जाएगी आम जनता की कमर, जानें आखिर क्या है वजह

जानकारों का कहना है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है और लंबे समय तक बना रहता है और तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं, तो आने वाले महीनों में महंगाई पर और दबाव पड़ सकता है.

Retail Inflation In India: ईरान से जुड़े बढ़ते वैश्विक तनाव और महंगाई के ताजा आंकड़ों के बीच आम लोगों के लिए चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है. गुरुवार को जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में खुदरा महंगाई में फिर बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार फरवरी में Consumer Price Index (सीपीआई) आधारित खुदरा महंगाई बढ़कर 3.21% हो गई, जबकि जनवरी में यह 2.74% थी. ये आंकड़े National Statistical Office (एनएसओ) द्वारा जारी किए गए हैं और इन्हें आधार वर्ष 2024 वाली नई श्रृंखला के आधार पर तैयार किया गया है.

खाद्य महंगाई भी बढ़ी

फरवरी में खाद्य महंगाई भी तेजी से बढ़ी है जबकि एक महीने पहले यानी जनवरी में खाद्य महंगाई 2.13% थी. फरवरी में यह बढ़कर 3.47% हो गई.

किन चीजों के दाम बढ़े

इस दौरान कई वस्तुओं की कीमतों में तेज उछाल देखा गया, जिनमें शामिल हैं:

सोना और चांदी के आभूषण

हीरा और प्लैटिनम ज्वेलरी

नारियल और खोपरा

टमाटर

फूलगोभी

किन चीजों के दाम घटे

वहीं कुछ खाद्य वस्तुओं की कीमतों में राहत भी देखने को मिली, जैसे:

लहसुन

प्याज

आलू

अरहर दाल

लीची

ग्रामीण और शहरी महंगाई

आंकड़ों के मुताबिक महंगाई का असर ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में अलग-अलग रहा:

ग्रामीण क्षेत्रों में महंगाई दर: 3.37%

शहरी क्षेत्रों में महंगाई दर: 3.02%

जानकारों का कहना है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है और लंबे समय तक बना रहता है और तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं, तो आने वाले महीनों में महंगाई पर और दबाव पड़ सकता है. इसका असर आम लोगों के खर्च और देश की अर्थव्यवस्था दोनों पर दिखाई दे सकता है.

गौरतलब है कि पिछले महीने खुदरा महंगाई सूचकांक जारी होने के बाद केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार V. Anantha Nageswaran ने कहा था कि अगर Consumer Price Index (सीपीआई) में उतार-चढ़ाव कम होता है, तो उससे सरकार के वित्तीय खर्चों में भी स्थिरता आएगी.

साथ ही, उन्होंने आगे ये भी कहा कि सरकार के कई खर्च, जैसे महंगाई भत्ते (Dearness Allowance) का निर्धारण और महंगाई से जुड़े बॉन्ड, सीधे सीपीआई से जुड़े होते हैं. इसलिए अगर सीपीआई ज्यादा स्थिर रहता है, तो इन खर्चों का अनुमान लगाना आसान हो जाता है और वे अधिक भरोसेमंद और पूर्वानुमान योग्य बन जाते हैं.

ये भी पढ़ें: होटल-रेस्टुरेंट्स से लेकर अंतिम संस्कार तक… ईरान वॉर के भारत के ऊपर पड़े ये पांच बड़े असर, अब क्या विकल्प

राजेश कुमार पत्रकारिता जगत में पिछले करीब 14 सालों से ज्यादा वक्त से अपना योगदान दे रहे हैं. राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों से लेकर अपराध जगत तक, हर मुद्दे पर वह स्टोरी लिखते आए हैं. इसके साथ ही, किसी खबरों पर किस तरह अलग-अलग आइडियाज के साथ स्टोरी की जाए, इसके लिए वह अपने सहयोगियों का लगातार मार्गदर्शन करते रहे हैं. इनकी अंतर्राष्ट्रीय जगत की खबरों पर खास नज़र रहती है, जबकि भारत की राजनीति में ये गहरी रुचि रखते हैं. इन्हें क्रिकेट खेलना काफी पसंद और खाली वक्त में पसंद की फिल्में भी खूब देखते हैं. पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर ऑफ ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म किया है. राजनीति, चुनाव, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर राजेश कुमार लगातार लिखते आ रहे हैं.
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