कितनी गाड़ियां बिना बीमा, सुप्रीम कोर्ट फिक्रमंद, 'नो इंश्योरेंस-नो फ्यूल' अब जरूरी क्यों?
No Insurance, No Fuel: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों को समय पर मुआवजा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यह प्रस्ताव रखा है.

- भारत में सड़क हादसों से हर घंटे 21 लोगों की मौत.
- तेज गति, नियमों की अनदेखी हादसों की प्रमुख वजहें.
- सुप्रीम कोर्ट ने 'नो इंश्योरेंस, नो फ्यूल' पायलट प्रोजेक्ट सुझाया.
- लक्ष्य बीमा रहित वाहनों को रोकना, पीड़ितों को मुआवजा दिलाना.
No Insurance, No Fuel: भारत में सड़क हादसे की घटनाएं कोई असामान्य बात नहीं है. ट्रैफिक नियमों की सही जानकारी के अभाव या लापरवाही इसकी सबसे बड़ी वजह है. संसद में पेश सरकारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 में देश में रिकॉर्ड 1,83,382 लोगों ने अपनी जान गंवाई है.
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने बताया कि देश में प्रति घंटे औसतन 59 सड़क हादसे हो रहे हैं, जिनमें से हर घंटे 21 लोग अपनी जान गंवा रहे हैं. अगर इस साल की बात करें, तो साल 2026 के शुरुआती छह महीनों (जनवरी से जून तक) में देश भर में 2,85,770 लोग सड़क हादसे दर्ज किए गए हैं. इनमें सबसे ज्यादा मौतें उत्तर प्रदेश में दर्ज की गई हैं, जहां पिछले साल 27,550 लोगों ने सड़क हादसों में जान गंवाई. हालांकि, दुर्घटनाओं की कुल संख्या के मामले में तमिलनाड़ु टॉप है, जहां साल भर में 71,387 हादसे दर्ज किए जा चुके हैं.
क्यों हो रही हैं इतनी दुर्घटनाएं?
- भारत में जानलेवा सड़क हादसों के पीछे कई बड़े कारण हैं. आइए इन पर एक नजर डालते हैं:-
- सबसे बड़ी समस्या इनमें ओवर स्पीडिंग की है. सड़क हादसों में जितनी भी मौतें होती हैं, उनमें से 70% से अधिक मौतें निर्धारित गति सीमा से तेज गाड़ी चलाने के कारण होती है.
- दूसरी समस्या है नियमों की अनदेखी. हेलमेट न पहनने के कारण सालाना 54000 लोग अपनी जान से हाथ धो बैठ रहे हैं. वहीं, सीट बेल्ट न लगाने के चलते 14,000 से अधिक कार सवारों की जान जाती है.
- तीसरी समस्या ट्रैफिक नियमों की अनदेखी है. इनमें रॉन्ग साइड से गाड़ी चलाना, रेट लाइट को न मानना, गाड़ी चलाते वक्त मोबाइल का इस्तेमाल या शराब पीकर गाड़ी चलाना जैसे कई कारण है.

अब तैयार हो रहा सरकार का नया पायलट प्रोजेक्ट
देश में जितने बड़े पैमाने पर सड़क हादसे हो रहे हैं, उसे देखते हुए एक बात तो पक्की कर लेनी है कि कुछ और हो या न हो गाड़ी का इंश्योरेंस होना बहुत जरूरी है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को 'नो इंश्योरेंस, नो फ्यूल' मॉडल पर पायलट प्रोजेक्ट तैयार करने का सुझाव दिया है. इसके तहत वैध थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस नहीं होने पर पेट्रोल पंपों पर ऐसे वाहनों को ईंधन देने से रोका जा सकता है. हालांकि, फिलहाल यह सुप्रीम कोर्ट का बाध्यकारी आदेश नहीं, बल्कि सरकार को दिया गया सुझाव है.
क्या है मकसद?
इसका मकसद दुर्घटना में पीड़ित व्यक्ति को आर्थिक मदद दिलाना है. जब कोई सड़क हादसा होता है, तो पीड़ित परिवार न्याय और वित्तीय सहायता के लिए इधर-उधर भटकता है. ऐसे में इन्हें आर्थिक मदद दिलाने में थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस की बड़ी भूमिका है. भारत में कानूनन हर गाड़ी का थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस होना अनिवार्य है. थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस में दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मौत होने पर या गंभीर रूप से चोट लगने पर कानूनी मुआवजे की पूरी जिम्मेदारी बीमा कंपनी लेती है.
ऐसे में आगे चलकर अब बिना वैध इंश्योरेंस के सड़क पर गाड़ी चलाना मुश्किल हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जिस 'नो इंश्योरेंस, नो फ्यूल' मॉडल पर पायलट प्रोजेक्ट तैयार करने का सुझाव दिया है, उसके तहत वैध थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस नहीं होने पर पेट्रोल पंपों पर ऐसे वाहनों को ईंधन देने से रोका जा सकता है. हालांकि, फिलहाल यह सुप्रीम कोर्ट का बाध्यकारी आदेश नहीं, बल्कि सरकार को दिया गया सुझाव है.
अब क्यों जरूरी 'नो इंश्योरेंस-नो फ्यूल'?
सुप्रीम कोर्ट ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा है कि देश में लगभग 30.48 करोड़ वाहन रजिस्टर्ड हैं. उनमें से 16.54 करोड़ यानी लगभग 56 % वाहनों के पास वैध इंश्योरेंस नहीं है. इसके चलते सड़क दुर्घटना पीड़ितों और उनके परिवारों को मुआवजा हासिल करने के लिए लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है.
ऐसे में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों को समय पर मुआवजा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यह प्रस्ताव रखा है. कोर्ट ने भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) तथा सड़क परिवहन मंत्रालय को पेट्रोल पंपों पर इंश्योरेंस ट्रैकिंग की तकनीक विकसित करने की दिशा में काम करने को कहा है. पेट्रोलियम मंत्रालय ने भी इस प्रस्ताव पर सैद्धांतिक सहमति जताई है.
अब नहीं कराया बीमा तो...
कोर्ट ने वाहनों का बीमा सुनिश्चित करने के लिए तकनीक के इस्तेमाल पर भी जोर दिया है. कोर्ट ने कहा है कि सड़कों पर लगे ANPR कैमरों को वाहन पोर्टल और बीमा डेटाबेस से जोड़ा जाए. इससे बिना बीमा वाले वाहनों की पहचान कर स्वतः ई-चालान जारी हो सकेंगे. ट्रैफिक पुलिस को गाड़ियों के इंश्योरेंस की तत्काल पुष्टि के लिए हैंडहेल्ड डिवाइस देने के लिए भी कोर्ट ने कहा है.
ध्यान रहे कि मोटर व्हीकल्स एक्ट की धारा 146 के तहत थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस अनिवार्य है, लेकिन इसका पालन नहीं हो रहा है. कोर्ट का मानना है कि ईंधन आपूर्ति को बीमा की वैधता से जोड़ने से वाहन मालिक समय पर पॉलिसी का नवीनीकरण करवाएंगे और दुर्घटना पीड़ितों को मुआवजा मिलने की प्रक्रिया प्रभावी हो सकेगी.

थर्ड पार्टी में क्या-क्या होता है?
अगर आपकी गाड़ी से कोई दुर्घटना हो जाती है, तो यह पॉलिसी निम्निलिखित परिस्थितियों में वित्तीय सुरक्षा देती है:-
- दुर्घटना में किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु होने या उसे गंभीर चोट लगने पर कानूनी मुआवजे की पूरी जिम्मेदारी बीमा कंपनी की है. इस स्थिति में बीमा कंपनी 7.5 लाख तक का हर्जाना भरती है.
- कोर्ट-कचहरी या मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT) के मामलों में भी कानूनी लड़ाई का खर्च थर्ड पार्टी में कवर होता है.
- वाहन मालिक की मृत्यु या स्थायी तौर पर विकलांगता की स्थिति में 15 लाख तक का फिक्स्ड कवर मिलता है.
इंश्योरेंस पॉलिसी रिन्यू कराने का आसान तरीका
- किसी भी इंश्योरेंस एग्रीगेटर (Policybazar, Mintpro) की वेबसाइट पर जाए.
- अपनी गाड़ी का नंबर और पुरानी पॉलिसी (अगर हो तो) का डिटेल्स डालें
- अपने बजट के हिसाब से कोई भी 'Third-Party Plan' चुनें
- ऑनलाइन पेमेंट करनें और 2 मिनट के भीतर आपकी नई पॉलिसी आपके ईमेल पर आ जाएगी.
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