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Inflation Analysis: रुला रही महंगाई तो विपक्ष सरकार पर हमलावर, इन तथ्यों से जानें क्यों ग्लोबल कारण भी हैं जिम्मेदार

Inflation Analysis: दुनिया में महंगाई के मोर्चे पर आर्थिक शक्ति के तौर पर सबसे मजबूत देश अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, इटली के हालात क्या हैं, भारत इन देशों की तुलना में कहां खड़ा है- ये जानें.

Inflation Analysis: आज भारत में सड़क से लेकर संसद तक सिर्फ एक ही आवाज सुनाई पड़ रही है और वो आवाज उठ रही है देश के अंदर लगातार बढ़ रही कमतोड़ महंगाई के खिलाफ, नींबू की बात करें तो महंगा, कपड़ा महंगा, पेट्रोल-डीजल के रेट तो आसमान छू रहे हैं, घर के राशन की कीमतें भी लगातार बढ़ती जा रहीं हैं. ये सुनने के बाद सवाल तो बनता है कि महंगाई का ग्राफ सिर्फ भारत में ही बढ़ता जा रहा है या दुनिया के सुपरपावर माने जाने वाले देशों का भी हाल यही है. आपके जेहन में उठ रहे हर सवाल का विस्तार से विष्लेशण किया जा रहा है लेकिन सबसे पहले जान लीजिए कि आखिर कब माना जाता है कि देश के अंदर महंगाई बढ़ रही है. 

क्या है महंगाई
आसान भाषा में समझिए कि जो सामान आप मौजूदा समय में खरीद रहे है उसका मूल्य पिछले 6 महीने की तुलना में कितना बढ़ा या घटा है अगर दाम में बढ़ोत्तरी 6 महीने से लगातार जारी है तो माना जाता है कि देश में महंगाई बढ़ रही है. आरबीआई के मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने वाले मानक के मुताबिक यह दर 2 से 6 फीसदी के बीच होनी चाहिए लेकिन मौजूदा समय में अप्रैल के आंकड़ों के मुताबिक 7.79 फीसदी तक पहुंच चुका है जो मई 2014 के बाद से सबसे ज्यादा है.

आंकड़ों के जरिए आपको बताते हैं कि बीते एक साल में यानी अप्रैल 2021 से अप्रैल 2022 के बीच रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं के दाम में कितनी बढ़ोत्तरी हुई है

खाद्य तेलों पर महंगाई 17.28 फीसदी
सब्जियां 15.41 फीसदी की दर से बढ़ी है
ईंधन और बिजली की कीमतों में 10.80 फीसदी की बढ़ोत्तरी
कपड़े में 9.85 फीसदी
तो खाद्य वस्तुओं के दाम 8.10 फीसदी की दर से महंगे हुए हैं. (सोर्स पीआईबी)

भारत की अर्थव्यवस्था में महंगाई के दौरान वस्तुओं के दाम में कितना इजाफा हुआ है ये यहां पर आपने देख लिया लेकिन दुनिया में आर्थिक शक्ति के तौर पर सबसे मजबूत देश अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, इटली के हालात क्या हैं, भारत इन देशों की तुलना में कहां खड़ा है-ये भी जान लीजिए. ये देश संयुक्त राष्ट्र संघ, OECD, G20 जैसी संस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. तो देखिए इन देशों में महंगाई का क्या आलम है-

अमेरिका में महंगाई दर 8.3 फीसदी 
ब्रिटेन में 7 फीसदी जो 1992 के बाद अपने उच्चतम स्तर पर है
स्पेन में 8.4 फीसदी
जर्मनी में 7.4 फीसदी
इटली 6.2 फीसदी 
वहीं अपने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में महंगाई 15.1 फीसदी के दर से लगातार बढ़ रही है, हालांकि पाकिस्तान के हालात किस कदर खराब हैं ये किसी से छिपा नहीं है 

अमेरिका का हाल
अमेरिका में करीब चार दशकों के बाद लोगों ने इतनी महंगाई देखी है, खाने पीने की कीमतें अमेरिका में 10 फीसदी चढ़ गई हैं, तो बिजली की कीमतों में 32 फीसदी का इजाफा दर्ज किया गया है.

ब्रिटेन की हालत खस्ता
अमेरिका के साथ ही ब्रिटेन में भी महंगाई ने लोगों का हाल-बेहाल कर रखा है 1992 के बाद के बाद महंगाई अपने उच्चतम स्तर पर है. ब्रिटेन में ईंधन की कीमतों में 31 साल में सबसे ज्यादा इजाफा देखने को मिला है , तो वहीं हर दिन इस्तेमाल होने वाली जरूरी सामनों  के  दाम में 10 फीसदी से ज्यादा वृद्धि दर्ज की गई है, 

जर्मनी में भी महंगाई में जोरदार इजाफा
अमेरिका और ब्रिटेन ही नहीं बल्कि, जर्मनी में साल 1981 के बाद इतनी महंगाई देखी जा रही है, यहां खाद्य वस्तुओं के दाम में साल-दर-साल 5.9 फीसदी, हाउसिंग, पानी, बिजली, गैस और अन्य ईंधन पर महंगाई 8.8 फीसदी के दर से लगातार बढ़ती जा रही है.

वैश्विक महंगाई बढ़ने का क्या दिख रहा असर
महंगाई की दर अमेरिका, ब्रिटेन, तुर्की, पाकिस्तान समेत ज्यादातर देशों में भारत की तुलना में कई गुना ज्यादा  है, वहीं जर्मनी, इटली, स्पेन सहित कई यूरोपीय देशों में खाद्य तेलों और आटे का स्टाक खत्म होते हुए दिखाई दे रहा है, लोग आवश्यकता से अधिक खरीद कर रहे हैं, ऐसे में कई यूरोपीय देशों के सुपर मार्केट के तहत ग्राहकों को सीमित मात्रा में सामान बेचने का नियम लागू कर दिया है, इतना ही नहीं, कई यूरोपीय देशों में उद्योग-कारोबार में गिरावट के कारण कर्मचारियों की छंटनी के संकेत दिखाई दे रहे हैं.

भारत की तुलना 
अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी जैसे देश इकोनॉमिक, मैन्यूफैक्चरिंग और टेक्नॉलोजी के मामले में काफी आगे हैं. वहीं विकासशील देश होने के बावजूद भारत में महंगाई दर इन देशों के मुकाबले अभी भी स्थिर माना जा सकता है, भारत जनसंख्या के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर है हम यहां जनसंख्या का जिक्र इसलिए कर रहे हैं क्योंकि महंगाई का संबंध बाजार में वस्तुओं की डिमांड और सप्लाई से होता है.

यहां जानें आखिर महंगाई बढ़ने के पीछे की असली वजह क्या है.
कोरोना महामारी के दौरान पूरी दुनिया में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा. रूस और यूक्रेन के युद्ध के चलते कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया जिसका असर ट्रांसपोर्टेशन पर सबसे ज्यादा पड़ा, और जब ट्रांसपोर्ट महंगा होता है तो उसका असर बाकी चीजों पर भी पड़ता है. कोरोना के दौरान पूरी दुनिया में अनगिनत कंपनियों की मशीनें ठप्प पड़ गई जिसका नतीजा ये हुआ कि वस्तुओं का उत्पादन जो वैश्विक मांग के आधार पर लगातार किया जा रहा था वो अचानक रुक गया. पूरी दुनिया में लॉकडाउन के चलते लोगों का घरों से निकलना लगभग बंद हो गया. 

कोरोनाकाल खत्म होने का असर भी बड़ा कारण
अब आप गौर से समझिएगा कि अचानक से पूरी दुनिया पर महंगाई की मार क्यों पड़ी. जब दुनियाभर के कई देशों में लॉकडाउन हटाया जाने लगा तो लोगों का रूझान सबसे ज्यादा खरीददारी पर बढ़ा. अचानक से जिन सामानों की मांग बीते 2 सालों में लगभग ना के बराबर थी उनकी मांग में तेजी के साथ उछाल देखा गया. इस बात को आप भी बहुत अच्छे से समझते हैं कि अगर कोई वस्तु सीमित मात्रा में उपलब्ध है और खरीददारों की संख्या उससे भी ज्यादा हो तो अपने आप उस सामान की कीमत बढ़ जाती है. मौजूदा दौर में पूरी दुनिया में यही हो रहा है. सामान कम हैं और खरीददार ज्यादा जिससे मांग औऱ आपूर्ति की चेन प्रभावित हुई और वस्तुओं के दाम बढ़ गए. 

केंद्र सरकार को आलोचनात्मक राजनीति का सामना करना पड़ रहा
लेकिन महंगाई की मार के अलावा भी केंद्र सरकार को आलोचनात्मक राजनीति का भी सामना करना पड़ रहा है. कोरोना जैसी महामारी से उत्पन्न हुए संकट के दौर में सरकार का साथ देना या देश की जनता को हालात बताने में एक खास पक्ष रखना.. चाहे संसद हो, सड़क हो या सोशल मीडिया, महंगाई को लेकर हर तरफ सरकार के खिलाफ विपक्ष के बगावती तेवर साफ तौर पर देखे जा सकते हैं. इस स्थिति को इस तरह समझा जा सकता है कि मान लीजिए कि आपका परिवार एक देश है और परिवार के मुखिया पर खर्चे से लेकर हर जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी होती है लेकिन अचानक कोई ऐसी विपदा आ जाए और मुखिया का खर्च अचानक बढ़ जाए तो निश्चित तौर पर परिवार की माली हालत पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. ठीक उसी तरह ही कुछ यहां भी हुआ. 

साल 2004 से 2014 के बीच कैसा था महंगाई का हाल
2004 से 2014 तक देश में कांग्रेस की सरकार थी, उसी समय पूरी दुनिया को आर्थिक मंदी का भी सामना करना पड़ा था. साल 2004 से मई 2014 के बीच देश में महंगाई की स्थिति क्या थी, क्या आज के मौजूदा हालात में सरकार पर लगातार तीखे हमले कर रही कांग्रेस ने अपने कार्यकाल के दौरान आए संकटों का सामना ठीक से किया था. 2004 में कांग्रेस ने अपने समर्थित दलों के साथ देश में नई सरकार बनाई जिस वक्त सरकार ने अपने कामकाज  की शुरूआत की उस दौरान देश में महंगाई दर 3.77 फीसदी थी सामान्यतया ये आंकड़ा बताता है कि देश में महंगाई काबू में हैं लेकिन जैसे -जैसे साल बढ़ते गए उसी अनुपात में देश के अंदर महंगाई की दर में भी तेजी बढ़ती गई, अब आप इन आंकड़ों पर नजर डालिए.

साल 2008 में महंगाई दर 8.35 फीसदी तक थी
साल 2008 में देश को आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ा था उस दौर में देश के अंदर महंगाई की दर बढ़कर 8.35 फीसदी तक पहुंच गई थी, अगर इसकी तुलना कोरोना काल से किया जाय तो वर्तमान समय में महंगाई दर काफी अच्छी स्थिति में माना जा सकता है. देश लगातार 2 साल तक कोरोना महामारी से प्रभावित था सरकार को भी 6 लाख करोड़ से ज्यादा के आपातकालीन आर्थिक पैकेज की घोषणा करनी पड़ी, देश के नागरिकों को राशन भी मुहैया कराए गए मुफ्त में स्वास्थ्य सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गई, जिसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ना लाजमी था,  साल 2008 के बाद ठीक अगले साल ही महंगाई की दर बढ़कर 10.88 फीसदी हो गई फिर क्या ये दर साल दर काबू होने की बजाय लगातार बढ़ता ही गया. कांग्रेस के 10 साल के कार्यकाल में सबसे उच्चतम महंगाई दर 11.99 फीसदी थी और जब सरकार के 10 साल का कार्यकाल खत्म हुआ तो उस दौरान महंगाई की दर 6.65 फीसदी थी.

सवाल भी उठ रहे हैं
इन्हीं आंकड़ों के बीच सवाल भी उठे कि क्या सरकार के खिलाफ लगातार हल्लाबोल रही कांग्रेस अपने विपक्षी दल होने का कर्तव्य ईमानदारी के साथ निभा रही है? क्योंकि ये माना जाता है कि एक स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए देश में विपक्ष की भूमिका काफी अहम होती है अगर विपक्ष जिम्मेदारी के तौर पर अपने कर्तव्य का निर्वहन करे तो देश का लोकतंत्र और मजबूत होगा.

भारत के पक्ष में रहे हैं ये कारण
इस समय दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में भारत में महंगाई को तेजी से बढ़ने से रोकने में कुछ अनुकूलताएं भी स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती हैं, देश में अच्छी कृषि पैदावार खाद्य पदार्थों की कीमतों के नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है, यह भी एक बड़ी अनुकूलता है कि देश में न केवल सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए आवश्यकता से अधिक चावल और गेहूं का सुरक्षित केंद्रीय भंडार भरपूर है, बल्कि इस समय देश गेहूं और चावल का रिकार्ड स्तर पर निर्यात करते हुए भी दिखाई दे रहा है, इसी क्रम में RBI ने रेपो रेट 0.40 फीसदी बढ़ाने के अलावा महंगाई को काबू करने के लिए कई ठोस कदम भी उठाए हैं. आपके रोजमर्रा के सामान के दाम लगातार क्यों बढ़ रहे है और महंगाई लगातार क्यों बढ़ती जा रही है इस लेख से आपको एक स्पष्ट दृष्टिकोण बनाने में मदद मिलेगी. 

 

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