अब विदेश से आएगा आटा, तेल, सोयाबीन और मक्का, सूखे से देश के हालात बुरे!
सूखे का असर सोयाबीन से लेकर सरसों और मक्के के फसल पर भी पड़ा है. ऐसे में खाद्य और कृषि उत्पादों के आयात में भारी वृद्धि होने का अनुमान है. आटे से लेकर चीनी के आयात का भी अनुमान है.

- सूखे से फसलें खराब, भारत में आयात बढ़ने की आशंका.
- सोयाबीन-मक्का कमी से खाद्य तेल, पशु आहार महंगे.
- डेयरी, पोल्ट्री प्रभावित, अंडे-दूध-चिकन के दाम बढ़े.
- सरकार से सोयाबीन मील, मक्का आयात की अनुमति मांगी गई.
कारोबारी साल 2026-27 में भारत खाने-पीने की तमाम चीजों के साथ-साथ पशु चारे और कृषि क्षेत्र से जुड़े कच्चे माल का आयात बढ़ा सकता है. द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में इसकी जानकारी दी गई है. दरअसल, इस साल सूखे की संकट के बीच फसलों को काफी नुकसान पहुंचा है. इससे घरेलू स्तर पर आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं.
सूखे ने बढ़ाई टेंशन
रिपोर्ट के मुताबिक, सोयाबीन और मूंगफली खरीफ सीजन की प्रमुख फसलें हैं. कमजोर मानसून से इन्हें नुकसान पहुंचने से देश के भीतर खाद्य तेलों और पशु-आहार की भारी किल्लत हो गई है. ऐसे में आने वाले समय में खाद्य तेल का आयात बढ़ सकता है. अब चूंकि मक्का और सोयाबीन मील जैसे पशु चारे के दाम बढ़े हैं, तो इसका बुरा असर डेयरी और पोल्ट्री उद्योग पर पड़ा है. इससे आम उपभोक्ताओं के लिए अंडे, दूध और चिकन की कीमतें बढ़ गई हैं.
पोल्ट्री फीड बनाने वाली कंपनियां सोयाबीन मील और मक्का आयात करने की अनुमति मांग रही हैं और कपड़ा निर्माता कपास पर आयात शुल्क हटाने की मांग कर रहे हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्टार्च उद्योग को इस बात की चिंता है कि अगर मक्के का एक बड़ा हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में चला जाता है, तो चीन से स्टार्च के आयात की जरूरत बढ़ सकती है. इन्हीं सब चिंताओं के बीच सर्दियों में होने वाली सरसों की फसल को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है.
सोयाबीन पर क्या है संकट?
सोयाबीन की फसलों पर मौसम की दोहरी मार पड़ी है. पिछले साल अत्यधिक और बेमौसम बारिश के कारण पकी हुईं फसलें खेतों में ही सड़ गई थीं. वहीं, अब इस वित्तीय वर्ष (FY 2026-27) में मानसून की बेरुखी ने मराठवाड़ा, विदर्भ, तेलंगाना और मध्य प्रदेश के सोयाबीन बेल्ट में फसलों को नुकसान पहुंचाया है.
कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (CLFMA) के चेयरमैन दिव्य कुमार गुलाटी ने 'द इकोनॉमिक टाइम्स' को बताया कि उद्योग जगत ने सरकार से 3 मिलियन टन सोयाबीन मील (सोयाबीन की खली) के आयात की अनुमति मांगी है. पोल्ट्री फीड में सोयाबीन मील और मक्के की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत है और इनकी ऊंची कीमतों के कारण लागत का दबाव बढ़ रहा है.
चीनी कारोबारियों को पहले ही राहत
चीनी उद्योग को कच्चे चीनी के आयात के लिए समयसीमा को पहले ही बढ़ा दिया है. इसके अलावा, अगर मक्के का ज्यादा इस्तेमाल इथेनॉल उत्पादन में होता है, तो स्टार्च उद्योग को आपूर्ति के लिए चीन पर और अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है.
द इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, सूखे के कारण घरेलू स्तर पर तिलहन के उत्पादन पर असर पड़ने से, भारत का खाद्य तेल आयात 2025-26 के 16.5 मिलियन टन से बढ़कर 2026-27 में 17.5 मिलियन टन तक पहुंच सकता है. अंतिम अनुमान काफी हद तक सरसों के उत्पादन पर निर्भर करेगा. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पिछले साल अत्यधिक बारिश के कारण फसल को नुकसान पहुंचने के बाद, अफ्रीका के सबसे कम विकसित देशों से सोयाबीन का आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था.
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