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Exclusive: चार नए लेबर कोड की कई खूबियां, लेकिन इन पर क्यों नहीं गया सरकार का ध्यान?

एबीपी लाइव से बातचीत में आईआईएमसी के प्रोफेसर शिवाजी सरकार ने कहा कि भले ही नए कानूनों को सुधार के तौर पर पेश किया गया हो, लेकिन डीए और वेतन की परिभाषा को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है.

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  • चार नए श्रम कानून 29 पुराने कानूनों की जगह लेंगे।
  • नए कोड, वेतन, गिग वर्कर्स, महिला नाइट शिफ्ट को प्रभावित करेंगे।
  • भत्तों की परिभाषा और वेतन पर अस्पष्टता बनी हुई है।
  • स्थायी रोजगार कमजोर, गिग वर्कर्स को लाभ पर सवाल उठ रहे हैं।

Indis's New Labour Codes: देश में लागू किए गए नए लेबर कोड को लेकर इन दिनों व्यापक चर्चा हो रही है, क्योंकि ग्रैच्युटी, वेतन संरचना, गिग वर्कर्स, महिलाओं की नाइट शिफ्ट और कॉन्ट्रैक्ट वर्क जैसे मुद्दों पर इसके दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं. 21 नवंबर 2025 से देशभर में लागू हुए चार नए लेबर कोड- वेतन संहिता 2019, औद्योगिक संबंध संहिता 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 और व्यवसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य शर्त संहिता 2020 ने आज़ादी के बाद से चले आ रहे 29 पुराने श्रम कानूनों की जगह ले ली है.

क्यों लाए गए नए लेबर कोड?

इन कानूनों को लाने का उद्देश्य बदलते कार्य-संस्कृति, तकनीक और रोजगार के नए स्वरूपों के अनुरूप श्रम व्यवस्था को सरल और एकरूप बनाना था, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कई अहम बिंदुओं पर अब भी अस्पष्टता बनी हुई है.

एबीपी लाइव से बातचीत में आईआईएमसी के प्रोफेसर शिवाजी सरकार ने कहा कि भले ही नए कानूनों को सुधार के तौर पर पेश किया गया हो, लेकिन डीए और वेतन की परिभाषा को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है. उन्होंने बताया कि यदि भत्ते कुल वेतन के 50 प्रतिशत से अधिक हो जाते हैं तो उन्हें ‘वेजेज’ में शामिल करने की बात कही गई है, लेकिन इंडस्ट्री द्वारा तय किए जाने वाले वेतन पर नियंत्रण को लेकर कोई ठोस दिशा-निर्देश नहीं दिए गए हैं, जिससे नियोक्ताओं को ज्यादा लाभ और कर्मचारियों को सीमित फायदा मिल सकता है.

क्या हो गए अहम बदलाव?

उनके अनुसार पहले की तरह अब भी आठ घंटे की ड्यूटी का प्रावधान है और उससे अधिक काम को ओवरटाइम माना जाएगा, साथ ही डिजिटल और ऑडियो-विजुअल मीडिया से जुड़े श्रमिकों को भी इसके दायरे में लाया गया है, लेकिन इससे कर्मचारियों को वास्तविक तौर पर कितना लाभ होगा, यह भविष्य में ही स्पष्ट हो पाएगा.

उठ रहे ये सवाल

शिवाजी सरकार ने चिंता जताई कि कांट्रैक्ट वर्क को बढ़ावा मिलने और वेज बोर्ड खत्म किए जाने से सामाजिक असंतोष बढ़ सकता है, क्योंकि इससे स्थायी रोजगार की सुरक्षा कमजोर हो सकती है. हालांकि गिग और फ्रीलांस वर्कर्स को कानूनी दायरे में लाना एक सकारात्मक कदम है, लेकिन उनके वेतन, सामाजिक सुरक्षा और अधिकारों को कैसे सुनिश्चित किया जाएगा, इस पर कानून में ठोस गारंटी नहीं दी गई है.

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब नियमित कर्मचारियों को भी नौकरी जाने का डर बना रहता है, तो कमजोर वर्ग के श्रमिक न्याय के लिए बार-बार अदालत का सहारा कैसे ले पाएंगे. कुल मिलाकर, नए लेबर कोड से यह धारणा बन रही है कि नियोक्ताओं के लिए कर्मचारियों को हटाना आसान हो सकता है, जबकि कर्मचारियों के अधिकारों और सुरक्षा को लेकर स्पष्टता कम है, ऐसे में सरकार के लिए जरूरी है कि वह इन कानूनों में निहित अधिकारों, दायित्वों और लाभों को साफ तौर पर परिभाषित करे, ताकि श्रमिक और नियोक्ता दोनों को संतुलित और न्यायसंगत व्यवस्था का लाभ मिल सके.

राजेश कुमार पत्रकारिता जगत में पिछले करीब 14 सालों से ज्यादा वक्त से अपना योगदान दे रहे हैं. राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों से लेकर अपराध जगत तक, हर मुद्दे पर वह स्टोरी लिखते आए हैं. इसके साथ ही, किसी खबरों पर किस तरह अलग-अलग आइडियाज के साथ स्टोरी की जाए, इसके लिए वह अपने सहयोगियों का लगातार मार्गदर्शन करते रहे हैं. इनकी अंतर्राष्ट्रीय जगत की खबरों पर खास नज़र रहती है, जबकि भारत की राजनीति में ये गहरी रुचि रखते हैं. इन्हें क्रिकेट खेलना काफी पसंद और खाली वक्त में पसंद की फिल्में भी खूब देखते हैं. पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर ऑफ ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म किया है. राजनीति, चुनाव, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर राजेश कुमार लगातार लिखते आ रहे हैं.
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