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रेसिप्रोकल टैरिफ शब्द का मतलब क्या होता है? किसी भी देश पर ये किन स्थितियों में लगाया जाता है, भारत पर 2 अप्रैल से होगा लागू

रेसिप्रोकल टैरिफ की शुरुआत 19वीं सदी में हुई. 1860 में ब्रिटेन और फ्रांस के बीच कोबडेन-शेवेलियर संधि हुई, जिसमें टैरिफ कम किए गए. फिर, 1930 का दशक आया, जब अमेरिका ने स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट लागू किया.

Donald Trump Reciprocal Tariff: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बुधवार सुबह-सुबह भारत को एक बड़ा झटका दे दिया. अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के जॉइंट सेशन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत हमसे 100 फीसदी से ज्यादा टैरिफ वसूलता है, हम भी अगले महीने से ऐसा ही करने जा रहे हैं. यानी 2 अप्रैल से भारतीय प्रोडक्ट्स पर डोनाल्ड ट्रंप रेसिप्रोकल टैरिफ नीति लागू कर देंगे. अपने 1 घंटा 44 मिनट के भाषण में ट्रम्प ने कहा कि उन्होंने 43 दिन में जो किया, वह कई सरकारें अपने 4 या 8 साल के कार्यकाल में नहीं कर पाईं. चलिए, अब आपको बताते हैं कि आखिर रेसिप्रोकल शब्द का मतलब क्या होता है और यह कोई देश किसी दूसरे देश पर कब लगाता है.

रेसिप्रोकल टैरिफ क्या है?

रेसिप्रोकल का मतलब होता है प्रतिशोधात्मक. यानी जैसे को तैसा वाली नीति. इसे ऐसे समझिए कि रेसिप्रोकल टैरिफ एक ऐसा टैक्स या व्यापार प्रतिबंध है जो एक देश दूसरे देश पर तब लगाता है, जब वह देश भी उसी तरह का टैक्स या प्रतिबंध पहले देश पर लगाता है. मतलब, अगर एक देश दूसरे देश के सामान पर 100 फीसदी टैक्स लगाता है, तो दूसरा देश भी उसी तरह का टैक्स लगा सकता है. इसका मकसद व्यापार में संतुलन बनाना होता है.

रेसिप्रोकल टैरिफ का मकसद क्या होता है?

  • व्यापार संतुलन: यह सुनिश्चित करना कि कोई देश दूसरे देश के सामान पर ज्यादा टैक्स न लगाए.
  • स्थानीय उद्योगों की सुरक्षा: विदेशी सामान महंगा होने से स्थानीय उद्योगों को फायदा होता है.
  • व्यापार वार्ता का हिस्सा: कई बार देश इसे एक वार्ता के तौर पर इस्तेमाल करते हैं ताकि दूसरा देश टैक्स कम करे.

रेसिप्रोकल टैरिफ के नुकसान

  • व्यापार युद्ध: अगर दोनों देश एक-दूसरे पर टैक्स लगाते रहें, तो यह व्यापार युद्ध यानी ये ट्रेड वॉर में बदल सकता है.
  • महंगाई: विदेशी सामान महंगा होने से उपभोक्ताओं को नुकसान होता है.
  • आपूर्ति श्रृंखला में बाधा: व्यापार युद्ध से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है.

रेसिप्रोकल टैरिफ का इतिहास

रेसिप्रोकल टैरिफ की शुरुआत 19वीं सदी में हुई. 1860 में ब्रिटेन और फ्रांस के बीच कोबडेन-शेवेलियर संधि हुई, जिसमें टैरिफ कम किए गए. इसके बाद, 1930 का दशक आया, जब अमेरिका ने स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट लागू किया, जिससे वैश्विक व्यापार प्रभावित हुआ और महामंदी बढ़ी. हाल ही में, ट्रंप प्रशासन ने चीन, यूरोपीय संघ और अन्य देशों पर टैरिफ लगाए, जिसके जवाब में उन देशों ने भी अमेरिकी सामान पर टैक्स लगाए.

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सुष्मित सिन्हा एबीपी न्यूज़ के बिज़नेस डेस्क पर बतौर सीनियर सब एडिटर काम करते हैं. दुनिया भर की आर्थिक हलचल पर नजर रखते हैं. शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव के बीच तेजी से बदलते आंकड़ों की बारिकियों को आसान भाषा में डिकोड करने में दिलचस्पी रखते हैं. डिजिटल मीडिया में 5 साल से ज्यादा का अनुभव है. यहां से पहले इंडिया टीवी, टीवी9 भारतवर्ष और टाइम्स नाउ नवभारत में अपनी सेवाएं दे चुके हैं.
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