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उठते सवालों के बीच मेरी उर्दू से पहली मुलाक़ात

जब मैं छोटा था, तो मेरी उर्दू से बतौर सब्जेक्ट पहली मुलाक़ात 6वीं क्लास में हुई. हाफ़-ईयरली के एग्जाम में उर्दू के पेपर में सारे सवालों का जवाब हिंदी में लिख आया. फिर भी सही जवाब लिखने की वजह से मुझे सोलह नंबर मिल गए. मौलवी साहब, जो उर्दू के टीचर थे, उन्होंने क्लास में सिर्फ़ इतना कहा, "उर्दू का जवाब हिंदी में लिखते हो?"

वो दौर ही कुछ और था. हमारे उर्दू पढ़ाने वाले मौलवी साहब क़मीज़ और धोती पहनकर स्कूल आते थे. बहुत ही खूबसूरत दौर था वो- जहां आपसी भाईचारा था, मोहब्बत थी, और लिबास देखकर आप किसी की पहचान नहीं कर सकते थे, हमारे मौलवी साहब की भी नहीं.

उर्दू सिर्फ़ मुसलमानों की भाषा नहीं

उर्दू के ऐसे कई शायर हुए हैं जो नाम से भले हिन्दू थे, लेकिन शायरी उर्दू में करते थे- रघुपति सहाय 'फ़िराक़ गोरखपुरी', गोरख प्रसाद 'इबरत', बिशनु शंकर माथुर 'बिशनु इलाहाबादी' और लालता प्रसाद अग्रवाल 'शाद मेरठी'. इनकी शायरी इतनी शीरीं थी कि नाम मुसलमानों जैसे लगने लगे.

मशहूर लेखक मुंशी प्रेमचंद कौन नहीं जानता? उर्दू में उनके लिखे हुए अफ़साने आज भी अदब का हिस्सा हैं. लेकिन हम कभी नहीं सोच सकते थे कि एक दिन ऐसा आएगा जब उर्दू बोलने वालों को ज़लील किया जाएगा.

 उर्दू के ख़िलाफ़ सत्ता का रवैया

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में कहा था कि "उर्दू बोलने या पढ़ने वाला कठमुल्ला होता है." राजस्थान सरकार ने दो उर्दू स्कूलों में उर्दू हटाकर संस्कृत पढ़ाने का आदेश दिया. ये सिर्फ़ सरकारी फ़ैसले नहीं, बल्कि एक बड़े एजेंडे की झलक है.

उर्दू जो भारत में पैदा हुई, उसे सिर्फ़ मुसलमानों से क्यों जोड़ा जा रहा है? इसे मिटाने की कोशिश क्यों हो रही है?

 मदरसों और मुस्लिम पहचान पर हमले

बीजेपी के दौर-ए-हुकूमत में जिन राज्यों में इनकी सरकार है, वहाँ मुसलमानों की मज़हबी पहचान को मिटाने की एक सोची-समझी स्ट्रेटेजी नज़र आती है.

उत्तर प्रदेश में सैकड़ों मदरसों को ग़ैर-क़ानूनी बताकर उनकी फंडिंग बंद कर दी गई.

असम में कई मदरसों को गिरा दिया गया.

मस्जिदों और मज़ारों को अतिक्रमण बताकर ढहाया जा रहा है, चाहे वो सैकड़ों साल पुराने हों.

मदरसे वो जगहें हैं जिन्होंने मौलाना मजरुल हक़ खैराबादी को जन्म दिया, जिन्होंने 1857 की क्रांति में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जिहाद का फ़तवा दिया. वहीँ, मौलाना महमूद हसन देवबंदी और उबैदुल्लाह सिंधी जैसे स्वतंत्रता सेनानी भी यहीं से निकले. आज उन ही मदरसों को ख़तरा बताकर निशाना बनाया जा रहा है.

मुस्लिम नागरिकों के अधिकारों का हनन

सैकड़ों मुस्लिम सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक बिना सबूत के जेल में बंद हैं.

TADA और UAPA जैसे कानूनों के तहत कई मुसलमानों को 12-14 साल जेल में रखा गया, और फिर अदालत ने बेगुनाह करार दिया. लेकिन तब तक उनकी ज़िंदगी और परिवार बर्बाद हो चुके थे.


त्योहारों के नाम पर भेदभाव

उत्तर प्रदेश में नवरात्रि के दौरान मुस्लिम मीट दुकानदारों को ज़बरन दुकानें बंद करने को कहा जाता है, जबकि हाईवे के मोटल्स में अंडा-पराठा बिकता है.

सवाल ये है कि क्या यह धार्मिक आस्था का सवाल है या एक समुदाय को निशाना बनाने की राजनीति?


हिजाब विवाद और धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला

बीजेपी सरकार में कर्नाटक के स्कूलों और कॉलेजों में मुस्लिम लड़कियों के हिजाब पहनने पर पाबंदी लगाई गई.

क्या शिक्षा पाने का अधिकार सिर्फ़ इसलिए छीना जाना चाहिए क्योंकि कोई लड़की हिजाब पहनती है?


मॉब लिंचिंग और हिंसा

अख़लाक़, जुनैद, पहलू ख़ान की गाय के नाम पर मॉब लिंचिंग की घटनाएँ आम हो गई हैं.

सरकार कहती है कि "कानून अपना काम करेगा," लेकिन हत्यारे आज़ाद घूम रहे हैं और पीड़ित परिवार अदालतों के चक्कर काट रहे हैं.


 अंतरराष्ट्रीय नज़र में भारत

एनडीए सरकार "वसुधैव कुटुंबकम्" का नारा देती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया और मानवाधिकार संगठन भारत में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों पर चिंता जता रहे हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच (जनवरी 2025) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा और भेदभाव में बढ़ोतरी हुई है. द गार्जियन, न्यूयॉर्क टाइम्स और बीबीसी जैसी विदेशी मीडिया संस्थाओं ने भारत में मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों की डिटेल रिपोर्टिंग की है.


 भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान पर ख़तरा

महात्मा गांधी का भारत, जो अहिंसा और सहिष्णुता के लिए जाना जाता था, अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसे देश के रूप में देखा जा रहा है जहाँ धार्मिक असहिष्णुता बढ़ रही है. भारत की लोकतांत्रिक और बहुसांस्कृतिक पहचान ख़तरे में है.

क्या लोकतंत्र बचेगा?

अगर यही हालात जारी रहे तो सवाल ये उठता है:

. क्या भारत का लोकतंत्र और संविधान बच पाएगा?

. क्या मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी?

. क्या एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में किसी विशेष समुदाय को हाशिए पर धकेलना जायज़ है?

आज सवाल सिर्फ़ मुसलमानों का नहीं, बल्कि पूरे देश की लोकतांत्रिक बुनियाद का है.

अगर यह बुनियाद हिलती है, तो कल कोई भी इससे अछूता नहीं रहेगा.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.] 

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