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NCRB रिपोर्ट में यूपी मॉडल: आंकड़ों से आगे भरोसे की बहाली की कहानी

अपनी बात एक सवाल के साथ शुरू करूंगा. किसी राज्य की कानून व्यवस्था को आप अपनी दृष्टि में किस आधार पर मापेंगे? थानों की संख्या, पुलिस बल के आकार या बजट आवंटन से. वस्तुतः कानून व्यवस्था के आकलन का यह पैमाना हो ही नहीं सकता. इसके आकलन का आधार उस मनोविज्ञान से होना चाहिए जो समाज के सबसे साधारण व्यक्ति के भीतर होता है कि क्या वह रात को निर्भय होकर सो सकता है, क्या वह अपनी शिकायत लेकर थाने जाने का साहस रखता है, और क्या उसे यह विश्वास है कि अपराधी को दंड मिलेगा.

भयग्रस्त समाज कभी सृजनशील नहीं हो सकता. जहां असुरक्षा होती है, वहां व्यक्ति अपनी ऊर्जा विकास और रचनात्मकता में नहीं, बल्कि स्वयं को बचाने में खर्च करने लगता है. इसके विपरीत, जब नागरिक सुरक्षित महसूस करता है, तभी वह जोखिम उठाता है, उद्यम करता है, शिक्षा और संस्कृति की ओर बढ़ता है और भविष्य के प्रति आशावान बनता है. सामाजिक सुरक्षा केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सभ्यता, अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र-तीनों की आधारशिला है.

इस कसौटी पर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की वर्ष 2024 की रिपोर्ट को रखते हैं जो उत्तर प्रदेश के विषय में ऐसी तस्वीर प्रस्तुत करती है, जो न केवल प्रशासनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, बल्कि लोकतांत्रिक समाज की गहरी समझ की मांग करती है. अपराध-विमर्श में प्रायः घटनाओं की कुल संख्या को ही आधार बना लिया जाता है, जो भ्रामक होती है. एक पूर्व डीजीपी होने के नाते मैं उन तथ्यों को सामने रखना  चाहता हूं जो महत्वपूर्ण हैं.

किसी भी राज्य की वास्तविक स्थिति समझने के लिए क्राइम रेट  अर्थात् प्रति एक लाख जनसंख्या पर अपराधों की संख्या  ही प्रामाणिक और तुलनीय संकेतक है. यही मानक जनसंख्या और भूगोल के असंतुलन को निष्पक्ष रूप से संतुलित करता है. उत्तर प्रदेश जैसे देश के सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्य के लिए यह कसौटी और भी अनिवार्य हो जाती है. इस कसौटी पर उत्तर प्रदेश की अपराध दर राष्ट्रीय औसत से उल्लेखनीय रूप से नीचे है, और देश की 17 प्रतिशत जनसंख्या के साथ कुल अपराधों में उसका स्थान 18वां है. यह अंतर साधारण नहीं योगी सरकार की नीति और इच्छाशक्ति का परिणाम है.

मेरा मानना है कि अपराध नियंत्रण का मूल्यांकन शासन की नैतिक विश्वसनीयता से किया जाना चाहिए. जब राज्य अपराध के प्रति नरम दिखाई देता है, तब अपराध केवल सामाजिक समस्या नहीं रह जाता, वह सत्ता संरचना का हिस्सा बनने लगता है.

राजनीतिक संरक्षण की आड़ में अपराधी निर्भय हो जाते हैं

मैंने अपनी सेवा के दौरान स्वयं यह देखा है कि जब राजनीतिक संरक्षण की आड़ में अपराधी निर्भय हो जाते हैं, तो सबसे पहले पुलिस का मनोबल गिरता है  और उसके बाद नागरिक के भरोसे का. एक बार जब समाज के भीतर यह धारणा जड़ पकड़ ले कि प्रभावशाली व्यक्ति कानून से ऊपर है, तो उसे उखाड़ना पीढ़ियों का काम बन जाता है. लंबे समय तक उत्तर प्रदेश ठीक इसी चुनौती से जूझता रहा. अपराधियों का राजनीतिक संरक्षण, प्रशासनिक दबाव और कानून के प्रति भय का क्षरण, इन सबने समाज को गहरे अविश्वास में धकेल दिया था. पिछले नौ सालों में उत्तर प्रदेश इसी अविश्वास की छाया से उबरा है.

हत्या की दर का तेलंगाना, पंजाब और झारखंड जैसे राज्यों से कम

फिरौती के लिए अपहरण और डकैती जैसे अपराधों में उत्तर प्रदेश का पूरे देश में सबसे नीचे यानी 36वें स्थान पर होना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. क्योंकि ये अपराध केवल कानूनी उल्लंघन नहीं, बल्कि समाज में भय और अराजकता की संस्कृति पैदा करते हैं. यह महज़ एक पुलिसिया उपलब्धि नहीं है. पुलिस-विज्ञान में एक स्थापित सिद्धांत है कि संगठित अपराध तभी पनपता है जब उसे संरक्षण का पारिस्थितिकी-तंत्र मिले. जब वह तंत्र भंग होता है तो अपराधी को यह स्पष्ट हो जाता है कि न राजनीतिक पैरवी काम आएगी, न प्रशासनिक दबाव. तभी संगठित अपराध की कमर टूटती है. हत्या की दर का तेलंगाना, पंजाब और झारखंड जैसे राज्यों से कम होना इस परिवर्तन की गहराई को रेखांकित करता है.

किंतु इस पूरी रिपोर्ट में जो आंकड़ा मुझे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लगता है, वह है महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में दोषसिद्धि दर. उत्तर प्रदेश 76.6 प्रतिशत की दर के साथ देश में शीर्ष पर है. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के रूप में मैं यह समझाना चाहूंगा कि यह आंकड़ा केवल अदालत की कार्यवाही का परिणाम नहीं होता. दोषसिद्धि की उच्च दर तभी संभव होती है जब पुलिस जांच पुख्ता हो, साक्ष्य-संकलन व्यवस्थित हो, अभियोजन पक्ष सक्षम और प्रतिबद्ध हो, और इन सबके ऊपर, न्यायालय में मामले को ईमानदारी से आगे बढ़ाने का प्रशासनिक संकल्प हो. पश्चिम बंगाल में यह दर 1.6 प्रतिशत, कर्नाटक में 4.8 और केरल में 17 प्रतिशत है. यह केवल सांख्यिकीय अंतर नहीं, यह शासन की प्राथमिकताओं का अंतर है. जिन राज्यों को प्रायः 'प्रगतिशील' कहा जाता है, वहां महिला अपराध में अपराधी के बच निकलने की दर 75 से 98 प्रतिशत तक है. ऐसे तथ्यों की अनिवार्य रूप से उत्तर प्रदेश के आंकड़ों से तुलना की जानी चाहिए. 

इसे पूरे क्रम में जांच प्रक्रिया की भी बात की जानी चाहिए. जांच-प्रक्रिया केवल तेज नहीं, परिणाममूलक भी हुई है. अपने अनुभव में मैंने देखा है कि चार्जशीट दर तब सुधरती है जब पुलिस थाने पर यह दबाव न हो कि मामला दर्ज न हो, बल्कि यह अपेक्षा हो कि मामला दर्ज होने के बाद उसका तार्किक अंजाम निकले. यह मानसिकता का परिवर्तन है और यह ऊपर से नीचे की ओर आता है.

तो यह सीधा संदेश है कि अधिकारियों की जिम्मेदारी निश्चित

जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जीरो टालरेंस पर जोर देते हैं तो यह सीधा संदेश है कि अधिकारियों की जिम्मेदारी निश्चित की जा रही है. किसी भी राज्य के विकास को मानवीय स्वतंत्रताओं के विस्तार से परिभाषित किया जाना चाहिए. निवेश वहीं आता है जहां कानून का भरोसा हो. उद्योग वहीं फलते हैं जहां सामाजिक स्थिरता हो... और प्रतिभा वहीं रुकती है जहां नागरिक जीवन सुरक्षित हो. उत्तर प्रदेश में निवेश का बढ़ता प्रवाह और कानून-व्यवस्था की बेहतर होती स्थिति, ये दोनों प्रवृत्तियां आकस्मिक नहीं, परस्पर संबद्ध हैं.

यहां यह भी कहना आवश्यक है कि चुनौतियां अभी शेष हैं. साइबर अपराध एक नई और जटिल समस्या के रूप में उभर रहे हैं जिसके लिए परंपरागत पुलिसिंग के ढांचे से परे जाकर सोचना होगा और वर्तमान में सोचा जा भी रहा है. सामाजिक तनाव और डिजिटल अफवाहें नए खतरे हैं. किसी भी प्रशासन के लिए संतोष का क्षण वह होता है जब चुनौती समाप्त हो लेकिन व्यावहारिक रूप से यह संभव नहीं. लेकिन दिशा का बदलना भी महत्वूपूर्ण है, खासकर ऐसे राज्य में जो दशकों तक आपराधिक छवि का पर्याय रहा हो. निश्चित रूप से हम आज एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर हैं.

उत्तर प्रदेश की वर्तमान कानून-व्यवस्था केवल आंकड़ों का सुधार नहीं, बल्कि शासन और समाज के बीच भरोसे के पुनर्निर्माण की कहानी है. सफलता का पैमाना यह है कि समाज के भीतर यह भरोसा है कि कानून उसके साथ है. जब पीड़ित को यह आश्वासन हो कि उसकी पीड़ा व्यर्थ नहीं जाएगी, और जब अपराधी यह जान ले कि संरक्षण अब उसकी ढाल नहीं, तो मान लीजिए कि राज्य अपनी संवैधानिक भूमिका को पूर्ण कर रहा है. एनसीआरबी के निष्पक्ष आंकड़े उसकी गवाही देते हैं. एक पुलिस अधिकारी के रूप में मैं जानता हूं कि ऐसी गवाही, राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों से कहीं अधिक विश्वसनीय होती है.

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