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MP में अपनी ही सरकार के लिए इतना बड़ा खतरा क्यों बन गई हैं उमा भारती?

मध्य प्रदेश (MP) की पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी (BJP) की फायर ब्रांड नेता उमा भारती (Uma Bharti) शिवराज सिंह सरकार के लिए सिरदर्द बनती दिख रही हैं. चूंकि इसी साल नवम्बर में वहां विधानसभा चुनाव हैं, लिहाजा उमा के तल्ख़ी भरे बयान जहां बीजेपी सरकार के लिए खतरा बन रहे हैं,तो वहीं कांग्रेस इन्हें लपकते हुए शिवराज सरकार के खिलाफ और भी ज्यादा हमलावर हो गई है. वैसे तो उमा भारती ने शराबबंदी की मांग को लेकर अपनी ही सरकार के खिलाफ अभियान चला रखा है लेकिन अब उन्होंने 17 जनवरी से आर-पार की लड़ाई की चेतावनी दी है.

जाहिर है कि चुनावी साल में ये मुद्दा सरकार के लिए नया बखेड़ा ही खड़ा करेगा, क्योंकि उमा के इस अभियान को महिलाओं का खुलकर समर्थन मिल रहा है. ऐसे में,बीजेपी नेतृत्व को चिंता इस बात की करनी चाहिये कि, उसका सबसे मजबूत माना जाने वाला महिला वोट बैंक अगर उससे छिटक गया,तो दोबारा सत्ता वापसी की उम्मीदों पर पानी फिरने में ज्यादा देर नहीं लगेगी.

हालांकि शराबबंदी के अलावा उमा ने अपने सियासी पिटारे से एक और ऐसा मुद्दा उछाल दिया है,जिसने पार्टी व सरकार की नींद उड़ा दी है. उमा बेशक एक सन्यासी हैं लेकिन वे लोधी जाति से संबंध रखती हैं,जिसका बुंदेलखंड के अलावा यूपी के कुछ इलाकों में भी खासा दबदबा है और इस जाति के वोटर कई सीटों पर सियासी खेल बनाने-बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. हाल ही में उमा भारती ने लोधियों के एक समारोह में साफ कह डाला कि "मैं नहीं कहती कि आप BJP को ही वोट दो क्योंकि वो तो मेरा फोटो दिखाकर ही लोधियों से वोट मांगते हैं लेकिन आप अपनी मर्जी से किसी को भी वोट देने के लिए आज़ाद हैं."

उमा का ये बयान शिवराज सरकार के लिये खतरे की एक बड़ी घंटी समझा जा रहा है क्योंकि 240 सदस्यों वाली एमपी (MP) विधानसभा में करीब 50 सीटें ऐसी हैं,जिस पर लोध मतदाता अपने बूते पर ही किसी उम्मीदवार को हराने या जिताने की ताकत रखते हैं. दरअसल,उमा के इन तेवरों के कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं. बेशक वे मुख्यमंत्री पद की दावेदार न हों लेकिन सबसे मजबूत गढ़ में,  वे अपनी सियासी ताकत के जरिये पार्टी नेतृत्व को ये संदेश दे रही हैं कि सत्ता की हिस्सेदारी में लोध बिरादरी की उपेक्षा को अब वे बर्दाश्त नहीं करने वाली हैं.

इसलिये उमा की इस सीधी चेतावनी का राजनीतिक अर्थ यही निकाला जा रहा है कि वह लोधी समुदाय के लिए सत्ता में बराबर की हिस्सेदारी दिलाने के अहम रही हैं. लोध या लोधी बिरादरी एक ओबीसी (OBC) जाति समूह जो विशेष रूप से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों के बुंदेलखंड क्षेत्रों में काफी राजनीतिक प्रभाव रखता है. शायद इसीलिये उमा भारती ने अपने दिये उस बयान के बाद, उसे उचित ठहराते हुए एक के बाद एक ट्वीट किए. उनमें से एक ट्वीट में उन्होंने लिखा, "इस (शिवराज) मंत्रिमंडल में जाति और क्षेत्र का संतुलन बिगड़ा है. मैंने पहले भी कई बार यह कहा है लेकिन इसे अनसुना कर दिया गया."

दरअसल, बीते दिनों उमा भारती लोधी-लोधा समाज के युवक-युवती परिचय सम्मेलन में शामिल हुईं थीं, जहां उन्होंने अपनी पार्टी की सरकार को खरी-खोटी सुनाते हुए बेहद तीखे तेवर अपनाये थे. उसी भाषण का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है और उसके बाद से ही शिवराज सरकार के हाथ-पैर फूले हुए हैं क्योंकि मुख्य विपक्षी कांग्रेस ने इसे अपने पक्ष में भुनाना शुरु कर दिया है. उमा के उस लंबे भाषण के सिर्फ इस एक अंश को पढ़कर ही आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वे शिवराज सरकार से किस हद तक बिफरी हुई हैं.

उमा ने कहा- मैं अपनी पार्टी के मंच पर आऊंगी और लोगों से वोट भी मांगूंगी लेकिन मैं कभी नहीं कहती कि लोधियों, तुम बीजेपी को वोट करो. मैं तो सबको कहती हूं कि तुम बीजेपी को वोट करो, क्योंकि मैं तो पार्टी की निष्ठावान सिपाही हूं पर, मैं आप से नहीं कहती कि आप पार्टी के निष्ठावान सिपाही रहो. आपको अपने हित देखना है. हम प्यार के बंधन में बंधे हैं, लेकिन राजनीति के बंधन से आप आजाद हैं. उमा ने कहा कि मैं आऊंगी और पार्टी उम्मीदवार के पक्ष में बोलूंगी, वोट भी मांगूंगी. लेकिन, आपको उसी उम्मीदवार को वोट देना है, जिसने आपका सम्मान रखा हो, जिसने आपको उचित स्थान दिया हो."

लेकिन उमा यहीं पर नहीं रुकीं. उन्होंने तो साफ लहजे में कह दिया कि मेरा भाषण सुनने के बाद भी आपको तय करना है कि आपको वोट देना है या नहीं. मैं आपको कई बार इस बंधन से मुक्त कर चुकी हूं कि मेरा फोटो देखकर, भाषण सुनकर वोट नहीं दें. उमा ने कहा कि मैं आपको गिरवी नहीं रख सकती. मेरी सभा के बाद आपको पट्टे में लिख दिया गया है, यह मैं नहीं कर सकती." फिलहाल तो एमपी (MP) की राजनीति ने एक नया मोड़ ले लिया है और शिवराज सरकार के लिए कांग्रेस से भी बड़ा खतरा तो ये भाषण बन गया है. चूंकि सीएम शिवराज और उमा भारती के बीच पिछले काफी अरसे से कोई संवाद नहीं है, इसलिये बड़ा सवाल ये है कि दोनों के बीच सुलह कराने के लिये इस बंद दरवाजे की कुंडी आखिर कौन खोलेगा?

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

ये भी पढ़ें: कांग्रेस के लिए क्या इतना आसान है राहुल गांधी को पीएम पद का उम्मीदवार बनाना?

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