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कांग्रेस के लिए क्या इतना आसान है राहुल गांधी को पीएम पद का उम्मीदवार बनाना?

देश से नफ़रत और डर का माहौल ख़त्म करने और महंगाई व बेरोजगारी से नाता तोड़ने के लिए भारत जोड़ो यात्रा पर निकले राहुल गांधी का असली सियासी मकसद क्या है, ये अब देश के सामने आ गया है. कांग्रेस के दो बड़े नेताओं ने उन्हें आगामी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करते हुए विपक्ष से एकजुट होने की अपील की है. कमलनाथ और भूपेश बघेल की कही बातों पर एक तरह की मुहर लगाते हुए राहुल गांधी ने भी ममता बनर्जी और अखिलेश यादव जैसे क्षत्रपों को सलाह दे डाली है कि बीजेपी को हराने के लिए उन्हें एक मंच पर आना ही होगा.

लेकिन सवाल उठता है कि क्या ये इतना ही आसान है और ये भी कि सिर्फ इस एक नाम पर समूचा विपक्ष क्या एकजुट हो सकता है? ये सवाल इसलिये कि अगर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को छोड़ भी दें, तब भी तीन राज्यों के मुख्यमंत्री ऐसे हैं जिनके भीतर पीएम पद का उम्मीदवार बनने की दावेदारी की हिलोरें अब भी मार रही हैं. उन तीनों ने ही राहुल की इस यात्रा को लेकर अभी तक ऐसा कोई बयान नहीं दिया है जिससे लगे कि वो इसका खुलकर समर्थन कर रहे हैं.

इसलिए नया साल शुरू होते ही कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती तो ये होगी कि वह इनकी महत्वाकांक्षा की अग्नि को बुझाने के लिए सियासत रूपी किस पानी का इस्तेमाल करेगी. सियासी इतिहास गवाह है कि बंटा हुआ विपक्ष कभी इतनी ताकत नहीं रखता कि वो किसी सरकार को गिरा दे. बेशक कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है और फिलहाल मुख्य विपक्षी दल भी है लेकिन सच ये भी है कि वो इस वक़्त ऐसी हैसियत में नहीं है कि तमाम क्षेत्रीय विपक्षी पार्टियों को मना सके कि अगले पीएम पद का उम्मीदवार कांग्रेस से ही होगा. राहुल की यात्रा खत्म होने के बाद तस्वीर क्या बनती है, इसका सारा दारोमदार इस पर निर्भर करेगा कि बाकी विपक्षी नेताओं को अपने विश्वस्त सूत्रों से इसका क्या इनपुट मिलता है.

यानी, उनकी पहली कोशिश तो ये जानने की ही होगी कि 3500 किलोमीटर लंबी इस यात्रा के जरिये राहुल गांधी आखिर मोदी सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाने में किस हद तक कामयाब हुए हैं और इसका सबसे ज्यादा असर किन राज्यों में देखने को मिला है. तीन राज्यों के मुख्यमंत्री की ही ये रिपोर्ट लेने में सबसे ज्यादा दिलचस्पी होगी और वे हैं- पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और दिल्ली. समझ सकते हैं कि ममता बनर्जी, के.चंद्रशेखर राव और अरविंद केजरीवाल ही अगले पीएम पद का उम्मीदवार बनने की रेस में है.

हालांकि पहले इस लिस्ट में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भी नाम था लेकिन साल खत्म होने के आखिरी दिन उन्होंने अपने हथियार डालते हुए ये साफ कर दिया है कि वे अब इस दौड़ में शामिल नहीं हैं. दरअसल, केसीआर ने कुछ महीने पहले पटना में नीतीश से मुलाकात करके तीसरा मोर्चा बनाने की संभावना को तलाशने की जिम्मेदारी सौंपी थी. नीतीश ने अपनी तरफ पूरी कवायद भी की थी लेकिन उन्हें जल्द ही ये समझ आ गया कि मौजूदा सूरते-हाल में दूर-दूर तक ऐसी कोई संभावना बनती नहीं दिख रही है. रही-सही कसर कुछ दिनों बाद ही कांग्रेस के इस ऐलान ने पूरी कर दी कि वह भारत जोड़ो यात्रा निकाल रही है. सियासत के हर घाट के पानी का स्वाद चख चुके नीतीश इतने नौसिखिया तो हैं नहीं कि ये भी न समझ पायें कि पीएम पद की उम्मीदवारी की दौड़ में अब वे काफी पिछड़ चुके हैं. इसलिये उन्होंने सही वक्त पर अपना फैसला लेते हुए उसे सार्वजनिक करने में भी ज्यादा देर नहीं लगाई.

दरअसल, शनिवार को जब उनसे पत्रकारों ने पूछा कि क्या आप 2024 में प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी की उम्मीदवारी को समर्थन देंगे? तो उन्होंने साफ कहा कि हमें कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन साथ ही उन्होंने ये कहते हुए कांग्रेस को संदेश भी दे दिया कि "पहले एक साथ बैठकर बात तो करें. अलग-अलग नाम के बारे में अलग पूछिएगा तो कितना जवाब देंगे. हम दावेदार नहीं हैं, बस. हम तो इतना ही चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा पार्टी मिलकर सरकार बनाए. सभी पार्टी मिलकर बैठेंगी तो सब चीजें तय होंगी. ज्यादा से ज्यादा पार्टियों को मिलाने से एक संतुलित सरकार बनेगी. उसमें सब अच्छा होगा. उसमें राहुल गांधी हों या कोई भी बने, मुझे दिक्कत नहीं. मैं बस अपनी बात कह सकता हूं कि मैं दावेदार नहीं हूं."

हालांकि नीतीश का ये बयान महत्वपूर्ण है और कांग्रेस को राहत देने वाला इसलिये भी है कि एक बड़े दल ने राहुल के नाम पर मुहर लगा दी है, जो पांच महीने पहले तक बीजेपी के साथ सरकार साझा कर रहा था. लेकिन नीतीश के सामने अब बड़ा पेंच ये आयेगा कि वे इसके लिए आरजेडी नेता और सूबे के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को आखिर कैसे मनाएंगे. वह इसलिये कि बीते दिनों ही तेजस्वी ने राहुल गांधी के नेतृत्व को मानने पर सवाल खड़ा कर दिया था.

अगर देश के सबसे बड़े सूबे यूपी की बात करें तो वहां मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी है जिसके जनाधार का समर्थन हासिल किये बगैर कांग्रेस की नैया पार होना लगभग नामुमकिन है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव से भी हाल ही में राहुल के नेतृत्व पर सवाल पूछा गया था, तो उन्होंने साफ इंकार करने की बजाय गोलमोल जवाब देते हुए कहा था कि हमारी विचारधारा कांग्रेस से अलग है, ये 2024 में ही देखेंगे कि क्या तस्वीर बनती है.

उसके बाद बंगाल की शेरनी यानी ममता बनर्जी को मनाना भी कांग्रेस के लिये पत्थर से पानी निकालने जैसा होगा क्योंकि कांग्रेस से उनकी जो भयानक खुंदक है, उसे ख़त्म करने के लिए पार्टी के पास न तो अब प्रणव मुखर्जी हैं और न ही अहमद पटेल जैसे नेता. लिहाजा, तृणमूल को साधे बगैर कांग्रेस जो चाहती है, वो पूरा नहीं हो सकता. तेलंगाना से गुजरी राहुल की भारत जोड़ो यात्रा को मिले अपार जन समर्थन के बाद हो सकता है कि केसीआर मान भी जाएं और कांग्रेस के नाम पर मुहर लगाने को तैयार हो जायें.

लेकिन असली पंगा डालेंगे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल क्योंकि अब उनके पास पंजाब भी है. दिल्ली में कांग्रेस किस बुरी हालत में है, ये बताने की जरुरत नहीं. वैसे भी उनका सियासी चरित्र बताता है कि वे बिल्कुल ऐन वक्त पर ही अपने पत्ते खोलते हैं. हो सकता है कि जब राहुल के नाम पर सहमति बनने की उम्मीद दिख रही हो, ठीक उसी समय वे किसी देशव्यापी सर्वे के नतीजे का ऐलान करते हुए ये बताएं कि देश के इतने प्रतिशत लोग केजरीवाल को ही अगले पीएम पद का उम्मीदवार बनता हुआ देखना चाहते हैं, जो राहुल के मुकाबले बहुत ज्यादा है. तब कांग्रेस क्या करेगी?

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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