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चुनावी दंगल में क्यों लग रहें हैं मोदी-मोदी के नारे?

जैसे फिल्मी डॉयलॉग है कि डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. उसी तरह मोदी की चुनावी रणनीति को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. मोदी को गुजरात दंगे के मुद्दे पर घेरने की कोशिश की गई तो विकास के मुद्दे पर कूद गये. जब विकास पर गुजरात मॉडल पर सवाल किये गये तो वो सबका साथ, सबका विकास का नारा देकर देश के प्रधानमंत्री बन गये. सबका साथ, सबका विकास के नारे को पंक्चर करने की कोशिश की गई तो कालेधन, भ्रष्ट्रचार के मुद्दे पर नकेल कसने के लिए नोटबंदी का बड़ा दांव खेल दिया. दरअसल मोदी की रणनीति होती है कि जब विपक्षी पार्टियां उन्हें पुराने मुद्दे पर घेरने की कोशिश करती है तो वो एक बड़ी नई लकीर खींच देते हैं. पार्टियां उन्हें पुराने मुद्दे पर घेरने की कोशिश करती है तो वो नये मुद्दे के जरिए वोटरों में अपनी पहचान बना लेते हैं. दिल्ली के बाद बिहार में हार और आगे लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए नरेन्द्र मोदी ने एक बड़ा दांव खेला है, ऐसा दांव खेलने की हिम्मत शायद किसी में नहीं हुई. अगर हुई भी तो गलत चाल चली गई जिसमें खुद नेता ही फंसकर हार गए. वैसे मोदी भी फंस सकते थे लेकिन बड़ी चतुराई और बड़ी रणनीति की वजह से नहीं फंस सके. जहां विपक्षी पार्टियों ने नोटबंदी के मुद्दे पर मोदी को घेरने की कोशिश की वहीं मोदी इसी नोटबंदी को हथियार बनाकर चुनावी फतह करते जा रहें हैं. ऐसा प्रतीत हो रहा है शायद उत्तर प्रदेश के चुनाव को ध्यान में रखते हुए ही नोटबंदी लागू किया गया चूंकि मोदी को मालूम था कि अगर बीजेपी उत्तर प्रदेश में हारी तो शायद ही 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी जीत पाएगी. चुनाव जीतने के लिए साम, दंड, भेद की नीति अपनाने में भी मोदी को परहेज नहीं है. यूपी में क्या नोटबंदी से मोदी को फायदा होगा?   नोटबंदी पर ना जाने कैसे-कैसे मोदी को घेरने की कोशिश हुई, विकास दर धरातल में जाने की बात हुई लेकिन न तो जीडीपी पर कोई खास असर हुआ और लगता है कि नोटबंदी मोदी के लिए वरदान साबित हो रहा है. नोटबंदी के दौरान और नोटबंदी के बाद जितने भी चुनाव हुए हैं वहां पर मोदी को फायदा ही हुआ खासकर उन राज्यों में जहां पर बीजेपी की वजूद है. हाल में मुंबई के बीएमएसी चुनाव में बीजेपी की शक्ति तीन गुणी बढ़ गई है वहीं महाराष्ट्र के 10 में से 8 म्युनिसिपल चुनाव में पार्टी जीती. गुजरात की स्थानीय चुनाव जीती. गुजरात से असम और हरियाणा से उड़ीसा के स्थानीय चुनाव में बीजेपी की शानदार जीत हुई वहीं लोकसभा और विधान सभा के उपचुनाव में पार्टी की जीत हुई. अब सवाल ये उठता कि अगर नोटबंदी का असर दूसरे राज्य में हो सकता है तो क्या नोटबंदी से उत्तर प्रदेश अछूता रह सकता है जहां पर पार्टी लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर चुकी है. ऐसा लग रहा है कि अगर बीजेपी की वास्तविक शक्ति 26 फीसदी वोट पाने की है तो नोटबंदी की वजह से बीजेपी के वोट 30 से 31 फीसदी तक पहुंच सकते हैं. नोटबंदी की वजह से गरीबों में खास उत्साह है कि मोदी ने अच्छा काम किया. उनकी जिंदगी बदल जाएगी और गरीब-अमीर में फासला बढ़ जाएगा. उन्हें ये भी अहसाह है कि नोटबंदी की वजह से सरकार के खजाने भर जाएंगे और उस पैसे का खर्च गरीबों की जिंदगी बदलने में की जाएगी. नोटबंदी ही इकलौता मुद्दा नहीं है बल्कि नरेन्द्र मोदी ने उत्तरप्रदेश चुनाव को प्रतिष्ठा का सवाल बना दिया है चूंकि ये चुनाव हारे तो उनकी साख पर सवाल खड़ा हो जाएगा इसीलिए वाराणसी में तीन दिन रहकर 30 घंटे से ज्यादा समय चुनाव प्रचार में लगा दिये. इस बार पार्टी बिहार जैसी गलती नहीं कर रही है. स्थानीय मुद्दे और स्थानीय नेता को तरजीह दी जा रही है वहीं ऐसे मुद्दे को उछाला जा रहा है जिसका कहीं न कहीं अखिलेश सरकार से सरोकार है. अखिलेश सरकार को किस मुद्दे पर घेरा जाए उस पर ठोक बजाकर रिसर्च किया जा रहा है और जिस मुद्दे पर किसी की नजर नहीं जा रही है उन मुद्दों पर मोदी की पैनी नजर है. वो उठाने से बाज भी नहीं आते हैं. अखिलेश सरकार का काम अच्छा है, नाम भी अच्छा है और गठबंधन भी इसीलिए किया गया कि उनकी पार्टी की जीत हो जाए. लेकिन सिर्फ काम से भारत में चुनाव नहीं जीते जा सकते हैं मसलन दिल्ली में शीला दीक्षित, हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा और महाराष्ट्र में पृथ्वीराज चव्हाण अच्छे काम के बावजूद भी हार गये. अखिलेश ने जहां टिकट बंटवारे में यादव, मुस्लिम और ठाकुर को तरजीह देने की कोशिश की वहीं मायावती ने मुस्लिम, दलित और ब्राह्मण पर जोर दिया वहीं बीजेपी ने अगड़ी जाति और यादवों को छोड़कर पिछड़ी जाति और अति पिछड़ी जाति पर थोक के भाव से टिकट देने का काम किया. जैसे मुस्लिम वोटर बीजेपी को वोट नहीं दे सकते हैं उसी तरह यादव मायवती और दलित अखिलेश को वोट नहीं दे सकते हैं. up-1 ऐसा लग रहा है कि दलित और यादव वोटर भी दूसरे विकल्प के तौर पर बीजेपी को अपना सकते हैं. कहा जाता है कि मायावती दलित की नेता हैं तो अखिलेश यादव मुस्लिम के नेता हैं ऐसी स्थिति में अति पिछड़ा वर्ग और यादव छोड़कर पिछड़ा वर्ग बीजेपी के साथ सहज महसूस कर रहें हैं क्योंकि इनके छोटे मोटे नेता की पहचान और झलक बीजेपी में दिख रही है. अगर वाकई जमीन स्तर पर भी यही समीकरण काम कर रहा है तो इस चुनाव के नतीजे भी मोदी के समर्थन में जा सकते हैं.

  • धर्मेन्द्र कुमार सिंह, चुनाव विश्लेषक और ब्रांड मोदी का तिलिस्म के लेखक हैं. इनसे ट्विटर पर जुड़ने के लिए @dharmendra135 पर क्लिक करें. फेसबुक पर जुड़ने के लिए इसपर क्लिक करें. https://www.facebook.com/dharmendra.singh.98434
(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आकड़ें लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)
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