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पाकिस्तान फंस चुका है अपने ही बुने जाल में, बलूचिस्तान का विस्फोट बताता है सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की बेहद खराब हालत

पाकिस्तान में 29 सितंबर को यानी शुक्रवार को बलूचिस्तान प्रांत में एक मस्जिद के पास हुए विस्फोट में पांच दर्जन लोगों की की मौत हो गई और 100 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं. ये आत्मघाती हमला तब हुआ, जब पैगंबर मुहम्मद साहब के जन्मदिन का जश्न पूरा पाकिस्तान मना रहा था. इस मौके पर लोग ईद-मिलाद-उन नबी मनाने जा रहे थे. यह पहली बार नहीं है कि पाकिस्तान में विस्फोट में मासूमों की जान गई हो, लेकिन एक इस्लामिक देश में पैगंबर के जन्मदिन पर यह विस्फोट बताता है कि वह किस कदर विफल राष्ट्र हो चुका है. इसके साथ ही एक बार फिर पाकिस्तान में जेहादी-आतंकी गठजोड़ कितना खूंखार हो चुका है, यह स्पष्ट हो गया है. 

पाकिस्तान हो चुका है फेल्ड स्टेट

अस्थिरता में पाकिस्तान अव्वल नंबर पर आ चुका है. कई पश्चिमी देशों ने यह कहा भी है कि पाकिस्तान को एक ‘फेल्ड स्टेट’ घोषित कर देना चाहिए. अभी पाकिस्तान के बलूचिस्तान में जिस तरह मस्तुंग जिले में 29 सितंबर को मस्जिद के पास बम विस्फोट हुआ और 58 लोगों की मौत हुई, 100 से अधिक घायल हुए, वह बहुत कुछ कहता है. कुछ घटना खैबर-पख्तूनख्वा में भी हुई है. जहां तक बलूचिस्तान के बारे में, वहां चल रहे मूवमेंट की बात करें तो यह पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, सबसे अधिक प्राकृतिक संसाधन यहां हैं, लेकिन यहीं की पाकिस्तान सबसे अधिक अनदेखी करता है. यहां पर पाकिस्तानी सरकार के ध्यान नहीं देने की वजह से यह सबसे पिछड़ा प्रांत है. वहां अलग बलूच प्रांत की मांग भी चल रही है. वहां बलूच नेशनलिस्ट आर्मी भी सक्रिय है. इसके अलावा कई संगठन हैं, लेकिन अभी तक किसी ने भी इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है.

कई आतंकी संगठन हैं सक्रिय

विस्फोट के कई कारण हैं. वहां पर इस्लामिक स्टेट इन खुरासान, इस्लामिक स्टेट इन पाकिस्तान और तहरीक-ए-तालिबान, ये तीन आतंकी संगठन तो वहां खुलकर सक्रिय हैं, जो जेहाद कर रहे हैं. हालांकि, हम अगर मॉडस ऑपरेंडी देखें और सक्रियता की जगह तो तहरीक-ए-तालिबान अफगान बॉर्डर पर और आइएसके पेशावर में सक्रिय है. यहां पर एक नया ग्रुप इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड लेवंड (आइएसआइएल) का भी हाथ हो सकता है. अभी पाकिस्तान में जिस तरह का आर्थिक संकट चल रहा है, वहां जिस तरह की क्राइसिस है और जिस तरह वहां सुरक्षा नहीं है, उसमें तो पाकिस्तान एक फेल्ड स्टेट है ही, भले ही उसकी घोषणा अभी नहीं हुई है. जिस तरह पाकिस्तान ने टेरर का इस्तेमाल भारत के खिलाफ लगातार किया है, वही अब उसके घर में पनप रहा है, बूमरैंग कर गया है. पाकिस्तान ने जो बोया था, उसी की फसल काट रहा है. यह विस्फोट साफ-साफ दिखाता है कि आंतरिक सुरक्षा को किस तरह वही लोग नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिसे पाकिस्तान ने कभी पाला-पोसा था.

चीन का भी है एक कारक

एक इस्लामिक देश में पैगंबर के जन्मदिन पर इस तरह का विस्फोट होना बहुत बड़ी बात है. वैसे, चीन के बीआऱआई प्रोजेक्ट के तहत जो चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरोडिर (सीपेक) बन रहा है, जिसमें चीन ने 65 अरब डॉलर अब तक खर्च किए हैं और उसको उसका ठीकठाक रिटर्न भी नहीं मिल रहा है, लेकिन यह जहां से गुजर रहा है, उसमें चीनी लोग स्थानीय लोगों को संलग्न नहीं कर रहे हैं. इससे स्थानीय लोगों में काफी गुस्सा है. वे अपने आप को छला हुआ महसूस कर रहे हैं. इसलिए, आप देखेंगे कि जहां कहीं भी विस्फोट हुए हैं, उसमें पाकिस्तानी आर्मी को भी निशाना बनाया गया है. सीपेक परियोजना में चूंकि चीन के ही लोग हैं, उसके ही इंजीनियर हैं, सारा कुछ वहीं का है, इसलिए ये बहुत बड़ा कारण है, स्थानीय लोगों के विद्रोह का. वही लोग अब चीनी प्रतिष्ठानों पर भी हमला कर रहे हैं, पाकिस्तान की सेना पर भी.

भारत के लिए सावधानी बरतनी जरूरी

सुरक्षा के दृष्टिकोण से भारत को तो सावधान रहना हर पल जरूरी है. ये जिहादी ग्रुप अपना नाम भले बदल लेते हैं, लेकिन इनका नेटवर्क बहुत तगड़ा होता है. ये लोग पूरी तरह भारत के खिलाफ भी काम पर लगे हैं. अभी कश्मीर में जो हमला हुआ था, वो भी इन लोगों की ही देन थी. अब वहां जो मदरसा हैं, वहीं ये टेरर की ट्रेनिंग देते हैं और भारत में उनको भेजते हैं तो हमें लगातार सावधान रहने और सुरक्षा पर ध्यान देने की जरूरत है. अमेरिका के अफगानिस्तान से निकलने का मतलब यह नहीं है कि उसका इंटरेस्ट पूरी तरह इस इलाके में खत्म हो गया है. अमेरिका की विदेश नीति सब्जेक्ट एंड ऑब्जेक्ट के मामले पर निर्भर है. यानी, उसकी जहां रुचि होती है, वहीं वह हस्तक्षेप करता है. अभी चूंकि उसका इंटरेस्ट कहीं और है, इसलिए वह उसकी प्राथमिकता में नहीं है. चीन और पाकिस्तान का जो नेक्सस हुआ है, सीपेक के माध्यम से, इसलिए अमेरिका ने थोड़ा कम ध्यान देना शुरू किया है. अभी उसको लग रहा है कि फिलहाल पाकिस्तान में उतना ध्यान देने की जरूरत नहीं है, तो इसलिए वह नहीं दे रहा है.

पाकिस्तान की हालत अभी आर्थिक तौर पर बहुत खराब है. अभी चीन और सऊदी अरब से पाकिस्तान ने 11 अरब डॉलर की माँग की है. कार्यवाहक प्रधानमंत्री अनवारुल हक चाहते हैं कि पाकिस्तान में जो चुनाव जनवरी में होने हैं, उससे पहले वहां की आर्थिक स्थिति थोड़ी ठीक हो जाए. आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए भी अमेरिका का समर्थन जरूरी है, इसलिए वे आर्थिक पुनर्गठन की बात कर रहे हैं, अमेरिका की रजामंदी के बिना उनको लोन भी नहीं मिलेगा. अमेरिका की भूमिका इस क्षेत्र में बनी रहेगी, लेकिन इस समय थोड़ा सा लो-प्रायरिटी रीजन है. भारत को सावधानी बरतनी होगी.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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