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BLOG: मतदाताओं के जोश या खामोशी से किसकी हार, किसकी जीत?

देश में अनगिनत चुनाव हुए लेकिन कोई स्थापित नियम नहीं बन पाया कि कम और ज्यादा मतदान से सरकार की दोबारा वापसी होगी या विपक्ष का परचम लहराएगा.

राजनीति में जो दिखता है वो होता नहीं है जो होता है वो दिखता नहीं है. इसी तरह चुनाव में ज्यादा या कम मतदान होना भी अनसुलझी पहेली है. इस अनसुलझी पहेली को जो समझाने की कोशिश करते हैं वो खुद उलझ जाते हैं. लोकसभा के तीन चरण के मतदान हो चुके हैं. पहले चरण में हुए मतदान के साथ ही चुनावी पंडित माथापच्ची करने में लगे हुए हैं कम मतदान के क्या मायने और ज्यादा मतदान की क्या पहली है. कम मतदान हुए तो मोदी की लहर नहीं है, अगर ज्यादा मतदान होते तो फिर मोदी की लहर चल रही होती है. अमूमन कहा जाता है कि ज्यादा मतदान होने पर सरकार के लिए खतरे की घंटी है और कम मतदान होने पर सरकार के खिलाफ गुस्सा नहीं हैं लेकिन सौ बात की एक बात ये है कि ना तो ऐसा कोई नियम है और ना ही ऐसा को मापदंड है कि जिसे ताल ठोककर कहा जा सकता है कि ज्यादा और कम मतदान के क्या मायने हैं.

देश में अनगिनत चुनाव हुए लेकिन कोई स्थापित नियम नहीं बन पाया कि कम और ज्यादा मतदान से सरकार की दोबारा वापसी होगी या विपक्ष का परचम लहराएगा. मतदान की माया समझने से पहले ये देख लेते हैं कि पहले चरण में देश में 69.45 फीसदी मतदान हुए जो कि पिछले चुनाव से दशमलव 68 फीसदी ज्यादा है वहीं दूसरे चरण में देश में 69.43 फीसदी मतदान हुए जोकि पिछले चुनाव से मामूली बढ़त है, जबकि तीसरे चरण में 66.06 फीसदी मतदान हुए तो फिर हंगामा क्यों बरपा है कि कम वोटिंग हुई है.

उत्तर प्रदेश

यूपी के पहले चरण में 8 सीटों पर पिछले चुनाव की तुलना में 2.41 फीसदी कम हुए जबकि दूसरे चरण में 8 सीटों पर दशमलव 52 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, तीसरे चरण में 61.41 फीसदी मतदान हुए वहीं 4 चरण के मतदान बाकी हैं. वैसे अंतिम चरण के चुनाव के बाद भी तस्वीर साफ होगी कि इस बार के चुनाव में मतदान कम हुए या ज्यादा. एक बात गौर करने की है 2014 लोकसभा चुनाव में अभूतपूर्व मतदान हुए थे, ऐसा चुनावी इतिहास में कभी नहीं हुआ था. मतदान में 8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और ये आंकड़ा 58 फीसदी से बढ़कर 66 फीसदी पहुंच गया था. 2014 के चुनाव को देखें तो फॉर्मूला फिट बैठता है ज्यादा वोटिंग की वजह से मनमोहन सिंह की सरकार चली गई. ये ऐसा इसीलिए हुआ कि मनमोहन सिंह की नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के खिलाफ जबर्दस्त गुस्सा था. एक तरफ सरकार भ्रष्ट्राचार के आरोपों में घिरी थी जबकि दूसरी तरफ पॉलिसी पैरालाइसिस से ग्रसित सरकार थी. तीसरी तरफ अन्ना का आंदोलन था वहीं चौथी तरफ बीजेपी के पास प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर नरेन्द्र मोदी का चेहरा था.

अब इससे मान लें कि ज्यादा मतदान होना सरकार के लिए खतरे की घंटी है तो भारी भूल होगी. चुनाव अंकगणित हीं नहीं बल्कि केमिस्ट्री भी है. केमिस्ट्री समझे बिना नंबर के जंजाल में फंसने का खतरा है. यही फॉर्मूला मान लें तो 1984 के लोकसभा में कांग्रेस की हार होनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ज्यादा मतदान होने के बावजूद कांग्रेस दोबारा सत्ता में आई और पहली बार पार्टी जीत के इतिहास में नया मुकाम हासिल किया. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए लोकसभा चुनाव में करीब 7 फीसदी ज्यादा मतदान हुए. पहली बार कांग्रेस सबसे ज्यादा 415 सीटें जीतने में कामयाब रही. अब आंख मूंद करके अंकगणित की भाषा समझें तो केमिस्ट्री का स्वाद चखने में वंचित रह सकते हैं.

इंदिरा गांधी की हत्या के खिलाफ लोगों में कांग्रेस के प्रति जबर्दस्त सहानुभूति थी. अब इससे अलग फॉर्मूले की बात करते हैं. कम मतदान होना मतलब सरकार के प्रति गुस्सा नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि मतदान काफी गिर जाए और सरकार की चांदी हो जाए. 1971 के लोकसभा चुनाव में 1967 के मुकाबले 6 फीसदी कम मतदान हुए थे लेकिन कांग्रेस की सीटें 283 से 352 हो गई थी. एक तरफ कांग्रेस में खटपट चल रही थी तो दूसरी तरफ भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुए थे जिसमें पाकिस्तान से टूट कर बांग्लादेश बना था. उस समय इंदिरा गांधी मजबूत और निर्णायक नेता उभऱी थी लेकिन अगले लोकसभा चुनाव में मतदान में 5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और 1977 में इंदिरा गांधी हार गईं और जनता पार्टी की शानदार जीत हुई. 1977 चुनाव में इंदिरा गांधी के तानाशाही रवैये और आपातकाल अहम मुद्दे थे. जनता पार्टी में अंदरुनी विवाद और उठापठक की वजह से सरकार गिर गई. 1980 में चुनाव हुए, इंदिरा गांधी दोबारा आईं लेकिन पिछले चुनाव के मुकाबले 4 फीसदी मतदान गिर गये. यहां ये भी फॉर्मूला फेल हो जाता है कि कम मतदान होने से सरकार के प्रति गुस्सा कम है.

1989 में बोफोर्स तोप घोटाला अहम मुद्दा था जिसपर कांग्रेस के खिलाफ विपक्षी पार्टियों की लामबंदी थी इसके बावजूद भी 1984 के मुकाबले 1989 में डेढ़ फीसदी वोटिंग कम हुई लेकिन बोफोर्स के मुद्दे पर वीपी सिंह के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी, मतलब कम वोटिंग होने पर भी सरकार के प्रति गुस्सा होता है.1989 से लेकर 2014 तक मतदान मामूली उतार चढ़ाव होते रहे लेकिन किसी भी पार्टी को अपने बलबूते पर बहुमत नहीं मिला. गौर करने की बात ये है कि 1998 में पिछले चुनाव के मुकाबले 4 फीसदी ज्यादा मतदान हुआ और वाजपेयी की सरकार आई वही अगले साल हुए चुनाव में 2 फीसदी कम मतदान हुए लेकिन फिर भी वाजपेयी की सरकार बनी रही है लेकिन सीटें उतनी ही मिली जितनी 1998 में 182 थी.

2004 के लोकसभा चुनाव में करीब डेढ़ फीसदी कम मतदान हुए, अटल बिहारी की सरकार की विदाई हो गयी और मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार को मौका मिला. 2009 मे मामूली गिरावट दशमलव 6 फीसदी हुई लेकिन कांग्रेस की सीटें पिछले चुनाव की तुलना में 60 बढ़ गई.

विधानसभा चुनावों के वोटिंग प्रतिशत के आकड़ें

लोकसभा की ही बात नहीं बल्कि विधानसभा चुनाव की भी बात करते हैं. 1995 से लेकर अभी तक गुजरात में बीजेपी की सरकार है. 1995 के मुकाबले 1998 में वोटिंग में 5 फीसदी की गिरावट हुई फिर भी बीजेपी की सरकार, गुजरात दंगे के बाद भी 2002 में मतदान में 2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, फिर भी बीजेपी सरकार और तो और बीजेपी अपनी जीत के इतिहास में 127 सीटें जीतकर रिकॉर्ड बनाया. 2007 में 2 फीसदी की गिरावट फिर भी बीजेपी की चौथी बार सरकार बनी, अब गौर करने की बात ये है कि 2012 में मतदान में 11 फीसदी की बढ़ोतरी फिर भी बीजेपी सरकार और 2017 में 3 फीसदी की गिरावट फिर बीजेपी सरकार. इससे बेहतर समझा जा सकता है कि मतदान बढ़ने और गिरने से सरकार आने और जाने का पुख्ता सबूत नहीं है.

बिहार और यूपी के विधानसभा चुनाव के आकड़ें

गुजरात नहीं बिहार और यूपी के विधानसभा चुनाव के मतदान पर एक निगाह डालते हैं. बिहार में 2000 के मुकाबले 2005 फरवरी के चुनाव में 16 फीसदी मतदान कम हुए और पहली बार लालू यादव-राबड़ी देवी के 15 साल के शासन का खात्मा हो गया. इतने मतदान कम होने पर चौथी बार आरजेड़ी की सरकार बननी चाहिए थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. 2010 के विधानसभा चुनाव में 7 फीसद ज्यादा मतदान हुआ लेकिन फिर भी नीतीश कुमार के नेतृत्व में जेडीयू और बीजेपी की सरकार आईं और 2015 के विधानसभा में 4 फीसदी मतदान ज्यादा हुए लेकिन फिऱ नीतीश के नेतृत्व में जेडीयू और आरजेड़ी की सरकार बनी.

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में आकड़ें

एक झलक उत्तर प्रदेश के विधानसभा का भी देख लेत हैं. 2007 के विधानसभा चुनाव में पिछले चुनाव के मुकाबले 8 फीसद कम मतदान हुए लेकिन बीजेपी बेदखल हो गई और मायावती की जीत हुई थी. अगले ही चुनाव यानि 2012 में 13 फीसदी ज्यादा मतदान हुए, मायावती की जगह अखिलेश यादव की ताजपोशी हुई वहीं 2017 के चुनाव में करीब ड़ेढ़ फीसदी ज्यादा मतदान हुआ कि बीजेपी की शानदार-जानदार जीत हुई. इसका मतलब साफ है कि ज्यादा मतदान और कम मतदान होने से किसकी जीत होगी और किसकी हार होगी कहना मुश्किल है.

ज्यादा मतदान होने से एक बात साफ है कि वोटर में एक उत्साह होता है, उत्साह एक निराशा और आशा से भी पैदा हो सकता है. गुजरात में पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले 2012 में मतदान में प्वाइंट 12 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी लेकिन जीती थी बीजेपी, वजह ये हो सकती है कि गुजरात के लोग नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर देखना शुरू कर दिया था. उत्तर प्रदेश में 2012 में प्वाइंट 13 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी, समाजवादी पार्टी को स्प्ष्ट बहुमत मिला था लेकिन युवा चेहरा अखिलेश यादव के चुनाव मैदान में उतरने से वोटर में एक तरह का उत्साह बढ़ गया था. बिहार में 2005 में 15 फीसद मतदान गिरने के बाद भी लालू यादव की सलतनत खत्म हो गई थी.जनता में उत्साह नहीं था, ये मानकर बिहार के वोटर चल रहे थे कि लालू के जंगलराज का खात्मा कभी नहीं होगा. लोकसभा 2014 में इसीलिए प्वाइंट 8 फीसदी मतदान ज्यादा हुए थे, लोगों को हसीन सपने दिखाये गये थे और दूसरी तरफ यूपीए सरकार के खिलाफ जबर्दस्त नाराजगी थी वहीं 1984 में इसीलिए ज्यादा मतदान हुए कि क्योंकि इंदिरा की हत्या हुई और लोग में सहानूभूति पैदा हो गई थी. मतलब साफ है कि वोट गिरने के पीछे नंबर से ज्यादा अहमियत केमिस्ट्री होती है. फिलहाल केमिस्ट्री यही है कि नरेन्द्र मोदी सरकार के समर्थन में ना तो उत्साह है ना ही नाराजगी है लेकिन अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए सारे चरण के मतदान में कितना उतार-चढ़ाव हुआ है वो भी देखना बेहद जरूरी है, मतलब इस लोकसभा चुनाव में ऊंट किस करवट बदलेगा कहना मुश्किल है.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)
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