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Opinion: होर्मुज से उठता धुआं, अरब दुनिया की बेचैनी और आने वाले दिनों का खतरा

ईरान–अमेरिका जंग अब सिर्फ़ दो मुल्कों की लड़ाई नहीं रह गई है. इसका असर पूरे खाड़ी इलाक़े पर साफ़ दिखाई देने लगा है. होर्मुज़ की खाड़ी, जिसे दुनिया की सबसे अहम समुद्री रास्तों में गिना जाता है, अब एक बार फिर तनाव का सबसे बड़ा केंद्र  बन चुका  है. अमेरिका ने ईरान के कई इलाक़ों पर नए हमले किए हैं जबकि ईरान ने जवाबी कार्रवाई में खाड़ी के आसपास अपनी सैन्य मौजूदगी का एहसास कराते हुए हमलों को तेज़ कर दिया. दोनों तरफ़ से यह कहा जा रहा है कि उनके हमले सिर्फ़ सैन्य ठिकानों पर हैं, लेकिन हक़ीक़त यह है कि सबसे ज़्यादा कीमत आम लोग, समुद्री कारोबार और पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था चुका रही है.

होर्मुज में जहाजों की आवाजाही रुकी

सबसे ज़्यादा चिंता की बात यह है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही लगभग रुक सी गई है. कुछ ही दिन पहले जहां रोज़ाना दर्जनों तेल और गैस के जहाज़ गुज़रते थे, अब उनकी तादाद बहुत कम रह गई है. दुनिया के लगभग 20 फ़ीसदी तेल और गैस की सप्लाई इसी रास्ते से होकर गुजरती है. अगर यह रास्ता लंबे समय तक प्रभावित रहता है तो इसका असर सिर्फ़ अरब देशों पर नहीं बल्कि भारत, चीन, जापान, यूरोप और पूरी दुनिया पर पड़ेगा. पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में बढ़ोतरी का सिलसिला फिर से शुरू हो चुका है.

यूएई के दो तेल टैंकरों पर हमला

इस बार हालात इसलिए भी ज्यादा संगीन हैं क्योंकि ईरान पर इल्जाम है कि उसने यूएई के दो तेल टैंकरों को मिसाइलों से निशाना बनाया है. इस हमले में एक तेल टैंकर जिसका नाम मोम्बासा है उसपर किये गए हमले में एक भारतीय नाविक की मौत हो गई जबकि कई दूसरे लोग ज़ख्मी हुए. भारतीय विदेश विभाग ने अभी तक नाविक का नाम सावर्जनिक नहीं किआ है, भारत सरकार ने इस पर कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए ईरान के राजनयिक को तलब किया. यूएई ने भी इसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून और समुद्री आज़ादी पर हमला बताया है.

खाड़ी के अरब मुल्कों की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वे इस जंग का हिस्सा बने बिना भी इसकी मार झेल रहे हैं. बहरीन में कई बार एयर डिफ़ेंस सिस्टम सक्रिय करना पड़ा और लोगों को सुरक्षित जगहों पर जाने की सलाह दी गई. वहीं ईरान का दावा है की उसने सिर्फ़ अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया, जबकि बहरीन का कहना ही कि उसने कई मिसाइलों और ड्रोन को रास्ते में ही मार गिराया. ऐसी खबरों ने पूरे जीसीसी (GCC) इलाके में बेचैनी बढ़ा दी है.

हूती लड़ाकों की गतिविधियां फिर तेज

सऊदी अरब भी पूरी तरह निश्चिंत नहीं है. यमन के हूती लड़ाकों की गतिविधियां फिर तेज होती दिखाई दे रही हैं. मिसाइलों और ड्रोन की खबरों के बाद बहुत से उड़ानों को रद्द करना पड़ा, जिसके कारण यात्रियों को परेशानी उठानी पड़ी है. अगर यह सिलसिला लंबा चलता है तो सऊदी अरब के विज़न 2030, पर्यटन और विदेशी निवेश की रफ़्तार भी प्रभावित हो सकती है. खाड़ी के देशों ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी अर्थव्यवस्था को सिर्फ़ तेल पर निर्भर रहने से निकालने की कोशिश की है, लेकिन ये सचाई है कि जंग का माहौल विदेशी निवेशकों को हमेशा डरा देता है.

यूएई की स्थिति भी आसान नहीं है. दुबई और अबू धाबी दुनिया के बड़े व्यापारिक और वित्तीय केंद्र बन चुके हैं. अगर समुद्री व्यापार और हवाई यातायात लगातार प्रभावित होते हैं तो इसका असर बंदरगाहों, लॉजिस्टिक्स, बीमा, पर्यटन और वित्तीय बाजारों पर पड़ेगा. इसी वजह से यूएई लगातार यह अपील कर रहा है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों को सुरक्षित रखा जाए और तनाव को बढ़ने से रोका जाए.

ईरान ने लगाया सैन्य दबाव डालने का आरोप

इस पूरे संकट का एक दूसरा पहलू भी है. ईरान का कहना है कि उस पर लगातार सैन्य दबाव डाला जा रहा है और वह अपनी सुरक्षा, अपने रणनीतिक हितों की रक्षा कर रहा है. दूसरी तरफ अमेरिका का कहना है कि उसके हमलों का मकसद ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कम करना है जिनसे जहाजरानी और क्षेत्रीय सुरक्षा को खतरा है. दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलें दे रहे हैं, लेकिन जमीन पर नतीजा यही निकल रहा है कि तनाव कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है.

तेल आयात करने वाले देशों के लिए चुनौती

आर्थिक मोर्चे पर इसके असर अब साफ दिखाई देने लगे हैं. तेल की कीमतों में फिर से तेजी आई है, शिपिंग कंपनियां अतिरिक्त बीमा प्रीमियम मांग रही हैं और कई जहाज वैकल्पिक रास्ते तलाशने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन होर्मुज़ का कोई आसान विकल्प मौजूद नहीं है. इसलिए अगर यह संकट लंबा चला तो पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ सकती है. खासकर तेल आयात करने वाले देशों के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती होगी.

भारत के लिए भी यह हालात बेहद अहम हैं. लाखों भारतीय खाड़ी देशों में काम करते हैं. इनकी संख्या  लगभग 90 लाख है, ये प्रवासी भारतीयों अपने परिवारों को जो धनराशि भेजते हैं उससे भारत को हर साल लगभग 40 से 50 अरब अमेरिकी डॉलर (बिलियन डॉलर) की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है. साथ ही भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा करता है. ऐसे में अगर जंग और फैलती है तो भारत को अपने नागरिकों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति,रोज़गार और व्यापार, चारों मोर्चों पर एक साथ काम करना पड़ेगा. भारतीय नाविक की मौत ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है.

सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि क्या यह टकराव फिर से पूरी तरह की जंग में बदल सकता है? कई विश्लेषकों का मानना है कि अभी लड़ाई सीमित स्तर पर है, लेकिन अगर किसी बड़ी सैन्य या नागरिक त्रासदी ने हालात को और भड़का दिया तो पूरे पश्चिम एशिया को इसकी आग अपनी चपेट में ले सकती है. यही वजह है कि दुनिया के कई देश लगातार बातचीत और युद्धविराम की अपील कर रहे हैं.

आज की सूरत-ए-हाल यह है कि खाड़ी का इलाका सिर्फ़ तेल का केंद्र नहीं बल्कि दुनिया की आर्थिक और रणनीतिक धुरी भी है. यहां चलने वाली हर मिसाइल, हर ड्रोन और हर समुद्री टकराव का असर हजारों किलोमीटर दूर बैठे आम इंसान को प्रभावित कर रहा है. इसलिए यह जंग सिर्फ़ ईरान और अमेरिका की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की चिंता बन चुकी है. अगर आने वाले दिनों में कूटनीति को मौका नहीं मिला तो हो सकता है दुनिया को एक बड़े आर्थिक मंदी के लिए खुद को तैयार करना पड़ेगा.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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