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Explained: आओ सेक्स के बारे में बात करें! स्कूली बच्चों को यौन शिक्षा देना क्यों जरूरी? कहीं POCSO में न फंस जाए आपका बच्चा

Sex Education: बच्चे अक्सर इंटरनेट या दोस्तों से आधी-अधूरी और गलत जानकारी लेकर बड़े होते हैं. सेक्स एजुकेशन इन मिथकों को तोड़ने का काम करेगा. इससे पीरियड्स जैसे मुद्दों पर लगी चुप्पी भी टूटेगी.

जनवरी 2025 की ठंड थी. मेरठ जिले के सरधना थाने में एक गंभीर मामला दर्ज हुआ. पुलिस ने 16 साल 5 महीने के लड़के पर BNS की धाराएं 333, 70(2), 351(2) और पॉक्सो एक्ट की धारा 5(g)/6 ठोक दी. बच्चे को हिरासत में लेकर चाइल्ड ऑब्जर्वेशन होम भेज दिया. 4 अप्रैल 2025 को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने अर्जी खारिज कर दी और मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा. कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए पॉक्सो रद्द कर दिया. कोर्ट ने कहा कि नाबालिग का क्राइम रिकॉर्ड नहीं है और उसे बेल मिल गई. अब सु्प्रीम कोर्ट ने खुद ऐसे मामलों को रोकने के लिए बड़ा कदम उठाया है यानी बच्चों के लिए सेक्स एजुकेशन. आइए एक्सपर्ट्स से जानते हैं कि यह पढ़ाई जरूरी क्यों है और क्या वाकई यह सब पढ़ाया जाएगा...

सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला खुद क्यों उठाया?

सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों के 'राइट टू प्राइवेसी' को लेकर खुद ही संज्ञान लिया था. जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है. कोर्ट की सबसे बड़ी चिंता यह है कि 15 से 18 साल के किशोरों के बीच जो आपसी सहमति से संबंध बनते हैं, वे बिना सोचे-समझे गंभीर अपराध की कैटेगरी में डाल दिए जाते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि पॉक्सो एक्ट बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए बना था, लेकिन आज इसका इस्तेमाल किशोरों के आपसी प्रेम संबंधों पर भी हो रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि 15 से 18 साल की उम्र शारीरिक और मानसिक बदलावों का दौर है. जब इस उम्र के लड़के-लड़की भागकर शादी कर लेते हैं या आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं, माता-पिता अपने 'पारिवारिक सम्मान' के नाम पर लड़के पर पॉक्सो का मुकदमा ठोक देते हैं. नतीजतन नाबालिग लड़के को जेल भेज दिया जाता है. लड़के की पूरी जिंदगी और करियर तबाह हो जाता है. सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि इसे रोकने का इकलौता रास्ता शुरुआती लेवल पर सही शिक्षा और जागरूकता देना है.

सरकार ने इस मामले पर क्या कदम उठाया?

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद केंद्र सरकार ने एक नेशनल एक्सपर्ट पैनल बनाया. इस 26 सदस्यीय पैनल का नेतृत्व महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव ने किया. इसमें टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज  (TISS) के एक्सपर्ट, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट और अलग-अलग मंत्रालयों के प्रतिनिधि शामिल थे. पैनल को यह जिम्मेदारी दी गई थी कि वह पॉक्सो एक्ट के मामलों में किशोरों के अधिकारों की रक्षा करने और उन्हें जागरूक बनाने के लिए रोडमैप तैयार करें. यह रिपोर्ट अब बनकर तैयार है और कोर्ट के सामने रखी गई है.

इस कमेटी ने क्या-क्या सिफारिशें की हैं?

ये सिफारिशें इसलिए अहम हैं क्योंकि ये सीधे स्कूलों में लागू होंगी और करोड़ों बच्चों की जिंदगी पर असर डालेंगी:

  • नया सिलेबस NCERT तैयार करेगा: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत NCERT को एक नया और उम्र के हिसाब से सिलेबस तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है.
  • शुरुआत बिल्कुल बेसिक से होगी: प्राइमरी स्तर पर छोटे बच्चों को शरीर के अंगों, साफ-सफाई और 'गुड टच-बैड टच' के बारे में बुनियादी जानकारी दी जाएगी.
  • हर स्कूल में एक एक्सपर्ट शिक्षक होगा: यह शिक्षक हफ्ते में कम से कम दो बार 15 से 20 मिनट की क्लास लेगा.
  • माता-पिता और शिक्षक भी होंगे प्रशिक्षित: समाज और परिवारों में इस विषय को लेकर जो झिझक है, उसे दूर करने के लिए माता-पिता और शिक्षकों की खास ओरिएंटेशन बैठकें होंगी.
  • सहमति और कानूनी परिणामों की समझ: बड़ी क्लास के किशोरों को आपसी सहमति, शारीरिक सीमाओं और उनके उल्लंघन के कानूनी परिणामों के बारे में विस्तार से सिखाया जाएगा.
  • शारीरिक और मानसिक बदलावों पर खुलकर बात: किशोरों को यह समझाया जाएगा कि इस उम्र में शरीर और दिमाग में क्या-क्या बदलाव हो रहे हैं.

सेक्स एजुकेशन क्यों इतनी जरूरी है?

दुनिया भर के एक्सपर्ट्स और कई स्टडीज से जाहिर है सेक्स एजुकेशन सिर्फ जानकारी देने का नाम नहीं है, बल्कि बच्चों को सुरक्षित रखने की एक मजबूत ढाल है.

  • किशोर गर्भधारण में भारी कमी: स्टडी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, जिन देशों ने सेक्स एजुकेशन को अनिवार्य किया है, वहां किशोर गर्भधारण की दर में गिरावट आई है. नीदरलैंड और स्विट्जरलैंड जैसे देशों में टीनएज प्रेग्नेंसी के मामले दुनिया में सबसे कम हैं.
  • यौन शोषण से सीधी सुरक्षा: APS यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और पूर्व मिसेज इंडिया डॉ. अलका खेमचंदानी कहती हैं, 'जब बच्चों को 'गुड टच' और 'बैड टच' के बारे में पता होता है, तो वे किसी भी गलत हरकत को फौरन पहचान कर अपने माता-पिता या शिक्षकों को बता पाते हैं. इन बच्चों के यौन शोषण का शिकार होने की संभावना बहुत कम हो जाती है.'
  • कानून के गलत इस्तेमाल पर रोक: पुरुष आयोग की चेयरपर्सन बरखा त्रेहन कहती हैं, 'जब किशोरों को सहमति, कानून और अपने अधिकारों की सही समझ होगी, तो वे बिना सोचे-समझे ऐसे रिश्तों में नहीं पड़ेंगे जो बाद में कानूनी मुसीबत बन सकते हैं. इससे पॉक्सो जैसे सख्त कानून के गलत इस्तेमाल के मामलों में भी कमी आएगी.'
  • गलत धारणाओं और मिथकों का अंत: बरखा त्रेहन ने कहा, 'भारत जैसे समाज में सेक्स को लेकर बहुत सारी गलतफहमियां और मिथक हैं. बच्चे अक्सर इंटरनेट या दोस्तों से आधी-अधूरी और गलत जानकारी लेकर बड़े होते हैं. स्कूलों में बेहतर सिलेबस इन मिथकों को तोड़ने का काम करेगा. इससे पीरियड्स जैसे मुद्दों पर लगी चुप्पी भी टूटेगी.'

भारत में पॉक्सो एक्ट के तहत केस कितने हैं?

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज कुल मामलों में से लगभग 40-45% मामले झूठे थे. इनमें पीड़िता और आरोपी के बीच 'प्रेम-प्रसंग' या 'सहमति से संबंध' के सबूत पाए गए. यानी, लगभग आधे मामले किशोरों के आपसी रिश्तों से जुड़े थे, न कि किसी अपराधिक साजिश से.

UNICEF की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में हर साल 1.5 करोड़ से ज्यादा किशोरियां (15-19 वर्ष) गर्भवती होती हैं. इनमें एक बड़ी संख्या बिना किसी मेडिकल सलाह के असुरक्षित गर्भपात का शिकार होती है.

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS-5) के मुताबिक, 15-24 साल के सिर्फ 18% युवाओं को ही यौन और प्रजनन स्वास्थ्य की जानकारी है. बाकी बचे 82% बच्चे अंधेरे में हैं और यही अंधेरा उन्हें गलत रास्तों पर ले जाता है.

इस मामले में आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह इस पूरे मामले पर तसल्ली से सुनवाई करेगी और फिर सरकार को जरूरी निर्देश जारी करेगी. सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने एक बार फिर चिंता जताई कि कम उम्र के बच्चों को कठोर पॉक्सो कानून के दायरे से बचाना बहुत जरूरी है और हर मामले में पुलिस की भूमिका नहीं हो सकती. अगर इसे सही तरीके से लागू किया गया तो यह केवल एक और विषय नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए एक सुरक्षित, स्वस्थ और जागरूक भविष्य की नींव साबित होगा.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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