यूपी चुनाव: दोबारा सत्ता पाने के लिए एक तिहाई विधायकों के टिकट काटेगी बीजेपी ?

उत्तर प्रदेश का सिंहासन बचाने के लिए इस बार बीजेपी जरूरत से ज्यादा फ़िक्रमंद हो उठी है और इसकी बड़ी वजह ये है कि उसके अंदरूनी सर्वे में ये इशारा कर दिया गया है कि सब कुछ ठीक नहीं है और विरोधयों को कमजोर मानकर चलना बड़ी भूल होगी. संघ और पार्टी की तरफ से हुए इस आंतरिक सर्वे में कहा गया है कि दोबारा सत्ता में काबिज़ होने के लिए पार्टी को तकरीबन एक तिहाई मौजूदा विधायकों का टिकट काटने का कठिन फैसला लेना होगा. ये ऐसे विधायक हैं, जो अपनी पार्टी की सरकार होने के बावजूद धरातल पर काम करने में नाकारा साबित हुए हैं, जिसके चलते उनके खिलाफ जबरदस्त जनाक्रोश है.
बताया गया है कि ऐसे 121 विधायकों को हटाकर वहां नये चेहरों को मैदान में उतारने की मजबूरी के सिवा पार्टी के पास कोई और चारा नहीं है. इन सर्वे में किसान आंदोलन के कारण पश्चिमी यूपी में पार्टी को खासा नुकसान होने की चेतावनी दिए हुए सुझाया गया है कि सारा फ़ोकस पूर्वांचल पर किया जाए, ताकि वहां से अधिकतम सीटें लाकर इस नुकसान की भरपाई हो सके.
पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने संघ की तरफ से हुए सर्वे के नतीजों को गंभीरता से लिया है और उसके मुताबिक ही अपनी रणनीति को अमल में लाना शुरू कर दिया है. हालांकि यूपी की सत्ता का रास्ता पूर्वांचल से ही निकलता है, जहां से उसे पिछली बार झोली भरकर सीटें मिली थीं. कुल सीटों की एक तिहाई से भी ज्यादा यानी 156 सीटें इसी हिस्से में हैं. पूर्वांचल में भाजपा की मजबूत पकड़ का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में यहां से बीजेपी को 115 सीटें मिली थीं. जबकि सपा 17, बसपा 14 और कांग्रेस महज़ दो सीटों पर सिमट गई थी.
लेकिन इस बार बीजेपी अपने इस मजबूत गढ़ को और अधिक ताकतवर देखना चाहती है, इसीलिये उसने अपनी रणनीति के हिसाब से सक्रियता बढ़ा दी है. इसका महत्व इसी से समझा जा सकता है कि महज़ एक हफ्ते में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो बार पूर्वांचल का दौरा कर चुके हैं. गत 20 अक्टूबर को पीएम ने कुशीनगर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का उद्घाटन किया, तो वहीं 25 अक्टूबर को उन्होंने सिद्धार्थनगर में 9 मेडिकल कॉलेजों का उद्घाटन किया. इस योजना के अंतर्गत अगले पांच सालों में 64000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे, जिसके तहत जिला स्तर पर ICU, वेंटिलेटर आदि की सुविधाएं उपलब्ध होंगी. इसके साथ ही 37 हजार बेड्स विकसित किए जाएंगे.
लिहाज़ा लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सियासी गलियारों में यह चर्चा का विषय बन चुका है कि पूर्वांचल में विकास कार्यों पर बीजेपी आखिर इतना जोर क्यों दे रही है और इसके सियासी मायने क्या हैं? उसकी एकमात्र व बड़ी वजह है कि तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी के प्रति लोगों की नाराजगी बढ़ रही है और बीजेपी नहीं चाहती कि इसकी आंच अन्य इलाकों तक फैल पाये. हालांकि लखीमपुर खीरी कांड भी पार्टी के लिए एक सिरदर्द तो बना ही हुआ है. ऐसे में, पार्टी को आशंका है कि पश्चिमी यूपी के अलावा तराई बेल्ट की कुछ सीटों पर भी उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है.
बीजेपी का सबसे बड़ा प्लस पॉइन्ट ये है कि उसके पास संघ के रूप में एक ऐसा थर्मामीटर है, जो चुनाव से पहले ही लोगों की नब्ज़ जानकर पार्टी नेताओं को आगाह कर देता है कि उन्हें क्या करने से बचना चाहिए. पिछले हफ़्ते संघ के सह सर कार्यवाह कृष्ण गोपाल ने नोएडा में चुनाव-रणनीति के मकसद से एक अहम बैठक ली थी. इसमें पश्चिमी यूपी के सभी पार्टी सांसदों और विधायकों को बुलाया गया था. इसमें उन्हें साफ हिदायत दी गई कि वे अपने चुनाव अभियान व भाषणों में किसानों के खिलाफ गुस्सा निकालने में जरा संयम से काम लें. किसानों के लिए 'खालिस्तानी' या असामाजिक तत्व जैसे शब्दों का प्रयोग करने से बचा जाए और सारा फोकस सिर्फ इस बात पर रखा जाए कि किसानों की भलाई के लिए केंद्र व यूपी सरकार ने अब तक क्या किया है और आगे क्या करने की योजना है. सभी नेताओं को ये भी सुझाया गया कि बेहतर तो ये होगा कि वे अपने चुनावी-भाषणों में किसान आंदोलन जैसे विवादित विषय का जिक्र ही न करें.
साल 2017 में पार्टी को यूपी की सत्ता में लाकर राजनीति के चाणक्य बन चुके गृह मंत्री अमित शाह इस बार फ़िर उसी भूमिका को निभाने की शुरुआत 29 तारीख को लखनऊ से करने वाले हैं. पार्टी नेताओं और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत उनकी सरकार के मंत्रियों और संघ के प्रदेश पदाधिकारीयों से भी उनकी अलग-अलग बैठकें हैं. देखते हैं कि अबकी वे चाणक्य-नीति के किस फार्मूले को अपनाते हैं?
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