थैलेसीमिया के इन लक्षणों को न करें नज़रअंदाज, ज़रूर लें डॉक्टर से परामर्श

स्वास्थ्य बेहतर हो ये हर कोई चाहता है लेकिन दिनचर्या में बदलाव होने से कई तरह की बीमारियां भी जन्म लेती हैं. कई बीमारियां ऐसी भी होती हैं जो आनुवांशिक होती हैं. कई बार ऐसी बीमारियों के कारणों की खोज करने के बावजूद उसका कोई कारण नहीं मिल पाता है. माता-पिता से बच्चों में बीमारियों का हस्तांतरित होना ही आनुवांशिक बीमारी कहलाती है. ऐसी ही एक बीमारी के बारे में बता रहे हैं मेडिकल ऑन्कोलॉजी एवं हीमेटोलॉजी के डॉक्टर सुनीत लोकवानी. आइए उनसे थैलेसीमिया के बारे में जानते हैं:
रक्त संबंधी कई बीमारियां होती है. कई ऐसी बीमारियां होती हैं जो शरीर में रक्त में हीमोग्लोबिन के निर्माण में बाधा डालती हैं. ऐसी ही एक बीमारी थैलेसीमिया है. ये एक रक्त संबंधी रोग है. इस रोग में रक्त कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन का निर्माण ठीक तरह से नहीं हो पाता हैं. यह रोग अधिकतर बच्चों में देखा जाता है और यह उनके वंश में एक असामान्य जीन होने के कारण होता है. यह जीन दो तरह से होते हैं - थैलेसीमिया बीटा और थैलेसीमिया अल्फा.
थैलेसीमिया के कारण
थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रोग होता है, जो एक असामान्य जीन के कारण होता है जो रक्त कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन बनाने की क्षमता को कम करता है. यह जीन अधिकतर वंश में स्थित होता है और यह एक बच्चे को माता-पिता दोनों से मिल सकता है. इसलिए, अगर परिवार में थैलेसीमिया संबंधी रोग के मरीज होते हैं, तो जन्मजात बच्चे के इस बीमारी से पीड़ित होने की संभावना होती है. अन्य कारकों में, थैलेसीमिया के लक्षणों में से कुछ कारकों में रक्त के आपूर्ति में कमी, अल्कोहल का सेवन और पहले से अन्य रोग होना आदि शामिल हो सकते हैं.
थैलेसीमिया के लक्षण
थैलेसीमिया के लक्षण इस रोग के स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं. कुछ लक्षण इस प्रकार है:
- थकान या कमजोरी
- नियमित खांसी या सांस लेने में परेशानी
- पेट दर्द या उल्टी करना
- त्वचा का पीला हो जाना
- इंटेस्टाइन का सफेद होना
- शरीर के कुछ हिस्सों में सूजन या फुलाव
- दिमागी विकार
- बुढ़ापे में घुटनों या हड्डियों में दर्द
यदि कोई भी ऊपर बताए लक्षणों से पीड़ित होता है, तो उसे अपने डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए जिससे सही उपचार और देखभाल मिल सके.
थैलेसीमिया का इलाज
थैलेसीमिया का उपचार रक्त की आपूर्ति को बढ़ाने, हीमोग्लोबिन की मात्रा को बढ़ाने और संबंधित लक्षणों का इलाज करने के लिए किया जाता है. इसके इलाज के लिए ब्लड ट्रांसफ्यूजन किया जा सकता है. यह थैलेसीमिया के मरीजों के रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा को बढ़ाने के लिए किया जाता है. यह उपचार स्थायी नहीं होता है और नियमित अंतराल पर दोहराया जाना पड़ता है. वहीं बोन मैरो ट्रांसप्लांट उपचार इसका सटीक इलाज है लेकिन यह काफी महंगा होता है. इसमें मरीज को एक नए बोन मैरो से बदलने की जरूरत होती है जो शरीर में नॉर्मल हीमोग्लोबिन का उत्पादन करता है. इसके अलावा लक्षणों के अनुसार दवाइयों का उपयोग भी किया जा सकता है. थैलेसीमिया के अलग-अलग लक्षणों के लिए विभिन्न दवाइयों का उपयोग किया जा सकता है जैसे विटामिन डी या फोलिक एसिड के उपयोग से रक्त की गति को बढ़ाया जा सकता है.
(यह आर्टिकल निजी विचारों पर आधारित है. इसे डॉ. सुनीत लोकवानी से बातचीत के जरिए तैयार किया गया है)


































