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भारत में जाति जनगणना: मांग और राजनीतिक दुविधा

 भारत में जाति जनगणना, विशेष रूप से हाल के वर्षों में,  बहस और चर्चा का विषय रही है.  यह अवधारणा भारतीय जनसंख्या का जाति-वार विवरण प्राप्त करने के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें न केवल अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) पर ध्यान केंद्रित किया गया है, बल्कि अन्य जातियों को भी शामिल किया गया है. राहुल गांधी के इस दावे से इस विचार को एक बार फिर प्रमुखता मिली है कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो जाति जनगणना कराएगी. उन्होंने कहा की ये ज़रूरी है क्योंकि किसी भी बीमारी का पता लगाने के लिए एमआरआई और एक्सरे ज़रूरी है.

जाति जनगणना: आवश्यकता और संदर्भ

अंतिम व्यापक जनगणना जिसमें जाति पर डेटा शामिल था, 1931 में ब्रिटिश औपनिवेशिक युग के दौरान की गई थी.  जबकि बाद की जनगणनाओं ने एससी और एसटी आबादी पर जानकारी एकत्र की, लेकिन उन्होंने व्यापक जाति डेटा को छोड़ दिया.  ब्रिटिश सरकार ने 1941 में इसे बंद कर दिया और स्वतंत्र भारत ने इसे पुनर्जीवित नहीं किया.

जाति जनगणना की मांग 2010 में फिर से उठी जब मनमोहन सिंह की सरकार थी. हालाँकि, इसमें सटीकता के मुद्दों सहित महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिसमें लगभग 25% डेटा गलत था.  जनसंख्या-वार विभाजन के बजाय, अंतिम डेटा ने जातियों की कुल संख्या प्रस्तुत की, जो कि इच्छित उद्देश्य से कम थी.

 वर्तमान बहस

 2022 में एक बार फिर जाति जनगणना की मांग करते हुए 11 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री से अपील की.  हालाँकि, भारत सरकार इस प्रयास को आगे बढ़ाने को लेकर सतर्क बनी हुई है. विपक्ष का मानना ​​है कि एक व्यापक जाति जनगणना भारत के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य की अधिक सटीक समझ प्रदान करेगी, जिससे बेहतर-लक्षित गरीब-समर्थक नीतियों और अधिक प्रभावी आरक्षण नीतियों की लागू करने में मदद मिलेगी.

 जाति जनगणना के ख़िलाफ़ प्राथमिक तर्क यह डर है कि इससे सामान्य आबादी और पिछड़ी जातियों के बीच विभाजन बढ़ सकता है.  यह चिंता जनसंख्या के एक निश्चित वर्ग द्वारा व्यक्त की गई है.  हालाँकि, जनगणना के समर्थकों का तर्क है कि सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को प्रभावी ढंग से संबोधित करने के लिए जाति जनसांख्यिकी पर व्यापक डेटा इकट्ठा करना आवश्यक है. गौरतलब है की बिहार में नितीश कुमार की सरकार ने जाति जनगणना का कार्य शुरू कर दिया है.

 नीति निर्माण में भूमिका

 जाति जनगणना का एक महत्वपूर्ण पहलू नीति निर्माण में इसकी संभावित भूमिका है. वर्तमान में, सरकार केवल एससी/एसटी आबादी पर डेटा तक पहुंच सकती है, जिससे आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा, अर्थात् अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) गायब हो जाता है. अनुमान बताते हैं कि ओबीसी आबादी भारत की कुल आबादी का 52% है.

 सटीक जाति-वार डेटा के साथ, नीति निर्माता लक्षित नीतियों को डिजाइन करने और लागू करने के लिए बेहतर ढंग से सुसज्जित होंगे. उदाहरण के लिए, आरक्षण, जो भारत में एक गर्म बहस का मुद्दा है, को जाति जनसांख्यिकी पर सटीक डेटा के साथ अधिक प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जा सकता है. इससे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अवसरों और संसाधनों का अधिक न्यायसंगत वितरण हो सकता है.

 ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

 भारत में जाति जनगणना का इतिहास जांचने लायक है.  2011 में मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में जातीय जनगणना कराई गई थी.  इस जनगणना को अद्वितीय बनाने वाली बात इसका कागज रहित प्रारूप में परिवर्तन था, जिसमें हैंडहेल्ड उपकरणों का उपयोग करके डेटा संग्रह किया जाता था.  इस महत्वाकांक्षी प्रयास में हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को शामिल किया गया.

 इस जनगणना से एकत्र किया गया डेटा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) सहित विभिन्न सरकारी योजनाओं में उपयोग के लिए था. यह नीति कार्यान्वयन के लिए जाति-आधारित डेटा का उपयोग करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, भले ही इसमें पूरी आबादी शामिल नहीं है.

मनमोहन सिंह सरकार के बाद जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने उच्च स्तर ब्यूरोक्रेसी में एसटी/एससी और ओबीसी भागीदारी का पता लगाने के लिए भारतीय जनता पार्टी के सदस्य किरीट प्रेमजीभाई सोलंकी की अध्यक्षता वाले 30 सदस्यीय पैनल गठित की जिसने लोकसभा में अपनी रिपोर्ट सौंपी.

इस सर्वे में ये बात सामने आई कि उच्च नौकरशाही में एससी और एसटी उम्मीदवारों का प्रतिनिधित्व 2017 में 458 से बढ़कर 2022 में 550 होने के बावजूद, यह अपेक्षित स्तर से नीचे रहा.  एससी और एसटी उम्मीदवारों की अधिकतम संख्या उप सचिव या निदेशक के स्तर पर नियुक्त की गई - 2017 में 423 से 2022 में 509. "संयुक्त सचिव / एएस / सचिव के वरिष्ठ स्तर पर, आंकड़ा लगभग 35 के साथ समान है  2017 और 2022 में 41, था.

 वहीँ भारतीय आबादी का 5% ब्राह्मणों के पास 34% सरकारी नौकरियां हैं और एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के लिए 50% आरक्षण के बाद भी सामान्य वर्ग का 75.5% सरकारी नौकरियों पर पदासीन हैं.

 निष्कर्ष

 भारत में जाति जनगणना को लेकर चल रही बहस देश में चल रही जटिल सामाजिक-राजनीतिक तानेबाने और उसकी जटिलताओं को रेखांकित करती है.  जाति-वार जनसांख्यिकीय डेटा की मांग इस विश्वास से प्रेरित है कि यह अधिक लक्षित गरीब-समर्थक नीतियों और निष्पक्ष आरक्षण प्रणालियों का मार्ग प्रशस्त कर सकता है.  हालाँकि इसे लेकर समाज के भीतर विभाजन बढ़ने की आशंकाएँ बनी हुई हैं.

 ऐसे युग में जहां डेटा नीति निर्धारण के लिए एक अमूल्य संपत्ति है, एक व्यापक जाति जनगणना की आवश्यकता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.  यह संभावित रूप से सूचना अंतर को पाट सकता है, भारत की विविध आबादी की स्पष्ट तस्वीर पेश कर सकता है और सामाजिक न्याय और समान विकास की खोज में सहायता कर सकता है.  हालाँकि निर्णय अंततः सरकार का है, लेकिन जाति जनगणना पर चर्चा जारी रहने की संभावना है, जो एक अधिक न्यायपूर्ण और समावेशी समाज के लिए भारत की चल रही खोज को दर्शाता है.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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