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धारा 370 खत्म होने के दो साल: मैं था, हूं और रहूंगा भी क्योंकि मैं कश्मीर हूं

" जब तक गंगा मे धार, सिंधु मे ज्वार, अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष,
स्वातंत्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे अगणित जीवन यौवन अशेष.
अमेरिका क्या संसार भले ही हो विरुद्ध, कश्मीर पर भारत का सर नही झुकेगा  
एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतंत्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा."

जब अमेरिका से हथियार खरीदकर पाकिस्तान ने धरती की जन्नत समझे जाने वाले कश्मीर में आतंकवाद को पैदा करने की शुरुआत की थी, तब इस देश के प्रधानमंत्री रह चुके दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी ने जो कविता लिखी थी,ये उसके ही अंश हैं.सपना उनका था लेकिन उसे ठीक दो साल पहले आज ही के दिन साकार किया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने.

आज की तारीख बेहद खास
पिछले दो साल में देश को ये उम्मीद जगी थी कि अब श्रीनगर की डल झील के शिकारों में मौज करने वालों की ऐसी बाढ़ आ जायेगी कि संभाले भी नहीं संभलेगी.कश्मीर से बाहर रहने वाले लोग श्रीनगर, अनंतनाग जैसी जगह पर अपने लिए प्लाट खरीदते नज़र आएंगे. लेकिन अफ़सोस कि ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला.आज की तारीख हिंदुस्तान के इतिहास में इसलिये बेहद मायने रखती है क्योंकि ठीक दो साल पहले जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने का फैसला केंद्र सरकार ने लिया था.जाहिर है कि कश्मीर घाटी से बाहर पूरे देश में इस निर्णय का जबरदस्त स्वागत भी हुआ और सबको यही अहसास हुआ कि अब कश्मीर की वादियों में आतंकियों के ख़ौफ़ज़दा साये की जगह अनगिनत फूलों की सदाबहार महक से ही उनका वास्ता पड़ेगा.अगर देश के सैलानियों में अभी भी डर बैठा हुआ है,तो उसका सारा दोष सिर्फ मोदी सरकार को नहीं दे सकते बल्कि कसूर घाटी के उन नेताओं का भी ज्यादा है,जो न तो ऐसा माहौल बनाना चाहते हैं और न ही पर्यटन को बढ़ावा देने में दिलचस्पी रखते हैं.शायद इसलिए कि घाटी के आम अवाम के मुकाबले उनके पेट जरुरत से ज्यादा भरे हुए हैं,लिहाजा वे नहीं चाहते कि वादियों में लगातार लोगों की आवाजाही होती रहे.

'जज्बा पैदा करने की जरूरत'
हालांकि ये भी सच है कि विशेष दर्जा ख़त्म करने के बाद कश्मीर जैसे बेहद संवेदनशील मसले पर सरकार को भी सॉफ्ट पॉलिसी अपनाने पर इसलिये जोर देना चाहिए था क्योंकि घाटी में बरसों से जिंदगी बिता रहे लोग पराये नहीं,अपने ही हैं.उनमें भरोसे का ये इक़बाल पैदा करके ही पाकिस्तान के पाले-पोसे आतंकवाद के खिलाफ जारी लड़ाई को हम आसानी से जीत सकते हैं.नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था कि "दुश्मन मुल्क से कोई भी लड़ाई सिर्फ बंदूक और तोप से नहीं जीती जाती बल्कि लड़ने से पहले ये भी देखना होता है कि उसमें हमारे अपने लोग कितने साथ हैं और उनका जज़्बा कैसा है." कुछ यही हाल आज कश्मीर का भी है जहां दिखता कुछ है लेकिन होता कुछ और है.लिहाज़ा जरुरत है वो जज़्बा पैदा करने की जो बंदूक की नोक से नहीं बल्कि मुहब्बत व हमदर्दी से ही आ सकता है.

'प्रमुख नेताओं को किया गया नजरबंद'
हो सकता है कि कुछ लोग इसे न मानें लेकिन ये भी हक़ीक़त है कि अलग-अलग पार्टिगों से जुड़े घाटी के प्रमुख नेताओं को लंबे अरसे तक नज़रबंद करके उनकी आवाज़ को तो खामोश कर दिया गया लेकिन अवाम के बीच इसका गलत संदेश ये गया कि केंद्र में बैठी सरकार जोर-जबदरस्ती करने की हिमायती है और इसका नतीजा ये हुआ कि जिस अवाम को मोदी सरकार की तारीफ़ों के क़सीदे पढ़ने चाहिये थे कि इससे उनकी जिंदगी और खुशहाल होगी,उसी अवाम के दिलों में इन नेताओं के प्रति सहानुभूति के जज़्बात हिलोरे मारने लगे.हालांकि सूबे के तीन पूर्व मुख्यमंत्री अब नज़रबंदी की कैद से आज़ाद हैं लेकिन जम्मू-कश्मीर में अमन -चैन की नई बयार लाने वाले नीति-निर्माताओं के लिए ये गहन चिंतन का विषय होना चाहिए कि इतनी लंबी कैद से आखिर हासिल क्या हुआ.मकसद तो ये था कि धारा 370 ख़त्म करने के बाद घाटी में पर्यटन बढ़ेगा, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और किसी नौजवान को गुमराह होकर आतंकवाद की शरण नहीं लेनी पड़ेगी.लेकिन जमीनी स्तर पर इन दो सालों में क्या ऐसा हुआ? ठीक है,पत्थरबाजी की करतूतें रुक गईं लेकिन उसकी जगह ड्रोन के विस्फोटक हमलों ने ले ली.जाहिर है कि घाटी की तस्वीर अभी तक वैसी नहीं बदल पाई, जैसी उम्मीद थी.

उमर अब्दुल्ला पर लगा उकसाने का आरोप
उल्लेखनीय है कि राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकीं महबूबा मुफ्ती को सबसे लंबे वक्त यानी करीब 14 महीने के लिए नज़रबंद किया गया था. अगस्त 2019 में नज़रबंदी के बाद अक्टूबर 2020 में उन्हें रिहा किया गया. महबूबा मुफ्ती की रिहाई के लिए उनकी बेटी ने सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाज़ा भी खटखटाया था. महबूबा के अलावा पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला को भी करीब छह महीने तक नज़रबंद रखा गया. फारूक की नज़रबंदी का मामला कई बार संसद में भी उठा था, लेकिन सरकार ने लंबे वक्त तक उन्हें बाहर नहीं आने दिया. फारूक अब्दुल्ला के बेटे और राज्य के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला को कुल 232 दिन के बाद नज़रबंदी से छोड़ा गया था. उमर अब्दुल्ला पर तब PSA के तहत लोगों को उकसाने का आरोप भी लगाया गया था.

'घाटी के नेताओं को पीएम मोदी का बुलावा'
इसी तरह पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के नेता सज्जाद लोन को करीब एक साल के बाद नज़रबंदी से रिहा किया गया. सज्जाद लोन ने तब कहा था कि बाहर आकर दुनिया काफी बदल गई है. इन नेताओं के अलावा लेफ्ट नेता यूसुफ तारिगामी को भी लंबे वक्त तक नज़रबंद किया गया और सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद ही उन्हें रिहा किया गया था. करीब दो साल तक जमी इस सियासी बर्फ को पिघालने का काम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछली 24 जून को किया था. तब उन्होंने जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक प्रक्रिया शुरु करने के लिए तमाम नेताओ को अपने यहां बुलाया, लंबी बातचीत हुई. दिलों को जोड़ने और दिल्ली व कश्मीर की दूरी ख़त्म करने के तमाम वादे भी हुए लेकिन घाटी के नेताओं को मलाल ये है कि डेढ़ महीना बीतने के बाद आज भी हालात वैसे ही हैं, इसलिए उनके दिलों-दिमाग में शक है और डर भी.

कुछ अरसा पहले एक फ़िल्म बनी थी-हैदर.इसमें कश्मीर को बेहद करीने से पेश किया गया था.उसका मशहूर संवाद था--"दरिया भी मैं, दरख़्त भी मैं.झेलम भी मैं, चिनाब भी मैं. दैहर हूं, हरम भी हूं, शिया भी हूं, सुन्नी भी हूं, मैं हूं पंडित...मैं था, मैं हूं, मैं रहूंगा!!!!! 

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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