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BLOG: नौकरी दीजिए, मत दीजिए- लड़ाई तो जारी रहेगी

जब सबसे ताकतवर लोग कोई बात कहते हैं तो उसका असर बहुत दूर तक जाता है. दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक डेलॉयट इंडिया एक नया तुर्रा लेकर आई है. कंपनी ने सेक्सुअल हैरेसमेंट के बारे में अपनी एचआर टीम को सेंसिटिव बनाने के लिए एक मुहिम चलाई है. देश के कानून के बारे में जागरूक करते हुए वह अपनी टीम से पूछ रही है- क्या सेक्सुअल हैरेसमेंट की विक्टिम या इस बारे में शिकायत करने वाली लड़की को काम पर रखना रिस्की है? क्या आप उसे हायर करना चाहेंगे? बाद में कंपनी इस बयान से मुकर गई लेकिन इससे जुड़ा एक सवाल छोड़ ही गई. रेप विक्टिम्स के साथ हम कैसा बर्ताव करते हैं.

इस खबर के साथ ही 2002 के एक मामले की याद ताजा हो आई. कोलकाता में एक अंग्रेजी अखबार में अपने सीनियर के खिलाफ यौन शोषण की रिपोर्ट दर्ज कराने वाली पत्रकार रीता मुखर्जी का केस. रीता ने दस साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद केस तो जीत लिया लेकिन इस दौरान अखबार मालिकों की तरफ से ब्लैकलिस्ट कर दी गईं. फेमिनिस्ट्स इंडिया नामक वेबसाइट पर अपनी आपबीती में उन्होंने लिखा था- ऐसी लड़ाइयों में शिकायत करने वाली औरतें अक्सर अपने सुनहरे प्रोफेशनल जीवन से हाथ धो बैठती हैं और एंप्लॉयीज उन्हें ब्लैकलिस्ट कर देते हैं. जाहिर बात है, शोर मचाकर सबको इकट्ठा करने वाली लड़कियां किसी को पसंद नहीं होती. लड़कियां तो शांत ही अच्छी लगती हैं.

कामकाज की दुनिया के अपने ही रंग हैं. यहां औरतों की मौजूदगी ही बहुत अधिक नहीं है. देश के वर्कफोर्स में औरतें 27 फीसदी यूं ही नहीं हैं. किसी तरह काम करने भी लगीं तो टिकना बहुत मुश्किल होता है. घर से काम करने की जगहों की दूरी, कम तनख्वाह, रात की पालियां, शादी के बाद ससुरालियों के साथ एडजस्टमेंट, घरेलू काम के बाद दफ्तरों में काम का तनाव भरा माहौल, बच्चों, बुजुर्गों की देखरेख करने की जिम्मेदारी... इन सबको पार कर भी लिया तो बॉस की नजरों में अच्छे बने रहने की जद्दोजेहद. अच्छे बनने के लिए कई बार तमाम तरह के कॉम्प्रोमाइज.

इनमें सेक्सुअल फेवर भी काम करता है. 2010 में सेंटर फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया ने अपने सर्वे में पाया था कि 88 फीसदी औरतों को काम करने वाली जगहों पर किसी न किसी रूप में सेक्सुअल हैरेसमेंट का सामना करना पड़ता है. इसी तरह देश के एक बड़े अंग्रेजी अखबार के ऑनलाइन सर्वे में एक चौथाई औरतों ने माना था कि मर्द कलीग्स ने कभी न कभी उनका मॉलेस्टेशन किया है. लेकिन उनके लिए शिकायत करना आसान नहीं रहा. किसी ने शिकायत की तो विक्टिम ब्लेमिंग का दौर शुरू हो गया. विक्टिम से ही कहा गया- कम बोलो. ज्यादा दोस्तियां मत करो. कपड़े कायदे के पहनो. काम से काम रखो. इतनी छुईमुई हो तो काम करने बाहर निकली ही क्यों?

ब्लेमिंग का ही नतीजा होता है कि अक्सर लड़कियों को काम से हाथ धोना पड़ता है. जॉब्स ऑन डिमांड नामक नॉन प्रॉफिट ऑर्गनाइजेशन ने 2015 में ऐसी औरतों के बीच एक सर्वे किया जिन्होंने अपनी कंपनियों में किसी न किसी तरह के हैरेसमेंट के केस किए थे. इस सर्वे में 99 फीसदी औरतों ने कहा था कि उन्हें दोबारा नौकरियां पाने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़े. 68 फीसदी को अपनी नौकरियां गंवानी पड़ीं क्योंकि उन्होंने अपने सीनियर या कलीग्स के खिलाफ दफ्तरों में शिकायत की थी. 28 फीसदी ने माहौल खराब होने पर अपनी मर्जी से नौकरियां छोड़ दी.

मॉलेस्टेशन के बाद औरतें इसीलिए मुंह सी लेती हैं. वर्कप्लेस हैरेसमेंट पर इंडियन बार एसोसिएशन के एक सर्वे में 68.95 फीसदी औरतों ने कहा था कि वे इंटरनल कंप्लेन कमिटी से इस बारे में शिकायत नहीं करती क्योंकि उन्हें बदला लिए जाने की डर होता है. फिर मौजूदा नौकरी चली जाए तो दूसरी नौकरी के लिए धक्के खाओ. नई नौकरी के लिए पिछली बॉस का रिफरेंस कैसे दिया जाए. बॉस तो खार खाए बैठा है. नए बॉस को यह भी कैसे बताया जाए कि पिछली नौकरी में क्या-क्या हुआ था. ऐसे में आप अट्रैक्टिव हायर नहीं रह जाती हैं. मर्द डोमेन में दरवाजा खटखटाने पर अक्सर अपना ही मजाक बन जाता है. आप मजाक- हार्मलेस फन को नहीं समझतीं. ब्वॉयज बीइंग ब्वॉयज या मेल विल बी मेन. यूं भी सड़क चलते शोहदे को तमाचा लगाया जा सकता है. बड़े पद, बड़ी कुर्सी, बड़ा कद... इसे घसीटकर नीचे उतारना बहुत मुश्किल होता है.

यूं डेलॉयट इंडिया का मामला और गंभीर है. उसने सिर्फ अपने एचआर मैनेजरों को नहीं चेताया, बल्कि सोशल मीडिया पर #LetsTalkFraud भी चलाया. मतलब बताएं कि यौन शोषण के कितने मामले फ्रॉड होते हैं. यानी आप मानकर चलते हैं कि ऐसे बहुत सारे मामले गंभीर नहीं होते. औरतें बदनाम करने या बदला लेने के लिए आरोप लगाती हैं. वे फ्रॉड ही होती हैं. दरअसल आदमी औरतों को काम पर रखना ही नहीं चाहते. विश्व बैंक की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में जॉब्स एड्स में खास तौर से मर्दों को प्रिफरेंस दी जाती है. 2011 से 2017 के बीच आठ लाख विज्ञापनों के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है. टीचिंग, बीपीओ जॉब्स और सर्विस सेक्टर में औरतों की जरूरत है पर तनख्वाह वहां कम ही तय की जाती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि 2017 के पहले चार महीनों में 2.4 मिलियन औरतों को रोजगार देने से रोका गया. रिपोर्ट इस समस्या की वजह एक ही बताती हैं. नौकरियों पर रखने वाले यह मानते हैं कि आदमी किसी काम को बेहतर तरीके से कर सकते हैं.

पर औरतें भी कम नहीं. नौकरियां करने पर अमादा हैं. 2011 का नेशनल सैंपल सर्वे कहता है कि शहरों में रहने वाली और हाउसवर्क करने वाली आधी औरतें पेइंग जॉब्स चाहती हैं. इसीलिए वे मौके तलाशती रहती हैं. आदमी चाहते नहीं, औरतें चाहती हैं झगड़ा यही है. यहीं से हैरेसमेंट शुरू होता है जो अक्सर फिजिकल या सेक्सुअल रूप ले लेता है. दरअसल औरतों से आदमियों को जितनी भी शिकायते हैं, उनके जितने भी आरोप हैं, उनमें से अधिकतर का आधार बस यही है कि पिछली पीढ़ियों में औरत को इंसान न समझ कर मशीन या पशु समझ के व्यवहार किया गया और उसे ही आज के मर्दों ने बेंच मार्क मान लिया गया है.

पर व्यवहार तो बदलना ही होगा. लड़कियों ने आवाज उठानी शुरू की है. भले ही आप कड़वाहट से भर उठें. कोई भी कड़वाहट उनके साथ दुर्व्यवहार का जायज कारण नहीं हो सकती. आप नौकरी दें न दें, संघर्ष तो जारी रहेगा.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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