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BLOG: बीजेपी-शिवसेना गठबंधन- क्या दोनों के बीच अब तक महज नूरा कुश्ती चल रही थी?

महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना ने आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए गठबंधन कर लिया है. एक-दूसरे को पानी पी-पी कर कोसते चले आ रहे इन राजनीतिक धड़ों की तनातनी आखिरकार नूरा कुश्ती ही साबित हुई और दोनों पार्टियों ने राज्य की 48 लोकसभा सीटों का आपसी बंटवारा (बीजेपी 25, शिवसेना 23) करके साझा चुनावी तैयारियों को हरी झंडी दे दी. विधानसभा चुनाव में फिफ्टी-फिफ्टी सीटों पर चुनाव लड़ने की सहमति बनी है. फिलहाल उद्धव ठाकरे इस फार्मूले को लेकर राजी नहीं हैं कि जिसके ज्यादा विधायक जीत कर आएंगे, मुख्यमंत्री उसी का बनेगा. इसके बावजूद दोनों पक्षों के कार्यकर्ताओं के मन में कोई शंका न रहे, इसलिए गठबंधन की घोषणा दोनों तरफ के दिग्गज नेताओं- बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री व बीजेपी के हैवीवेट नेता पीयूष गोयल और वरिष्ठ शिवसेना नेता संजय राउत की उपस्थिति में की गई.

गठबंधन से पहले की लगभग 5 साल लंबी तनातनी इसलिए भी नूरा कुश्ती लग रही है कि उद्धव के बेटे और युवा सेनाप्रमुख आदित्य ठाकरे ने 15 दिसंबर 2017 को अहमदनगर की एक रैली में ऐलान किया था- “शिवसेना एक साल में सरकार छोड़ देगी.” उस हिसाब से तो महाराष्ट्र की सरकार कभी की गिर जानी चाहिए थी. लेकिन हम देख रहे हैं कि हर दो माह में ऐसी धमकियां देने वाली शिवसेना न सिर्फ अब तक महाराष्ट्र की सत्ता का स्वाद चख रही है, बल्कि बीजेपी के साथ आगामी चुनाव साथ लड़ने का निश्चय भीकर चुकी है.

उद्धव ठाकरे भले ही इस समझौते को अपनी जीत बताते हुए कह रहे हैं कि वह गठबंधन पर मुहर लगाने को इसलिए राजी हुए कि बीजेपी का अपने गठबंधन सहयोगियों के प्रति व्यवहार में बदलाव आया है. लेकिन वास्तविकता यह है कि अकेले दम पर चुनाव लड़ने की सूरत में शिवसेना के भावी प्रदर्शन का अहसास उन्हें हो गया था. अक्टूबर 2014 के विधानसभा चुनाव का सबक भी उन्हें अच्छी तरह से याद था कि अलग-अलग लड़ने पर वह बीजेपी से लगभग आधी (बीजेपी 122, शिवसेना 63) सीटें ही जीत सकी थी, और इसके मात्र छह माह पहले मई में लोकसभा चुनाव दोनों ने साथ लड़ा था, तो सबका सूपड़ा साफ करते हुए उनको 48 में से 42 सीटों पर विजय मिली थी. इसके मुकाबले कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन मात्र 6 सीटों पर सिमट गया था.

कुछ माह पहले शिवसेना का अंदरूनी सर्वे भी बता रहा था कि बीजेपी से अलग लड़ने पर पार्टी को महाराष्ट्र में दहाई का आंकड़ा छूने में भी कठिनाई आ सकती है. उधर बीजेपी का भय भी यही था कि महाराष्ट्र समेत पूरे देश में 2014 वाली मोदी लहर अब नहीं रही. जमीनी हकीकत यह है कि कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन में सत्ता से बाहर रहने के बाद भी कोई दरार नहीं आई, इसलिए बीजेपी और शिवसेना के अकेले-अकेले चुनावी समर में कूदने से दोनों धड़ों के मतदाताओं का बिखरना तय था. मुकाबला बहुकोणीय होने से इस समृद्ध राज्य में पिछला प्रदर्शन दोहराना सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए लगभग असंभव हो जाता.

उत्तर भारतीय राज्यों में होने वाले नुकसान की आशंका के चलते महाराष्ट्र में एनडीए के लिए ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतना भी बीजेपी के लिए बेहद अहम हो गया है. बदले हुए हालात में शिवसेना से हाथ मिलाने के लिए बीजेपी कुछ कम बेताब नहीं थी. शिवसेना को मनाने की गरज से कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पिछले चार सालों से खाली पड़े विधानसभा उपाध्यक्ष पद पर शिवसेना के विजय औटी को बिठा दिया था और शिवसैनिकों के तीखे बयानों और सामना के कटु संपादकीयों पर ईंट का जवाब पत्थर से देने वाले अपने नेताओं का मुंह बंद करा रखा था.

फडणवीस ने कहा भी था कि लोगों को शिवसेना के जो तेवर दिखते हैं वो अलग हैं और उन्हें बीजेपी का असली स्वभाव मालूम है. गठबंधन की घोषणा करते समय भी उनका यही कहना था कि सैद्धांतिक रूप से शिवसेना और बीजेपी हिंदुत्ववादी हैं, इसलिए मतभेदों के बावजूद दोनों का 25 साल से गठबंधन है. सच भी है कि महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना में खुद को छोटा भाई-बड़ा भाई साबित करने के संघर्ष के बीच जो एक चीज गोंद का काम करती है, वह है हिंदुत्व का एजेंडा. जैसा कि फडणवीस के बयान से भी स्पष्ट है. शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ का घोष वाक्य ही है- ‘ज्वलंत हिंदुत्वाचा पुरस्कार करणारे एकमेव मराठी दैनिक.’ अर्थात्‌ ज्वलंत हिंदुत्व को आगे बढ़ाने वाला एकमात्र मराठी समाचार पत्र.

इसलिए भारत माता की जय, मुस्लिम तुष्टीकरण, पाकिस्तान, गोहत्या, राम मंदिर, घर वापसी, लव जिहाद जैसे अनेक भावनात्मक मुद्दों पर बाजी मार ले जाने के लिए दोनों दलों में स्पर्द्धा तो हो सकती है, मतभेद नहीं है. पिछले दिनों उद्धव ठाकरे का अयोध्या कूच इसका ज्वलंत उदाहरण है, जहां वह बीजेपी से मंदिर निर्माण की तारीख घोषित करवाने की जिद पर अड़े थे. उद्धव ठाकरे कभी नहीं चाहेंगे कि शिवसेना के जन्म के समय से ही उनके पिता स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे जिन विपक्षी पार्टियों की जड़ें खोदते रहे हैं, वह स्वयं उनके पाले में खड़े दिखें. इसलिए सामान्यतया उद्धव की रणनीति यह होती है कि बीजेपी पर दबाव बनाए रखा जाए और चुनाव लड़ने के लिए गठबंधन की ज्यादा से ज्यादा सीटें झटक ली जाएं.

जबकि इस पूरे दौरान बीजेपी का फोकस इस बात पर था कि शिवसेना को प्रमुख विपक्षी दल की तरह व्यवहार करने की छूट देकर कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन के लिए महाराष्ट्र की राजनीति में सिकुड़ चुके अंतराल को और ज्यादा संकुचित कर दिया जाए और अंतत: शिवसेना से हाथ मिला लिया जाए. बीजेपी-शिवसेना के बीच गठबंधन हो जाने से दोनों पार्टियां अपना वोट काफी हद तक एकजुट रखने की उम्मीद तो कर सकती हैं, लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वे कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को पिछले चुनाव जैसी टक्कर दे सकेंगी. लोग तो यह भी पूछेंगे कि उद्धव ठाकरे की उस भीष्म प्रतिज्ञा का क्या हुआ, जिसमें उन्होंने कहा था- 'हर हिंदू की यही पुकार, पहले मंदिर फिर सरकार.'

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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