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बिहार: नीतीश कुमार ने बीजेपी को क्यों दे दिया 'हिंदुत्व' की पिच पर खेलने का पूरा मैदान?

राजनीति में कभी भी कोई न तो स्थायी दोस्त होता है और न ही स्थायी दुश्मन, एनडीए का दामन छोड़कर नीतीश कुमार ने इस कहावत को एक बार फिर सच साबित कर दिखाया है. अब वे आरजेडी,कांग्रेस और वाम दलों के साथ मिलकर सरकार बनाएंगे और आठवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री बनेंगे. एनडीए से नाराजगी की चाहे जो व जितनी वजह रही हो लेकिन नीतीश के इस फैसले ने बिहार की राजनीति को अब दो ध्रुवीय बनाकर रख दिया है. अब वहां बीजेपी बनाम बाकी सब वाली लड़ाई देखने को मिलेगी,जो नजारा लोग उत्तरप्रदेश में देख चुके हैं.

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि नीतीश ने एनडीए का साथ छोड़कर बीजेपी के लिए "हिंदुत्व" पर खेलने का मैदान खाली छोड़ दिया है क्योंकि अभी तक तो नीतीश ने बीजेपी को ये कार्ड खेलने से काफी हद तक रोक रखा था.लेकिन अब उसके साथ गठबंधन की ऐसी कोई सियासी मजबूरी नहीं रहने वाली है.

जाहिर है कि बीजेपी अब बिहार में अपना जनाधार मजबूत करने के लिए हर वह प्रयोग करेगी, जो उसने यूपी में किया है.प्रखर हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का मुद्दा जहां उसके एजेंडे में अव्वल नंबर पर होगा,तो वहीं इस्लामिक चरमपंथ के खिलाफ वो मुखरता से आवाज उठाते हुए ध्रुवीकरण पर फ़ोकस करेगी.यूपी की तरह ही बिहार में भी जाति आधारित राजनीति ही होती आई है लेकिन 2017 में नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के साथ आने से वहां सेक्युलर राजनीति को भी फलने-फूलने का मौका मिला,जिसका उन्हें फायदा भी मिला.

नीतीश कुमार जिस नए गठबंधन वाली सरकार की कमान अब संभालने वाले हैं,उसकी टीआरपी ही जातीय गठजोड़ और सेक्युलर राजनीति करने की है. इसलिये बड़ा सवाल ये उठता है कि ही जब हिंदुत्व व राष्ट्रवाद की तेज आंधी चलेगी, तब सेक्युलर राजनीति वाला यह पेड़ खुद को कहां तक संभाल पायेगा?

बिहार की राजनीति के जानकार मानते हैं कि वहां पहले लालू प्रसाद यादव और फिर नीतीश कुमार के लगातार सत्ता में बने रहने की वजह ही ये है कि वे दोनों वहां के जातीय तिलिस्म को वोट में तब्दील करना जानते हैं.हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी उनके इस तिलिस्म को तोड़ने में काफी हद तक कामयाब रही है. साल 2020 के चुनाव में नीतीश का जेडीयू महज़ 45 सीटों पर सिमट कर रह गया था,जबकि बीजेपी ने 74 सीटें जीतकर जातीय गठजोड़ के समीकरण को धराशायी कर दिया था.

राजनीति में आने से पहले नीतीश कुमार ने इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है. अपने पेशे में रहने वाला इंजीनियर तो किसी ख़राब वस्तु को ही ठीक करता है लेकिन अगर वही सियासत में आ जाये, तो फ़िर वो ठीक करने की बजाय उसे तोड़कर उससे बेहतर नई वस्तु बनाने पर अपना दिमाग दौड़ाता रहता है. नीतीश भी राजनीति में वही फार्मूला अपना रहे हैं.

एक जमाने में एलजेपी के संस्थापक व कई सरकारों में केंद्रीय मंत्री रहे दिवंगत राम विलास पासवान के बारे में कहा जाता था कि वे राजनीति के सबसे बड़े मौसम विज्ञानी हैं क्योंकि केंद्र में जिसकी सरकार बनने की ज्यादा संभावना होती थी, पासवान पहले ही उस पार्टी के सहयोगी बन जाते थे. लेकिन बिहार को लेकर नीतीश कुमार उसी फार्मूले को थोडा अलग इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि उनके पास बहुमत नहीं है लेकिन फिर भी वे 45 विधायकों के दम पर ही सीएम की कुर्सी पर बने रहना चाहते हैं, इसलिये वे पुराना साथ छोडने और नया जोड़ने वाली सत्ता की राजनीति कर रहे हैं.

मंगलवार को इस्तीफा सौंपने के बाद भी नीतीश ने यह नहीं बताया कि बीजेपी के साथ आखिर उनको क्या दिक्कत हुई है. लेकिन बिहार के राजनीतिक गलियारे में यह चर्चा 2020 में हुए विधानसभा चुनाव के समय से ही थी कि बीजेपी अंदर खाने नीतीश की पार्टी को कमजोर करने के खेल में लगी है.

उस वक़्त भी जेडीयू के कई नेताओं ने आरोप लगाया था कि बीजेपी चिराग पासवान की एलजेपी के साथ मिलकर उनकी पार्टी को कमजोर करने की कोशिश कर रही है. चुनाव नतीजों ने इस आरोप को कुछ हद तक सच भी कर दिखाया था, जब नीतीश महज 45 के आंकड़े पर सिमटकर रह गए थे. लेकिन अब बड़ा सवाल है कि हिंदुत्व की सियासी शतरंज वाली बाजी का मुकाबला अब नीतीश कुमार कैसे करते हैं?

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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