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कोडिंग के जरिए बिहार में जातियों के संख्या बल को कम करने की कोशिश, विकास से कोई लेना-देना नहीं

बिहार में जातिगत गणना के तहत अब तक 214 जातियों की पहचान की जा चुकी है. सभी को एक खास कोड नंबर दिया गया है और जो इसके दायरे से बाहर हैं उनके लिए खासतौर पर कॉमन कोड 215 रखा गया है. इस तरह से जातियों को कोडिंग करने पर विवाद बढ़ता जा रहा है.

सवाल है कि ऐसा क्यों किया जा रहा है और इसके पीछे की राजनीति क्या है. मुझे लगता है कि कोड को लेकर विवाद नहीं है क्योंकि जब भी आप सर्वे करते हैं तो हमें तो उसका वर्गीकरण करना ही पड़ता है. 

लेकिन जो नंबर दिया गया है उस पर विवाद हो सकता है क्योंकि अब तक के सर्वे से यह पता चला है कि बिहार में 200 से अधिक जातियां है, तो सबका नाम याद रख पाना तो संभव ही नहीं है. सर्वे के आधार पर उनका एक टेबल बना दिया गया है कि अगर कोई खास जाति का है तो उसका वो नंबर से ही पहचान किया जाएगा. इसे आप कोडिंग या रिकोडिंग भी कह सकते हैं. लेकिन विवाद नंबर पर नहीं है. 

विवाद इस बात का है कि आप किस आधार पर किसे आगे-पीछे कर रहे हैं. दूसरी बात ये है कि किसी एक जाति के अंदर जो उपजातियां हैं, उनका भी आप अलग-अलग वर्गीकरण कर रहे हैं. यह बात हम सब जानते हैं कि सभी जातियों में कई उप जातियां हैं. लेकिन आप एक जाति के उप जातियों को अलग-अलग नहीं बांट सकते हैं तो जातिगत गणना में यह किया जा रहा है. कहीं न कहीं इन जातियों का कहना है कि आप हमारी संख्या बल को कम कर रहे हैं. हमारी शक्ति कम कर रहे हैं.  

मान लीजिए कि राजपूत, ब्राह्मण, कोइरी और यादव जाति हैं. कोइरी या कुर्मी में भी कई उप जातियां हैं, उसी प्रकार से यादव में भी कई उप जातियां हैं. लेकिन वे सभी अपने आप को कुर्मी ही मानते हैं तो स्वाभाविक बात है कि जब उनके अंदर विभाजन कर दिया जाएगा तो उनकी संख्या तो कम हो जाएगी. वैश्य में यह माना जाता है कि उनके अंदर 50 से भी अधिक उप जातियां है और उन्हें भी अलग-अलग कर दिया गया है. उनका दावा है कि उनकी संख्या 22 प्रतिशत है, जो जातिगत गणना के बाद उप जातियों की वजह से कम दिखेंगी. ये जो जातीय जनगणना के पीछे की राजनीति है वो अब लग रहा है कि धरातल पर दिख रही है और यही विवाद का कारण है. लोग अपनी आपत्ति दर्ज करा रहे हैं.

मेरे हिसाब से विकास के लिए जाति का जानना जरूरी नहीं है. तकरीबन 100 साल पहले ये जातिगत जनगणना हुई थी. उस वक्त अंग्रेजों ने अपने हिसाब से करवाई थी. उसी को लेकर अब तक काम हो रहा था. लेकिन अगर हमारा ये कहना कि जातिगत गणना करा कर ही विकास कर सकते हैं, उस खास जाति के लोगों का तो ये बिल्कुल गलत है. देश की आजादी के 75 वर्ष पूरे हो गये. कोई भी स्कीम जब आती है तो उसका लाभ सभी को मिलता है. उसमें जो आरक्षण के दायरे में आते हैं उनको लाभ मिलता है. अगर ऐसा होता तो जो आरक्षण के दायरे में हैं तो उनका विकास तो तेजी से होना चाहिए था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. 

हम सब जानते हैं कि बिहार के एक पूर्व आईएएस अधिकारी ने एमफिल की डिग्री विदेश से ली थी और उनका शोध का विषय मुसहर जाति के लोग थे. मुसहर जाति के बारे में कहा जाता है कि वे लोग चूहा को पकड़ कर खाते हैं. बहुत निम्न तबका का उसे माना जाता है. उन्होंने उनके साक्षरता दर के बारे में अध्ययन किया जिसमें उन्होंने पाया कि ये जो जातियां हैं वो भारत की और बिहार की जो सामान्य साक्षरता दर है उसको इन तक पहुंचने में 550 साल का वक्त लगेगा. ये सब कोई जानता है कि जिस जाति के बारे में मैं बात कर रहा हूं वो दलित जाति से है. लेकिन उनके विकास की जो गति है, वो क्या है.

इसमें तो सरकारों का दोष है, उस जाति का तो कुछ है नहीं. वो तो इस बात के इंतजार में है कि जो विकास की किरण है वो उस तक भी पहुंचे. इसलिए, ये सतही दलील है कि जातिगत आधार पर जनगणना होगी तो ही उनका विकास होगा. इस बात में कोई दम नहीं है ये सिर्फ और सिर्फ सियासी बातें हैं. 

देश की आजादी के बाद जो भी योजनाएं बनीं, सभी के लिए बनीं जो पिछड़े लोग है, दलित हैं, आदिवासी हैं, उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए खास व्यवस्था भी की गई. इसके लिए तो किसी ने नहीं रोका और अभी भी नहीं रोका जा रहा है. जातिगत जनगणना का न होना विकास में कोई बाधा है क्या.

एक चीज और गौर करने वाली है कि जिन राज्यों में जातिगत गणना हो चुकी है तो क्या वहां विकास की रफ्तार तेज हो गई, क्या वहां सभी को उनके हक और अधिकार मिल गए. ये ऐसे सवाल हैं जो किसी भी सभ्य समाज को चिंतन करने को विवश करती है. मुझे लगता है कि विकास से जातिगत जनगणना को जोड़ कर सिर्फ राजनीति की जा रही है. इसका कोई ठोस आधार नहीं है.

पार्टियां जातिगत गणना का उपयोग चुनाव में सिर्फ टिकट बंटवारे के लिए ही कर पाएंगी. चूंकि जब टिकट बंटवारे की बात आती है तो ये बात निकलती है कि हमने इस जाति से, फलाने समाज के इन लोगों को इतना टिकट दिया और वे अपने उस सेक्शन में अपने वोट बैंक को मजबूत करना चाहते हैं. ये सभी राज्यों में होता है लेकिन अगर हम खास तौर पर बिहार की बात करें तो यह देखा गया है कि सभी पार्टियों का यहां अपना एक जातिगत वोट बैंक है. वे अपने कुनबा को और मजबूत बनाने के लिए इस तरह की चीजों के हिमायती हैं. इसका असर टिकट के बंटवारे पर होगा न की वोटों पर.

अब इसे उदाहरण के तौर पर समझिए, सब लोग जानते हैं कि मधेपुरा यादव बहुल इलाका है. ये भी सब लोग जानते हैं कि यादवों की राजनीति लालू यादव करते हैं लेकिन उनके प्रत्याशी भी वहां हारे तो ये क्या दिखाता है. यही न कि ऐसा नहीं हो सकता है कि सिर्फ जातिगत राजनीति करने वाले ही सफल हो सकते हैं. राघोपुर भी यादव बहुल इलाका है. वहां से जदयू के दूसरे यादव नेता ने राबड़ी देवी को भी चुनाव हराया था. कहने का मतलब है कि समाज के ही लोग वोट करते हैं और किसी भी विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र में ये व्यवस्था नहीं है कि सिर्फ किसी खास जाति के ही वोटर हैं. हां वे किसी जगह पर बहुल हो सकते हैं. मुझे लगता है कि ये जो राजनीति है, इससे समाज का भला तो अब तक नहीं हुआ है.

(ये आर्टिकल निजी विचारों पर आधारित है)

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