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Pakistan Afghanistan War: पाकिस्तान ने किया अफगानिस्तान के खिलाफ युद्ध का ऐलान, क्या इस जंग की असल वजह अंग्रेज हैं?

Pakistan Afghanistan War: साल 1919 को ब्रिटिश और अफगानिस्तान के बीच एक समझौता हुआ, जिसमें तय हुआ कि ब्रिटेन अफगानिस्तान को एक देश की मान्यता देगा, जबकि अफगानिस्तान डूरंड लाइन को बॉर्डर मानेगा.

एक तरफ तो ट्रंप ईरान को धमकी ही देते रह गए और दूसरी तरफ पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आपस में खुली जंग भी छेड़ दी है. पाकिस्तानी एयरफोर्स अफगानिस्तान में एयर स्ट्राइक कर रही है तो अफगानिस्तान की एयरफोर्स पाकिस्तान में इस्लामाबाद तक एयर स्ट्राइक कर रही है. अफगानिस्तान पाकिस्तान के 55 लोगों को मारने का दावा कर रहा है तो पाकिस्तान अफगानिस्तान के 150 लोगों को मारने का दावा कर चुका है. पाकिस्तानी सेना और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के बीच शुरू हुई ये लड़ाई अब दोनों देशों की एयरफोर्स तक पहुंच गई है और दोनों दी देशों ने खुली जंग का ऐलान कर दिया है, लेकिन सवाल है कि क्यों. आखिर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच चल रही जंग की असल वजह क्या है. आखिर पाकिस्तान अफगानिस्तान से क्या चाहता है और अफगानिस्तान पाकिस्तान से क्या चाहता है. अगर कोई देश जैसे तुर्की या कतर दोनों के बीच मध्यस्थता करवाता भी है तो आखिर दोनों के बीच बात क्या होनी है, जिसपर वो जंग लड़ रहे हैं.  

यूं तो पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच छोटी-बड़ी झड़पें तब से ही होनी शुरू हो गई थीं जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया था क्योंकि जब अफगानिस्तान पर तालिबान के काबिज होते ही उन आतंकी संगठनों को फिर से शह मिल गई थी, जो अफगानिस्तान में तालिबान के कमजोर होने के बाद पाकिस्तान में छिपकर बैठे थे. तालिबान के जो आतंकी अफगानिस्तान से भागकर पाकिस्तान आए थे, उन्होंने पाकिस्तान-अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाके में अपना ठिकाना बनाया, जो कबाइली इलाके थे. पाकिस्तान के कब्जे वाला फाटा यानी कि फेडरली एडमिनिस्ट्रेटेड ट्राइबल एरिया इन आतंकी संगठनों का सबसे बड़ा अड्डा था. इन आतंकियों ने अलग-अलग नाम से अपने संगठन बना रखे थे, लेकिन अमेरिका के दबाव में पाकिस्तान ने इन आतंकियों पर सख्ती करनी शुरू की और फिर 2007 में पाकिस्तानी सेना ने फाटा में बाकायदा मिलिट्री ऑपरेशन किया, जिसका नतीजा ये हुआ कि कुल 13 आतंकी संगठन एक साथ आ गए और उन्होंने मिलकर एक नया संगठन बनाया जिसका नाम रखा तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी कि टीटीपी, जिसका मुखिया बना पाकिस्तान के वजीरिस्तान प्रांत का रहने वाला आतंकी बैतुल्लाह महसूद. पाकिस्तान में बने इस नए संगठन का स्वरूप देवबंदी-वहाबी का था, जिसकी पांच मुख्य मांगें थीं.

पाकिस्तान में टीटीपी की क्या हैं मांगें?

पहली मांग कि पूरे पाकिस्तान में शरिया लागू हो. दूसरी मांग कि पाकिस्तान में महिलाओं की पढ़ाई पर पूरी तरह से रोक लगा दी जाए और तीसरी मांग कि पाकिस्तान के संविधान को भंग कर देश को शरीयत के हिसाब से चलाया जाए. चौथी मांग कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं को बाहर निकाला जाए और पांचवी मांग कि फाटा यानी कि फेडरली एडमिनिस्ट्रेटेड ट्राइबल एरिया से पाकिस्तानी फौजें बाहर चली जाएं. लेकिन तब की पाकिस्तान सरकार ने इस आतंकी संगठन की एक भी बात नहीं मानी. 25 अगस्त, 2008 को पाकिस्तान की सरकार ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया.

तालिबान ने टीटीपी आंतकियों को कर दिया जेल से रिहा

इसके बाद से ही ये संगठन लगातार पाकिस्तान की सेना के साथ भिड़ता रहा. 2018 में नूर वली महसूद के कमान संभालने के बाद से तो टीटीपी ने पूरे पाकिस्तान पर अपना कब्जा करने की मंशा भी जाहिर कर दी. 15 अगस्त 2021 को जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर अपना शासन स्थापित कर लिया तो उस तालिबानी सरकार ने अफगानिस्तान की जेलों में बंद तमाम टीटीपी आतंकियों को रिहा कर दिया. फिर तो 28 नवंबर, 2022 को टीटीपी के सुरक्षा प्रमुख मुफ्ती मुजाहिम ने ऐलानिया तौर पर कहा कि अब टीटीपी पूरे पाकिस्तान में हमले करेगा. और यही हुआ भी. टीटीपी के पाकिस्तान पर हमले बढ़ते गए. पाकिस्तान की सरकार इन हमलों के लिए टीटीपी के साथ ही तालिबानी शासन वाले अफगानिस्तान को जिम्मेदार ठहराते गई और फिर बात इतनी बिगड़ गई कि टीटीपी से निकलकर ये बात दोनों देशों की मिलिट्री और फिर एयरफोर्स तक पहुंच गई. और अब दोनों ही जंग में उलझे हुए हैं.

पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच जंग अंग्रेजों की देन?

लेकिन टीटीपी नहीं भी होता या अफगानिस्तान में तालिबान नहीं भी होता तो अफगानिस्तान और पाकिस्तान के पास एक दूसरे से लड़ने के लिए पर्याप्त वजहे हैं, जिनमें से एक वजह अंग्रेजों की देन है और यही वजह सबसे बड़ी भी है. वो है अफगानिस्तान-पाकिस्तान के बीच खींची गई सीमा रेखा, जिसे कहते हैं डूरंड लाइन. 14 अगस्त, 1947 को जब धर्म के आधार पर भारत का बंटवारा कर पाकिस्तान नया देश बना तो उसे विरासत में अफगानिस्तान से लगती यही सीमा रेखा मिली थी.

अंग्रेज और अफगानों के बीच क्या हुआ था समझौता?

2670 किमी लंबी इस सीमा रेखा का एक सिरा चीन से मिलता है और दूसरा ईरान से, जिसका इतिहास करीब 130 साल पुराना है. तब भारत पर अंग्रेजों का शासन था. कई लंबी लड़ाइयों के बाद 12 नवंबर, 1893 को ब्रिटिश इंडिया और अफगानिस्तान के बीच एक समझौता हुआ, जिसमें दोनों देशों की सीमाओं का निर्धारण किया गया. दोनों ओर के अधिकारी अफगानिस्तान के खोस्त प्रांत के पास बने पाराचिनार शहर में बैठे और दोनों देशों के बीच नक्शे पर एक लकीर खींच दी गई. इसी लाइन को कहा जाता है डूरंड लाइन. इस लाइन के जरिए एक नए प्रांत नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस को बनाया गया, जिसे आम तौर पर खैबर पख्तूनख्वा कहते हैं. ये हिस्सा ब्रिटिश इंडिया के पास आ गया. इसके अलावा फाटा यानी कि फेडरली एडमिनिस्ट्रेटेड ट्राइबल एरियाज और फ्रंटियर रिजंस भी ब्रिटिश इंडिया के ही पास आ गए, जबकि नूरिस्तान और वखान अफगानिस्तान के पास चले गए.

रावलपिंडी में भी हुआ एक समझौता

फिर 8 अगस्त 1919 को ब्रिटिश साम्राज्य और अफगानिस्तान के बीच रावलपिंडी में एक और समझौता हुआ, जिसमें तय हुआ कि ब्रिटिश साम्राज्य अफगानिस्तान को एक स्वतंत्र देश की मान्यता देगा, जबकि अफगानिस्तान डूरंड लाइन को अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा मानेगा. 14-15 अगस्त, 1947 के बाद स्थितियां फिर से बदल गईं. भारत आजाद हुआ और पाकिस्तान एक नया मुल्क बन गया. अब आजादी के साथ ही पाकिस्तान को विरासत में ये डूरंड लाइन मिल गई, जो पाकिस्तान को अफगानिस्तान से अलग करती थी. इस दौरान सबसे ज्यादा मुश्किलें आईं पश्तून लोगों को, जो अफगानिस्तान से सटी सीमा पर रहते थे. उनके साथ दिक्कत ये थी कि डूरंड लाइन खींचे जाने के वक्त ही उनके परिवार इस कदर बंट गए थे कि कुछ लोग अफगानिस्तान में चले गए थे और कुछ पाकिस्तान में रह गए थे. इसको लेकर दोनों देशों के बीच लगातार मतभेद बने रहे. इस बीच अफगानिस्तान की ओर से डूरंड लाइन के पास फायरिंग कर दी गई. नए-नवेले बने पाकिस्तान ने इस फायरिंग का जवाब एयरफोर्स को भेजकर दिया और पाकिस्तानी एयरफोर्स ने डूरंड लाइन के पास बने अफगानिस्तान के एक गांव पर हवाई हमला कर दिया. 26 जुलाई, 1949 को हुए इस हमले के बाद अफगानिस्तान ने ऐलान कर दिया कि वो डूरंड लाइन को नहीं मानता है.

अंग्रेजों ने तय की दोनों देशों की सीमारेखा

लेकिन फिर ब्रिटेन ने हस्तक्षेप किया. जून 1950 में ब्रिटेन की ओर से साफ कर दिया गया कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच की सीमा रेखा तो डूरंड लाइन ही होगी. लेकिन ये मसला कभी सुलझ नहीं सका. पाकिस्तान और अफगानिस्तान इस मुद्दे पर अक्सर भिड़ते ही रहे. कभी दोस्ती हुई कभी दुश्मनी. इस्लाम के नाम पर दोस्ती होती रही और सीमा रेखा के नाम पर इस दोस्ती में दरार भी आती रही. 1996 में अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के साथ ही दुश्मनी और गाढ़ी हो गई, क्योंकि तालिबान ने डूरंड लाइन का विरोध कर दिया और कहा कि दो इस्लामिक देशों के बीच में किसी सीमा रेखा की जरूरत ही नहीं है. लेकिन फिर तालिबान को अमेरिका ने अफगानिस्तान से भगा दिया तो डूरंड लाइन पर शांति आ गई. अब फिर से अफगानिस्तान पर तालिबान है, तो दोनों के बीच शांति होगी, इसकी कोई उम्मीद फिलहाल नहीं दिखती है.

कब तक खत्म होगी अफगान-पाक जंग?

देखते हैं कि ये जंग कहां तक खिंचती है. पाकिस्तान पहले से ही बलूचिस्तान में बलोच लिबरेशन आर्मी से लड़ने में अपनी ऊर्जा खपा रहा है, ऊपर से टीटीपी से भी वो लड़ ही रहा था. लेकिन अब लड़ाई किसी आतंकी संगठन से नहीं हो रही है, बल्कि एक देश की सेना से हो रही है और इसमें एक निर्णायक हमला इस जंग को किसी भी दिशा में मोड़ सकता है. रूस कह रहा है कि दोनों देश बातचीत करें. संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार मुद्दों के मुखिया वोल्कर टर्क कह रहे हैं कि दोनों देश राजनीतिक स्तर पर बात करें. तुर्की और कतर भी दोनों के बीच समझौते की कोशिश कर सकते हैं. लेकिन जिस तरह से पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इसे खुली जंग करार दिया है और तालिबान सरकार के प्रवक्ता जबिहुल्ला मुजाहिद ने भी पाकिस्तान पर बड़े हमले के तैयारी की बात की है, उससे लगता नहीं है कि ये जंग अभी जल्द खत्म हो पाएगी.

अविनाश राय एबीपी लाइव में प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं. अविनाश ने पत्रकारिता में आईआईएमसी से डिप्लोमा किया है और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रैजुएट हैं. अविनाश फिलहाल एबीपी लाइव में ओरिजिनल वीडियो प्रोड्यूसर हैं. राजनीति में अविनाश की रुचि है और इन मुद्दों पर डिजिटल प्लेटफार्म के लिए वीडियो कंटेंट लिखते और प्रोड्यूस करते रहते हैं.

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