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मुलायम के धोबिया पछाड़ से अखिलेश चित!

दिल्ली की सियासी गलियों में दो कहावत बहुत मशहूर हैं. 1- साइकिल बेहद कम वक्त में और बेहद कम जगह में घूम जाती है. 2- मुलायम सिर्फ अखाड़े के ही नहीं सियासत में भी धोबिया पछाड़ बहुत तेज मारते हैं. कल बेटे अखिलेश का और आज पिता मुलायम सिंह यादव का दो बयान पढ़िए फिर आपको एक कहानी सुनाता हूं भगवान जानें कितना सत्य है मैंने भी सियासी गलियों में ही कहीं सुनी थी. कल बेटे अखिलेश उवाच - ‘जो भी घर से लड़ा, वही कामयाब हुआ.’ आज पिता मुलायम सिंह उवाच- चुनाव से पहले सीएम की घोषणा नहीं होगी. कल बेटे अखिलेश ने 403 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की लिस्ट पिता मुलायम को थमा दी. आज पिता मुलायम ने अखिलेश के सभी करीबियों का टिकट काटते हुए 325 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी. पिछली बार जब विवाद चाचा बनाम अखिलेश चल रहा था तो अधिकांश विश्लेषक उवाच- ‘सपा परिवार’ में पारिवारिक महाभारत सिर्फ सियासी ड्रामा है. अखिलेश की छवि चमकाने का मुलायम का मास्टर स्ट्रोक है ये कथित पारिवारिक युद्ध. ईश्वर जानें कितना सच है लेकिन मुलायम सिंह यादव का चुप रहते हुए आज अखिलेश को जोरदार पटखनी देना बता रहा है कि यह लड़ाई सियासी अहं की है. पुराना अपनी सत्ता और ताकत की हनक को छोड़ना नहीं चाहता है और नया उसे वनवास भेजने पर आमादा है. बस जिसके पास जो हथियार है वह लगातार चला रहा है. पारिवारिक सियासत में ऐसी जंग जाहिर सी बात है. होना स्वभाविक है. उत्तर की कहानी तो आपको पता ही है सब दक्षिण में भी डीएमके के नेता करुणानिधि के दो बेटों स्टालिन और अलागिरी में भी ऐसी जंग चली थी. करुणानिधि फिलहाल अलागिरी को बाहर का रास्ता दिखाकर उसे कुछ शांत कर पाए हैं, लेकिन इस लड़ाई में विराम की एक वजह यह भी है कि द्रमुक के दुर्दिन चल रहे हैं. तो कुलमिलाकर बात यह है कि कुनबे के सियासत में अहं आड़े आता ही है. सभी सर्वे बता रहे हैं कि अखिलेश परिवार में अब सबसे अधिक लोकप्रिय हैं. जब अखिलेश को इस बात का अहसास होने लगा उन्होंने भी अपने ब्रांड को बचाए रखने के लिए विद्रोही रूख अख्तियार कर लिया. अब यही बात पिता को अखरने लगी. अब आप खुद सोचिए कि पिता मुलायम ने खुद जिस पौधे को लगाया है उसकी जड़ में मट्ठा क्यों डाल रहे हैं? सिंपल बात समझ में आने लगती है कि ताकत का नशा बेटे के विद्रोही रूख से उतरने लगा है. मुलायम को लगने लगा है कि बेटा अखिलेश उनको सपा के ‘जिल्लेइलाही’ पद से बर्खास्त कर रहा है. मुलायम के नाम के जयकारों से जो वातावरण गुंजायमान हो जाता था वह अखिलेश जिंदाबाद बोल रहा है. ‘आलाकमान’ जनता में अब आम बनते जा रहे थे. कभी उनके तान पर ताता थैया करने वाले अब अखिलेश चालीसा पढ़ रहे हैं. सोचिए जवानी से लेकर बुढापे तक जिसके आगे अफसरों की फौज दासों की तरह पलक झपकने का इंतजार करती रही हो. जैसे राजा को कोई कष्ट हो, तो वे पलक पावड़े बिछा दें. पूरी पार्टी मुलायम का निर्गुण पाठ करती रही है. उस ताकत का नशा उतरने लगे तो क्या वह 'बूढ़ा सियासी पहलवान' सत्ता की चाबी यूं ही जाने देगा. मुलायम अखाड़े में ही नहीं सियासत में भी भिड़ने वाले नेता रहे हैं. मुलायम अपनी ताकत को बरकरार रखने की कोशिश में जुटे हैं. अब एक कहानी सुनाते हैं आपको जो कभी मैंने भी कहीं सुनी थी.. 1960 में मैनपुरी कोई कवि सम्मेलन चल रहा था. जैसे ही उस समय के विख्यात कवि दामोदर स्वरूप ‘विद्रोही’ ने अपनी चर्चित रचना ‘दिल्ली की गद्दी सावधान’ सुनानी शुरू की, एक पुलिस इंस्पेक्टर ने उनसे माइक छीन कर कहा, 'बंद करो ऐसी कविताएं जो केंद्र सरकार के खिलाफ हों, केंद्र सरकार को ऐसी कवितायें नहीं पसंद'. इसी बीच उस भीड़ से एक लड़का बड़ी फुर्ती से मंच पर चढ़ा और उसने इंस्पेक्टर को मंच पर ही उठाकर पटक दिया. जब लोगों ने पूछा कि ये यह साहसी नौजवान कौन था तो पता चला कि वह 'मुलायम सिंह यादव' हैं. याद करिए चौधरी चरण सिंह के बेटे को मुलायम ने कैसे पटकनी देकर पूरी ताकत से खुद को स्थापित किया. अब आप समझ गये होंगे मुलायम जवानी के उसी जोश के साथ आखिरी बार बेटे को उसी धोबिया पछाड़ से पटकनी देने में जुटे हैं. सैफई में हसीनाओं के ठुमकों पर लड़खड़ाने वाला समाजवाद आज अपने ही ‘उघड़े जख्मों’ पर ‘लाल दवा’ नहीं लगा पा रहा है. जाते जाते उनके लिए जो सियासत में दो नेताओं की लड़ाई के बजाए बेटे-पिता की लड़ाई समझकर इसमें भावनात्मक संदेश दे रहे हैं उनके लिए ‘सियासत से अदब की दोस्ती बेमेल लगती है, कभी देखा है पत्थर पे भी कोई बेल लगती है. मशहूर शायर मुनव्वर राना के इस शेर सरीखी ही तबीयत है ‘समाजवादी परिवार’ की. लेखक से फेसबुक पर जुड़ें https://www.facebook.com/prakash.singh.3363 ट्वीटर पर जुड़ें- https://twitter.com/prakashnaraya18
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