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अफगानिस्तान संकट पर सरकार को मिला 'फिक्रमंद' विपक्ष का पूरा साथ

अफगानिस्तान संकट पर सर्वदलीय बैठक करके विपक्ष को विश्वास में लेने की मोदी सरकार की नीति काफी हद तक कामयाब रही है. लेकिन अभी भी कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब तलाशने के लिए सरकार को भी इंतज़ार करना होगा. शायद इसीलिए विदेश मंत्री एस जयशंकर को विपक्षी दलों के नेताओं को विस्तार से ये समझाना पड़ा कि फिलहाल हमें 'वेट एंड वॉच' की रणनीति ही अपनानी होगी. लेकिन, सवाल ये भी है कि इस नीति को भारत लंबे समय तक कैसे खिंच सकता है?

तालिबान की चेतावनी को मानते हुए 31 अगस्त तक अमेरिका ने अगर अपने सभी लोगों को वहां से निकालकर मुल्क छोड़ दिया, तब काबुल एयरपोर्ट पर भी तालिबान का ही कब्ज़ा हो जायेगा. भारत का एक कॉन्टिजेंसी प्लान पहले से तैयार है और इसे और दुरुस्त रखना होगा. हमने अपना दूतावास पूरी तरह से बंद कर दिया है, वहां का सारा स्टाफ भी भारत लौट आया है लेकिन हमारे कई नागरिक अभी भी वहां फंसे हुए हैं.

लिहाज़ा,आज हुई सर्वदलीय बैठक में विपक्षी नेताओं ने ऐसी कई चिंताओं की तरफ सरकार का ध्यान खिंचते हुए इस पर भी जोर दिया कि तालिबान की सरकार के प्रति हमें क्या रुख अपनाना है, इस पर भी आम सहमति बनाने की जरुरत है. जनता दल यू के नेता केसी त्यागी का सुझाव था कि इस नए तालिबान के प्रति हमें भी अपने रुख में थोड़ा बदलाव लाना होगा .वह इसलिये कि ये अल कायदा या आईएसआईएस के आतंकी नहीं हैं,बल्कि वे अगानिस्तान में ही पैदा हुए हैं, लिहाज़ा इन 20 सालों में अपने मुल्क के प्रति उनकी सोच में भी कुछ बदलाव तो आया ही होगा. उनका रुख देखने के बाद ही भारत को उनसे संबंध बनाने पर आगे कोई कदम उठाना होगा.

हालांकि विदेश नीति से जुड़े महत्वपूर्ण मसलों पर राजनीतिक सर्वमान्यता बनाने की भारत की परंपरा रही है और इस सर्वदलीय बैठक के जरिये सरकार ने उसी को आगे बढ़ाया है. लेकिन इस बैठक का वजन तब शायद और ज्यादा बढ़ जाता, अगर ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे संबोधित करते. वैसे बैठक के बाद जयशंकर ने कहा कि फिलहाल हमारा सारा ध्यान वहां से भारतीय नागरिकों की निकासी पर है और सरकार लोगों को निकालने के लिए सब कुछ कर रही है. सभी दलों के विचार समान हैं, हमने इस मुद्दे पर राष्ट्रीय एकता की भावना से बात की.

वैसे बैठक के बाद एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि उन्होंने इस मुद्दे को उठाया है कि भारत को वहां अपना दूतावास समेटने और पूरा स्टाफ वापस लाने में इतनी जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए थी. अमेरिका और अन्य नाटों देश की तरह ही भारत का कुछ स्टाफ वहां होता, तो वे काबुल एयरपोर्ट पर भारतीयों की मदद करते और उनकी सुरक्षित वतन-वापसी को भी सुनिश्चित करते. लेकिन अब वहां उनकी गुहार सुनने के लिए कोई जिम्मेदार व्यक्ति नहीं बचा है.

दरअसल,तालिबान को लेकर भारत का रुख क्या होगा ,इस बारे में सरकार अभी कुछ भी बोलना इसलिये नहीं चाहती कि पहले ये देखना है कि वहां बनने वाली सरकार में उदारवादी सोच रखने वाले हामिद करजाई को कोई महत्व दिया जाता है कि नहीं, या पूरी कमान सिर्फ तालिबान के हाथों में होगी या फिर विभिन्न समूहों को मिलाकर वे एक संयुक्त राष्ट्रीय सरकार बनाते हैं. ये तीनों ही स्थितियां बिल्कुल अलग-अलग हैं, लिहाज़ा इनमें से जो एक स्थिति वाली सरकार बनेगी, उसके मुताबिक ही भारत अपना निर्णायक रुख तय करेगा. और,ऐसा करने से पहले हमारी सरकार ये भी देखेगी कि इस सरकार के प्रति अंतराष्ट्रीय बिरादरी क्या रुख अपनाती है.

तालिबान नेताओं और अमेरिका के बीच फरवरी 2020 में हुए दोहा समझौते में धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र को रेखांकित किया गया था. इसमें काबुल में एक ऐसी सरकार की बात कही गई थी जिसमें  अफगानिस्तान के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व हो. अगर तालिबान अपने उस वादे को पूरा करता है, तब भारत को उसके साथ रिश्ते बनाने में कोई दिक्कत नहीं होगी. यही वजह है कि सर्वदलीय बैठक के बाद तालिबान के प्रति भारत सरकार के रुख के बारे में जब विदेश मंत्री से पूछा गया,तो उन्होंने यही कहा कि "अफगानिस्तान में स्थिति ठीक नहीं हुई है, पहले इसे ठीक होने दीजिए."

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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