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कांग्रेस के राजनीतिक आधार की तलाश के बीच गुलदस्ते में सूख गया 'आप' का कमल

आम आदमी पार्टी यानी आप दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 22 पर सिमट गई. भारतीय जनता पार्टी 48 सीटें जीतकर सरकार को चलाने के लिए आ गई है. संसदीय लोकतंत्र में चुनाव में हार-जीत के पीछे कई-कई सतहें होती है. लेकिन विश्लेषण में ऊपरी सतहों पर ही बातचीत संभव हो पाता है. सत्ता की राजनीति ही मुख्यधारा हैं.

चुनावबाज राजनीतिक पार्टियों के लिए मूल्य और सिद्धांत के मायने खत्म दिखते है. दिल्ली में ये अध्ययन किया जा सकता है कि चुनाव के मद्देनजर भाजपा और कांग्रेस कितने चेहरे प्रतिनिधि आप के विधायक हो गए हैं. आप और कॉग्रेस के कितने चेहरे भाजपा के विधायक हो गए और कॉग्रेस के उम्मीदवारों में कितने भाजपा व आप के चेहरे शामिल रहे हैं. यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि संसदीय चुनाव हिसाब किताब में महारथ साबित करने की एक प्रतिस्पर्द्धा रह गई है. लेकिन कोई समाज इस राजनीतिक संस्कृति को लंबे समय तक नहीं ढो सकता है. मूल्यगत सवाल एक समय के बाद राजनीति की मुख्यधारा बनते है. 

आम आदमी पार्टी का हारना    

आम आदमी पार्टी दस वर्षों के बाद सत्ता से नीचे उतर गई. आप के चेहरे अरविन्द केजरीवाल और उनके सहयोगी मनीष सिसोदिया की भी हार हो गए. अरविन्द केजरीवाल ने उस समय ही अपनी हार को कबूल कर लिया था, जब मतदाताओं के बीच यह अपील की कि वे कॉग्रेस को वोट देकर अपना वोट खराब नहीं करें. चुनाव के पूर्व इस तरह की अपील हार के संकेत देती है. बिहार के पूर्णिया में राजद नेता तेजस्वी यादव ने इसी तरह की अपील पप्पू यादव को हराने के लिए की थी. उस अपील के बाद पप्पू यादव के पक्ष में नतीजे झुक गए. 


कांग्रेस के राजनीतिक आधार की तलाश के बीच गुलदस्ते में सूख गया 'आप' का कमल

सत्ता के लिए प्रतिस्पर्धा सत्ताधारी पार्टी के जवाब में किसी राजनीतिक पार्टी को खुद के सामाजिक आधार को सक्रिय करने और उसके विस्तार की स्वीकृति देती है. आम आदमी पार्टी की कुछ बुनियादी दिक्कत है कि वह अपना सामाजिक आधार उसे मानती है जो भाजपा का सामाजिक-राजनीतिक आधार है और कॉग्रेस को अपना मुख्य प्रतिद्वंदी मानती है. कांग्रेस के लड़खड़ाने और कमजोर होने के हालात में आप ने कांग्रेस के जो राजनीतिक आधार थे उन्हें अपना बनाने की कोशिश नहीं की, बल्कि इंजीनियरिंग के जरिए उन्हें राजनीतिक विकल्पहीनता की स्थिति में रखा. ताकि उस आधार के पास आप को वोट देने की लाचारी भरी स्थितियां बनी रहे. उनके बीच सता सुविधाओं से खेलते रहे.

आम आदमी पार्टी देश की एक ऐसा पार्टी है जो देखते देखते खड़ी हो गई. यह बदले हुए समय में राजनीति के चरित्र को बदलने का उदाहरण है. यह चरित्र बुनियादी राजनीतिक जरुरतों से दूर रखना है. आम आदमी पार्टी ने कॉग्रेस के हाथ से सत्ता अपने हाथों में ली थी. भ्रष्ट्राचार विरोधी आंदोलन इसका आधार बना था. इस तरह भाजपा के राजनीतिक सामाजिक आधार पर खड़े होकर कॉग्रेस से ही लड़ती रही. इसे इस तरह देखा जा सकता है कि वह गुलदस्ते में कमल के फूल को जिंदा रखने की कोशिश करती रही. लेकिन गुलदस्ते में कमल का सुखना उसकी नियती है. राजीव गांधी के कॉग्रेस के नेतृत्व संभालने के बाद जब उसने अपने कुल राजनीतिक सामाजिक आधार में ‘कमल के फूल’ पर जोर देना शुरु किया तो उसे भाजपा ने आखिरकार सत्ता से उतार दिया.

राजनीतिक चुनौती  

भारत में राजनीतिक चेतना की मुख्यधारा का विकास स्वतंत्रता, समानता और धर्म निरपेक्षता के मूल्यों के आधार पर हुआ है. संसदीय राजनीति में दलों ने इन्हीं मूल्यों के आधार पर अपना एक सामाजिक आधार विकसित किया है. स्वतंत्रता, समानता, धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्यों की व्याख्याएं ही पार्टियों की विचारधारा मानी जाती है. आम आदमी पार्टी ने सत्ता को चलाने के तौर तरीकों को अपनी विचारधारा का चेहरा बनाया. 


कांग्रेस के राजनीतिक आधार की तलाश के बीच गुलदस्ते में सूख गया 'आप' का कमल

यह राजनीति में स्थायीत्व नहीं देता है. सत्ता को चलाने के तरीके पर एक प्रतिक्रिया हो सकती है और उसके नतीजे में तात्कालिक तौर पर सत्ता भी मिल सकती है. इस दिल्ली में 15 वर्षों तक कॉग्रेस की सरकार बनी रही और 2025 के चुनाव में आप के सत्ता से उतरने और भाजपा के सत्ता में लौटने के बीच यह कहानी दिख रही है कि कॉग्रेस अपने राजनीतिक आधार की तरफ लौटना चाहती है. 

लेकिन 22 सीटों पर जीत के बाद भी आप को लेकर उसके सिमटने के संकेत मिल रहे हैं. आखिर वह किस राजनीतिक विचारधारा के आधार पर अपने को खड़ा करने की कोशिश करेगी. सत्ता-सुविधाओं का एक वोट आधार होता है. वह सत्ता चली गई. सरकार के तौर तरीकों के कोई चिन्ह नहीं बने. आप के साथ बहुजन समाज पार्टी भी सिमट गई है. आप को उसका एक हिस्सा मिला, लेकिन वह नई स्थितियों में नया नेतृत्व की तलाश कर सकता है. उसका आधार कॉग्रेस की तरफ हो सकता है, इसके संकेत मिल रहे हैं. 

आप का संगठन के स्तर पर केंद्रीकरण हो चुका है. यह उनकी कीमत पर हुआ है जो मूल्यगत राजनीति को आप का आधार खड़ा करना चाहते थे. आप के पास अपना विज्ञापन करने की सुविधा थी उससे उसके भीतर की दिक्कतें टाट के नीचे गंदगी की तरह छिप जाती थी. आप को खुद को बचाने की चुनौती से जूझना है यह चुनाव नतीजों का सार है.

बीजेपी कोई सत्ता की नई संस्कृति बनाने नहीं आई है. वह अपने सामाजिक राजनीतिक आधार को ताकत देगी. केंद्र में उसकी सरकार है, उसकी ताकत उसे आक्रामक राजनीति की तरफ ले जाएगी.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.] 

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