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Explained: गन्ने के रस से बने तेल से दौड़ेंगी गाड़ियां! कैसे काम करेगा फ्लेक्स फ्यूल और क्या अलग से खुलेंगे पंप?

Flex Fuel Automobiles: दुनिया भर में कहीं भी फ्लेक्स-फ्यूल कारें 100% इथेनॉल पर नहीं चलाई जातीं, बल्कि कम से कम 15% पेट्रोल का मिश्रण हमेशा रखा जाता है. हालांकि, हमारी निर्भरता धीरे-धीरे कम जरूर होगी.

मारुति सुजुकी ने हाल ही में भारत की पहली फ्लेक्स-फ्यूल कार वैगन-आर पेश करके ऑटो इंडस्ट्री में एक नई बहस छेड़ दी है. इस कार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह 20% से लेकर 85% तक इथेनॉल मिले पेट्रोल पर बिना किसी झंझट के दौड़ सकती है. लगभग साथ ही, हीरो मोटोकॉर्प ने भी 3 जून को देश की पहली फ्लेक्स-फ्यूल बाइक लॉन्च कर दी है. इन खबरों ने आम आदमी के मन में एक साथ कई सवाल खड़े कर दिए हैं- आखिर यह मिक्स्ड पेट्रोल या फ्लेक्स फ्यूल है क्या? क्या अब हम पेट्रोल पंप पर जाकर सीधे इथेनॉल भरवा पाएंगे? और क्या धीरे-धीरे पेट्रोल-डीजल का जमाना खत्म होने वाला है?

फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल आखिर है क्या और कितना अलग है?

फ्लेक्स-फ्यूल का सीधा-सादा मतलब है एक ऐसा इंजन जो 'लचीला' है. यानी यह एक साथ दो तरह के ईंधन या उनके किसी भी मिश्रण पर चल सकता है. आम कारें सिर्फ पेट्रोल या सिर्फ डीजल पर चलती हैं. कुछ गाड़ियां 10% तक इथेनॉल मिला पेट्रोल पचा लेती हैं, जो अभी आमतौर पर पेट्रोल पंपों पर मिल रहा है. लेकिन फ्लेक्स-फ्यूल इंजन 85% इथेनॉल और मात्र 15% पेट्रोल वाले मिश्रण को भी बिना किसी बदलाव के इस्तेमाल कर सकता है.

इस कार में एक स्मार्ट सेंसर लगा होता है जो ईंधन की क्वालिटी और उसमें इथेनॉल की मात्रा को भांप लेता है और उसी हिसाब से इंजन की सेटिंग्स को ऑटोमैटिक एडजस्ट कर लेता है. यही वो टेक्नोलॉजी है जो एक ही कार को 20% से 85% तक किसी भी मिश्रण पर बिना झटके चलने देती है.

यह '85% मिक्स्ड पेट्रोल' आखिर है क्या?

इसे तकनीकी भाषा में 'E85 फ्यूल' कहते हैं, जिसमें 85% इथेनॉल और 15% पेट्रोल मिला होता है. इथेनॉल एक तरह का अल्कोहल है, जो गन्ने, मक्का, सड़े हुए आलू या कृषि कचरे से बनता है. भारत में इसे मुख्य रूप से गन्ने के शीरे और कुटे हुए अनाज से बनाया जाता है. पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने के पीछे सरकार की दो बड़ी मंशाएं हैं:

  1. क्रूड ऑयल के आयात पर निर्भरता कम करना
  2. किसानों की आमदनी बढ़ाना

फिलहाल पूरे देश में पेट्रोल में लगभग 15% इथेनॉल पहले से ही अनिवार्य रूप से मिलाया जा रहा है, जिसे E15 या E20 जैसे नामों से जाना जाता है. सरकार का लक्ष्य 2025-26 तक इसे 20% (E20) तक ले जाने का था और उसके बाद धीरे-धीरे और बढ़ाने की योजना है.

क्या पेट्रोल-डीजल की जगह अब सीधे इथेनॉल इस्तेमाल होगा?

यह बात पूरी तरह से सही नहीं है, कम से कम अभी तो नहीं. ध्यान रखने वाली सबसे जरूरी बात यह है कि E85 या कोई भी फ्लेक्स फ्यूल, पूरी तरह पेट्रोल का विकल्प नहीं बनता. E85 में 85% इथेनॉल तो होता है, लेकिन 15% पेट्रोल भी होता है. सर्दियों में या ठंडे इलाकों में इथेनॉल का अनुपात और कम करके 70% भी किया जा सकता है ताकि इंजन की स्टार्टिंग आसान रहे.

असल में, शुद्ध इथेनॉल पर गाड़ी स्टार्ट करना बहुत मुश्किल होता है, खासकर सर्द मौसम में. इसीलिए दुनिया में भी फ्लेक्स-फ्यूल कारें 100% इथेनॉल पर नहीं चलाई जातीं, बल्कि कम से कम 15% पेट्रोल का मिश्रण हमेशा रखा जाता है. तो इसका मतलब है कि पेट्रोल-डीजल का युग अचानक खत्म नहीं होने वाला, लेकिन हमारी निर्भरता धीरे-धीरे कम जरूर होगी.

क्या भारत में E85 या फ्लेक्स फ्यूल के अलग पेट्रोल पंप हैं?

यहीं पर पूरी कहानी का सबसे बड़ा पेंच है. अभी भारत में आम पेट्रोल पंपों पर सिर्फ E10 या E20 यानी 10-20% इथेनॉल वाला पेट्रोल ही मिलता है. E85 (85% इथेनॉल वाला ईंधन) बेचने के लिए पेट्रोल पंपों पर अलग से डिस्पेंसर और स्टोरेज टैंक लगाने होंगे. सरकार ने कहा है कि आने वाले समय में ऐसे पंप शुरू किए जाएंगे. इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम जैसी तेल कंपनियों ने इस दिशा में काम करना भी शुरू कर दिया है. लेकिन बुनियादी ढांचे के स्तर पर अभी यह बहुत ही शुरुआती दौर में है.

तत्काल में अगर आप वैगन-आर फ्लेक्स-फ्यूल खरीदते हैं, तो सबसे बड़ा फायदा यही होगा कि यह आम पेट्रोल पंपों पर मिल रहे E20 ईंधन पर भी चलेगी और भविष्य में जब कभी E85 उपलब्ध होगा, तब उस पर भी चल सकेगी. यानी यह कार भविष्य के लिए तैयार प्रोडक्ट है.

तो आखिर में फायदा और चुनौती क्या?

फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों के तीन बड़े फायदे हैं:

  • ये पेट्रोल की तुलना में काफी सस्ती चलेंगी क्योंकि इथेनॉल की कीमत कम होती है.
  • इथेनॉल एक नवीकरणीय ईंधन है, इसे हम गन्ने और दूसरी फसलों से बार-बार पैदा कर सकते हैं, जिससे देश का विदेशी मुद्रा का बोझ कम होगा.
  • यह प्रदूषण भी पेट्रोल के मुकाबले कम करता है.

लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं:

  • सबसे बड़ी चुनौती है E85 ईंधन की उपलब्धता और उसके लिए पंपों का नेटवर्क खड़ा करना.
  • दूसरी बड़ी चुनौती है इथेनॉल की उपलब्धता का जल-गहन होना, यानी गन्ने की खेती में पानी की बहुत बड़ी मात्रा लगती है.
  • फिलहाल ये गाड़ियां आम पेट्रोल मॉडलों की तुलना में थोड़ी महंगी आ सकती हैं, हालांकि कंपनियां इसे किफायती रखने की बात कर रही हैं.

फिलहाल, मारुति और हीरो ने एक सही दिशा में बड़ा कदम उठाया है, लेकिन असली क्रांति तब आएगी जब सरकार और तेल कंपनियां मिलकर पूरे देश में फ्लेक्स फ्यूल को आम आदमी तक पहुंचाएंगी.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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